क्या दुनिया पर अमरीकी-ब्रितानी प्रभुत्व का अंत नज़दीक?

    • Author, निक ब्रायंट
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, न्यू यॉर्क

अमरीका और ब्रिटेन के बीच एक गहरा संबंध रहा है जिसके केंद्र में ये दंभ की भावना है कि इच्छा या अनिच्छा से ही सही लेकिन वैश्विक नेतृत्व की बेहतर अभिव्यक्ति अंग्रेजी भाषा में ही हुई है.

हाल के अमरीकी राष्ट्रपतियों ने, ब्रितानी सरकारों से भी ज्यादा घमंड भरे अंदाज में 'अमरीकी श्रेष्ठतमवाद' यानी अमरीका के एक खास देश होने का ढिंढोरा पीटा है.

ब्रितानी प्रधानमंत्री भी ब्रिटेन के एक खास देश होने की धारणा में विश्वास करते दिखे हैं. हालांकि, ब्रितानी प्रधानमंत्रियों का अंदाज अमरीकी राष्ट्रपतियों जितना घमंड से भरा नहीं है.

ब्रिटेन और अमरीका के विशेष होने की धारणा?

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री मानते हैं 'वेस्टमिन्सटर' दुनिया की तमाम संसदों की जननी है और ब्रिटेन का शासन तंत्र और उदारवादी मूल्य उन वैश्विक मानकों को गढ़ते हैं जिसे इसकी पूर्व कॉलोनियों (भारतजैसे तमाम देश जो ब्रितानी साम्राज्य का हिस्सा रहे हैं) ही नहीं, अन्य देशों को भी मानने चाहिए.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमरीकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूज़वेल्ट और ब्रितानी प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल के बीच साल 1941 के अगस्त महीने में ब्रिटेन की कॉलोनी न्यूफाउंड लैंड (फिलहाल कनाडा का हिस्सा) में एक मुलाकात हुई.

इसमें अटलांटिक चार्टर पर हस्ताक्षर किए गए जिससे नाटो, विश्व मुद्रा कोष और फाइव इंटेलिजेंस समुदाय जैसे संगठनों का निर्माण हुआ.

इस चार्टर के साथ ही अमरीका के एक विशेष देश होने और ब्रिटेन के दुनिया का नेतृत्व करने वाली धारणा का मिलन हुआ.

युद्ध के बाद की दुनिया में प्रचलित उदारवादी व्यापार प्रणाली को भी अक्सर एंग्लो-सेक्सन मॉडल कहा जाता है. वैश्विक कूटनीतिक, व्यापारिक और वित्तीय संरचना भी ज्यादातर अंग्रेजी भाषा में ही बुनी हुई है.

लेकिन अब बदल रही है तस्वीर

लेकिन, हाल के दिनों में दुनिया में अमरीकी-ब्रितानी प्रभुत्व कमज़ोर होता दिख रहा है.

ब्रितानी आम चुनाव में त्रिशंकु सरकार वाले नतीजे इस कमजोरी को स्पष्ट रूप से उजागर कर रहे हैं.

ब्रितानी संसद में अनिश्चितता का माहौल है तो अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव में रूसी हाथ होने से जुड़ी जांच के चलते अराजकता जैसा माहौल है.

ऐसी स्थिति में ब्रिटेन और अमरीकी सरकार दुनिया में मजबूत और स्थिर सरकार बनाने जैसी बड़ी बड़ी बातें नहीं कर सकते.

ब्रितानी चुनाव की घोषणा के बाद बदली दुनिया की शक्ल

टेरीज़ा मे ने छह हफ्ते पहले ब्रिटेन के आम चुनावों की घोषणा की थी.

लेकिन इन छह हफ्तों में दुनिया की स्थिति में बड़ी तेजी से बदलाव आए हैं जिनके बाद अमरीका और ब्रिटेन की वैश्विक स्थिति में नुकसान हुआ है.

डोनल्ड ट्रंप ने अपने पहले ही अंतर्राष्ट्रीय दौरे में नाटो संधि के आर्टिकल पांच का सार्वजनिक रूप से समर्थन करने से इनकार कर दिया.

इसके साथ ही आर्थिक भार साझेदारी को लेकर अपने सहयोगियों पर भी बरस पड़े.

इसके बाद ट्रंप ने इटली के सिसली में हुई जी-7 समिट में खुद को अलग-थलग पाया.

इसके तुरंत बाद अमरीका लौटते ही उन्होंने पेरिस जलवायु संधि से अमरीका के बाहर निकलने जैसे बड़े फैसले की घोषणा कर दी.

यहां अमरीका फर्स्ट का अर्थ अमरीका का अलग-थलग होना है.

ट्रंप इस नव अलगाववाद का आनंद लेते दिख रहे हैं जैसे राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने ट्रांस-पेसेफिक साझेदारी से बाहर होने के बाद लिया था.

ब्रिटेन पर यूरोपीय संघ छोड़ने का असर

ब्रिटेन के लिए यूरोपीय संघ से अलग होने का राजनयिक असर हाल के हफ्तों में दिखना शुरू हो गया है.

यूरोपीय संघ के नेताओं ने दो टूक अंदाज में बताना शुरू कर दिया है कि ब्रिटेन के अलग होने की शर्ते वह किस तरह तय करेंगे जो मित्रतापूर्ण अलगाव की जगह आदेश जैसा लग रहा है.

यूरोपीय संघ के 26 सदस्यों ने ये भी साफ कर दिया है कि वह ब्रिटेन को यूरोपीय संघ छोड़ने की सज़ा देने का इरादा रखते हैं.

चुनावों की घोषणा करने के बाद टेरीज़ा मे के साथ मुलाकात के बाद यूरोपीय संघ के अध्यक्ष ज्यां क्लोड युंकर ने कहा था कि वह इस मुलाकात के बाद पिछली मुलाकात के मुकाबले 10 गुना ज्यादा संशय में हैं.

यूरोपीय संघ के राजनयिक ने मुझसे बात करते हुए कहा, "ब्रिटेन ने अपने एक पैर में कुल्हाड़ी मारी है, हम आपके दूसरे पैर में मारने का इरादा रखते हैं"

ब्रितानी प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे जल्दी चुनाव कराने के बावजूद जीतने में असफल रही हैं.

इसके बाद उन्होंने यूरोपीय संघ के साथ किसी भी तरह के समझौते की क्षमता खो दी है.

ब्रेक्सिट में मध्यस्थता कराने वाले जी वरहॉफस्टाट ने ब्रितानी चुनाव को पहले ही आत्मघाती करार दिया है.

ब्रिटेन की मजबूरियों से लदी कूटनीति

हाल के दिनों में ब्रिटेन के रिश्ते न सिर्फ यूरोपीय संघ से खराब हुए हैं बल्कि इसकी ट्रांस अटलांटिक संधि में तनाव आया है जैसा पहले कभी नहीं हुआ.

मुझे कभी इसकी उम्मीद नहीं थी कि ब्रिटेन अमरीका के साथ संवेदनशील खुफिया जानकारी साझा करना बंद करेगा. लेकिन मैनचेस्टर धमाकों के बाद हमनें ऐसा होने की खबर छापी थी.

इसके बाद लंदन हमलों के बाद डोनल्ड ट्रंप ने लंदन के मेयर सादिक़ खान पर हमला बोला.

ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से पहले ऐसा सोचा जाना भी मुमकिन नहीं था कि एक अमरीकी राष्ट्रपति ब्रिटेन पर आतंकी हमले के बाद एक ब्रितानी मेयर पर ऐसी भद्दी आलोचना करेगा.

अमरीका में ब्रिटेन के पूर्व राजदूत सर क्रिस्टोफर मेयर ने जनता के मन की बात को भांपते हुए कहा, "ट्रंप मुझे उल्टी करने को मजबूर करते है."

प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे ने ट्रंप के लंदन के मेयर सादिक़ खान पर हमले के बावजूद ट्रंप की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं की क्योंकि वे ट्रंप को नाराज़ करके ब्रेक्सिट के बाद अमरीका के साथ होने वाले एक व्यापारिक समझौते पर संकट नहीं आने देना चाहती थी.

शायद, ये बात साफ करती है कि टेरीज़ा मे ने ट्रंप के पेरिस करार को ठुकराने के बाद जर्मनी, फ्रांस और इटली के साथ मिलकर अमरीकी राष्ट्रपति के इस फैसले की निंदा नहीं की.

लेकिन इस फैसले से एक बार फिर ब्रिटेन की कमजोरी उजागर हुई.

ब्रिटेन और अमरीका के रिश्ते और फ्रांस का महत्व

ब्रिटेन और अमरीका के बीच का खास संबंध हमेशा एक बराबरी का रिश्ता नहीं रहा है लेकिन अब ये एकतरफा दिखने लगा है.

ये यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद ब्रिटेन की मजबूरी से भरी कूटनीति के बारे में बताता है.

ट्रांस अटलांटिक संधि को एक दीर्घ-कालिक समस्या से जूझना होगा जो ट्रंप के शासन काल के बाद भी जारी रहेगी.

हाल के दशकों में अमरीका के लिए ब्रिटेन का महत्व यूरोपीय संघ से जोड़ने वाले जरिए के रूप में था.

इसी वजह से बराक ओबामा ने पिछले साल जनमत संग्रह के दौरान ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग नहीं होने की पुरजोर वकालत की थी.

अमरीका की भविष्य की सरकार के संदर्भ में इसकी कल्पना करना आसान है कि अमरीका जर्मनी के साथ रिश्ते मजबूत करके अपना ये मकसद सिद्ध करेगा.

वैश्विक नेतृत्व के मामले में खालीपन को भरने में देर नहीं लगती.

यूरोपीय संघ को ब्रिटेन के बाहर निकलने के फ़ैसले के बाद मजबूती मिलते देखा गया है. फ्रांस में इमैन्युल मैक्रों के बाद फ्रांस और जर्मनी के बीच रिश्तों में एक नई गर्माहट देखी गई है और ये अब ज्यादा ताजा और गतिशील है.

पेरिस समझौते के बाद चीन और ब्रसेल्स के बीच भी एक हरित मित्रता होती देखी जा रही है.

मोटे तौर पर, चीन इसे एक मौके के तौर पर देख रहा है जब वह खुद को दुनिया में जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर दुनिया का माहौल तय करने वाले देश के रूप में स्थापित कर सकता है.

21वीं शताब्दी एशिया के नाम

डोनल्ड ट्रंप के शपथ लेने से पहले भी ये शताब्दी दूसरी अमरीकी शताब्दी की जगह एशिया के नाम पर होती दिख रही है. यूरोप भी अपने लिए एक मौका तलाश रहा है.

एंगेला मर्केल ने जी-7 समिट के बाद कहा था, "यूरोपीय देशों को अपना नसीब अपने हाथ में लेना होगा."

अमरीका और ब्रिटेन पर हमला करते हुए उन्होंने ये भी चेतावनी दी कि जर्मनी के दूसरों पर भरोसा करने के दिन भी फिर गए हैं.

जर्मन चांसलर धीरे-धीरे आजाद दुनिया की नेता बनती दिख रही हैं. ये एक ऐसी चीज है जिसकी दूसरे विश्व युद्ध के बाद के सालों में कल्पना करना मुश्किल था जब अंग्रेजी में बोलने वाला वैश्विक नेतृत्व शक्ल अख्तियार कर रहा था.

विंस्टन चर्चिल ने साल 1946 में अपनी स्पीच में कहा था - "ये जरूरी है कि युद्ध के बाद भी अंग्रेजी बोलने वाले लोगों का आचरण दिमागी स्थिरता, उद्देश्य के प्रति लगनशीलता, और फैसलों को लेने में सरलता से परिभाषित हो, हम सब के लिए ये एक समान रूप से जरूरी है कि हम इस जरूरत को पूरा करें.

इस समय अमरीका और ब्रिटेन दोनों मुल्क चर्चिल की इस अपेक्षा पर खरे उतरते नहीं दिख रहे हैं.

अंग्रजी बोलने वाले ये देश अब इतनी मजबूत आवाज के साथ नहीं बोलते और दुनिया ने भी उन्हें महत्व देना बंद कर दिया है.

ऐसे में दुनिया में एक नया समीकरण बनता दिख रहा है जो दुनिया की अन्य भाषाओं में पनपता दिखाई पड़ रहा है.

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