'देशव्यापी हड़ताल की चेतावनी'

- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
देश में बढ़ती महंगाई और सरकार की कथित मज़दूर-विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ मंगलवार को राजधानी दिल्ली में सैकड़ों मज़दूरों ने जुलूस निकाला और गिरफ़्तारियां दी.
भारतीय मज़दूर संघ, हिंद मज़दूर सभा, ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस और इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के सदस्यों ने राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर से संसद मार्ग तक जुलूस निकाला.
लाल रंग के झंडे उठाए सैंकड़ों मज़दूरों ने नारे लगाए और फिर गिरफ़्तारियां दीं.
एटक के महासचिव और राज्यसभा सांसद गुरूदास दासगुप्ता ने कहा कि दिल्ली ही नहीं देश के कई शहरों में मज़दूरों ने अपना रोष व्यक्त किया है.
उन्होंने कहा, “नौ केंद्रीय मज़दूर संघों ने एकजुट होकर सरकार को चेतावनी दी है कि अगर जल्द कुछ आर्थिक फ़ैसले नहीं लिए गए तो हम देशव्यापी हड़ताल करेंगे.”
सरकार पर आरोप
सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) की सचिव हेमलता ने दावा किया कि सरकार का महंगाई के सामने घुटने टेक देना सही नहीं है, और अगर वो चाहे तो लोगों के हित को ध्यान में रखते हुए क़दम उठा सकती है.
साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार श्रम क़ानून को लागू करने से पीछे हट रही है जिससे मज़दूरों का और दमन हो रहा है.
हेमलता ने कहा, “मारुति के आंदोलन को देखें या अन्य संस्थानों को, मज़दूरों को अपने संवैधानिक हकों के लिए - मज़दूर संघ बनाने के लिए भी लड़ना पड़ा रहा है, और इस सब में सरकार पूंजीपतियों के साथ है.”
भारतीय मज़दूर संघ के पवन कुमार ने कहा कि सरकार की नीतियां मज़दूर-विरोधी हैं जिस वजह से समय के साथ अब मज़दूरों को, ख़ास तौर पर जो ठेके पर काम करते हैं, उन्हें पेंशन और सोशल सिक्यूरिटी जैसी सुविधाएं भी नहीं मिल रही हैं.
पवन कुमार ने कहा कि उनकी मांगों में मज़दूरों को न्यूनतम वेतन, सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश रोकना और जन-वितरण प्रणाली को सब तक पहुंचाना शामिल है.
मज़दूरों के रोष के पीछे उन्होंने उदारीकरण के दौर में बनाई गई सरकार की आर्थिक नीतियों को ज़िम्मेदार बताया.
उदारीकरण
भारत ने वर्ष 1991-92 में जब उदारीकरण की नीति अपनाई तो विदेशी निवेश और निजीकरण को बढ़ावा दिया. मक़सद था कि सरकारी नियंत्रण को कम करना, प्रतिद्वंद्विता बढ़ाना और कामगारों की स्थिति बेहतर करना.
लेकिन बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी और ठेके पर नौकरियों के चलन से कामगारों में असंतोष बढ़ा है.
योजना आयोग के पूर्व सदस्य, वाईके अलघ के मुताबिक़ ये ध्यान में रखना ज़रूरी है कि पिछले 20 वर्षों में कामगारों का जीवन स्तर बेहतर हुआ है, जिससे उनकी मांगें बढ़ी हैं.
ख़ास तौर पर खाद्य और पेट्रोल पदार्थों के लिए उनका कहना था कि मांग के मुताबिक़ देश में उत्पादन ना होने की वजह से, आपूर्ति के लिए सरकार को आयात पर निर्भर रहना पड़ता है जिससे दाम पर उसका नियंत्रण कम हो जाता है.
अलघ कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि उदारीकरण के बाद नौकरियां बढ़ी ना हों, लेकिन ये ज़रूर है कि आमदनी का स्तर नहीं बढ़ा, जिससे कामगारों में नाराज़गी होना स्वाभाविक है."
अलघ बताते हैं कि नई नीतियां अपनाने के बाद संगठित क्षेत्र में नौकरियां नहीं बढ़ीं लेकिन असंगठित क्षेत्र में कई लोगों को रोज़गार मिला है. उनके मुताबिक़ सरकार को इसका संज्ञान लेकर कुछ पहल करनी चाहिए.
































