पाकिस्तानी सेना तुर्की की जगह चीन से क्यों ले रही है लड़ाकू हेलीकॉप्टर?

तुर्की और अमेरिका का टी-129 एक लड़ाकू हेलीकॉप्टर है

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    • Author, उमर फ़ारूक़
    • पदनाम, रक्षा विश्लेषक, बीबीसी उर्दू के लिए
  • पढ़ने का समय: 4 मिनट

पाकिस्तान ने जब चंद सालों पहले तुर्की में बना हेलीकॉप्टर ख़रीदने का फ़ैसला किया था तो उस वक़्त यह उम्मीद थी कि यह पाकिस्तान की रक्षा क्षमता को और बेहतर बनाएगा.

लेकिन अमेरिका की पाबंदियों के कारण यह रुकी हुई डील आख़िरकार तब ख़त्म हो गई जब तुर्की की तरफ़ से वॉशिंगटन में लॉबिंग के बावजूद अमेरिकी प्रशासन ने ये पाबंदियां हटाने से साफ़ मना कर दिया.

इस कमी को पूरा करने के लिए पाकिस्तान आर्मी एविएशन ने चीन से 'ज़ेड-10 एमई' (Z-10 ME) लड़ाकू हेलीकॉप्टर ख़रीदने की शुरुआत कर दी है.

हालांकि, इस पर भी कई लोग यह कहकर सवाल उठा रहे हैं कि कहीं यह पाकिस्तान के लिए घाटे का सौदा तो नहीं है और साथ ही दोनों देशों के बनाए हेलीकॉप्टरों की तुलना भी कर रहे हैं.

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नए हेलीकॉप्टर ख़रीदने की कितनी ज़रूरत?

पाकिस्तानी सेना से हाल ही में रिटायर होने वाले एविएशन इंजीनियर ब्रिगेडियर (रिटायर) फ़ारूक़ हमीद का कहना है कि पाकिस्तान अपने 48 पुराने 'बेल एएच-1एफ़' (Bell AH-1F) बेड़े को आधुनिक हेलीकॉप्टरों में बदलना चाहता है.

इससे पहले अमेरिका की विदेशी सैन्य बिक्री की प्रक्रिया के तहत पाकिस्तान ने 12 बेल 'एएच-1' ख़रीदने का एक सौदा किया था लेकिन यह भी अमेरिका की राजनीतिक चिंताओं के कारण खटाई में पड़ गया था.

हेलीकॉप्टर

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पूर्व ब्रिगेडियर फ़ारूक़ हमीद ने बताया कि पाकिस्तान ने साल 2017 में औपचारिक परीक्षण के बाद तुर्की में बना 'टी-12' हेलीकॉप्टर ख़रीदने का फ़ैसला किया था.

उन्होंने कहा,"इस परीक्षण में चीन और तुर्की दोनों के लड़ाकू हेलीकॉप्टरों ने भाग लिया था. जिसके बाद सन 2018 में तुर्की के 'टी-129' हेलीकॉप्टरों को आधिकारिक रूप से ख़रीदने का ऑर्डर दिया गया था."

तुर्की कंपनी के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करते समय पाकिस्तानी अधिकारियों और विशेषज्ञों का मानना था कि 'टी-129' लड़ाकू हेलीकॉप्टर मिलिट्री एविएशन के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होंगे.

पाकिस्तान ने 30 हेलीकॉप्टरों का ऑर्डर दिया था जिनकी क़ीमत 1.5 अरब डॉलर थी हालांकि तुर्की-अमेरिकी संबंधों के कारण यह सौदा पूरा नहीं हो सका है.

फ़ारूक़ हमीद के मुताबिक़, सन 2020 में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इस सौदे में देरी हुई और फिर हाल ही में तुर्की सरकार को आख़िरकार पाकिस्तानी आर्मी एविएशन को इन सौदे को पूरा न कर पाने का संदेश भिजवाना पड़ा.

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तुर्की के हेलीकॉप्टर ख़रीदने में कैसी दिक़्क़त?

ये हेलीकॉप्टर टर्किश एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज़ और मशहूर अमेरिकी कंपनी ऑगस्ता वेस्टलैंड ने मिलकर बनाया है. इसमें तुर्की के बने हथियार, एवानिक्स और एयरफ़्रेम इस्तेमाल हुए हैं जबकि अमेरिकी कंपनी ने इसके इंजन और पंखे डिज़ाइन किए हैं.

इस हेलीकॉप्टर में स्थापित LHTEC CTS800-4N इंजन ही वह मूलभूत वजह है जिसके कारण अमेरिका ने इस हेलीकॉप्टर की ख़रीद की इजाज़त नहीं दी. तुर्की की कंपनी के पास इस डिज़ाइन के सर्वाधिकार सुरक्षित ज़रूर हैं लेकिन अमेरिका और तुर्की की साझेदारी की शर्तों के मुताबिक़ अमेरिका इस हेलीकॉप्टर को किसी तीसरे देश को बेचने पर रोक लगा सकता है.

हालांकि, पाकिस्तानी विश्लेषक अब भी मानते हैं कि तुर्की का बना '129-टी' पाकिस्तान आर्मी एविएशन के लिए बेहतर है क्योंकि वह हर हालात में काम कर सकता है. दिन या रात के दौरान जासूसी कामों और सर्वे के लिए भी इनमें बेहतरीन क्षमता है.

चीनी हेलीकॉप्टर 'ज़ेड-10 एमई'

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चीनी हेलीकॉप्टर में क्या है ख़ास?

वॉशिंगटन की ओर से तुर्की के हेलीकॉप्टर 'टी-129' पर रोक लगाने के बाद पाकिस्तानी सेना ने चीन के हेलीकॉप्टर '10-एमई' को ख़रीदने के बारे में सोचना शुरू किया.

चीन के रक्षा उद्योग ने ये लड़ाकू हेलीकॉप्टर पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के लिए और बेचने के लिए तैयार किया था. 'ज़ेड 10-एमई' लड़ाकू हेलीकॉप्टर बुनियादी तौर पर टैंक को तबाह करने और हवा में युद्ध के लिए इस्तेमाल होता है.

ब्रिगेडियर (रि.) फ़ारूक़ हमीद के मुताबिक़ ये कहना कि चीन की टेक्नोलॉजी पश्चिमी टेक्नोलॉजी से कमतर है यह अब पुरानी बात हो चुकी है.

वो कहते हैं, "बीते 15 सालों से चीन की एविएशन तकनीक में अच्छा ख़ासा विकास हुआ है और अब ये उतनी ही अच्छी है जितनी की पश्चिमी तकनीक."

क्या यह पाकिस्तान का अस्थाई बंदोबस्त है?

ऐसा अनुमान है कि पाकिस्तानी सेना चीन के 'ज़ेड-10 एमई' हेलीकॉप्टर को सीमित संख्या में ख़रीदेगी और यह अस्थाई बंदोबस्त होगा.

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बीते सप्ताह लंदन से प्रकाशित होने वाली एक सैन्य पत्रिका 'जेन्स डिफ़ेंस वीकली' ने एक रिपोर्ट में कहा था कि पाकिस्तानी सरकार चीन निर्मित 'ज़ेड-10' लड़ाकू हेलीकॉप्टर उस सूरत में ख़रीदने का फ़ैसला लेगी "अगर तुर्की और अमेरिका 'टी-129' और 'ए-एच-वन्स' के ऑर्डर पूरे नहीं कर पाते हैं."

वीडियो कैप्शन, पाकिस्तान के सिंध की वो जगह जहां मकबरे ही मकबरे हैं

पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक़ लंदन स्थित 'आईक्यूपीसी' मिलिट्री हेलीकॉप्टर कॉन्फ़्रेंस में बोलते हुए पाकिस्तानी आर्मी एविएशन के कमांडर मेजर जनरल सैयद नजीब अहमद ने कहा था कि अगर तुर्किश एयरोस्पेस 'टी-129' और बेल 'एएचवन' वाइपर कई कारणों से नहीं दे पाता है तो चीनी एयरक्राफ़्ट इंडस्ट्रीज़ कार्पोरेशन का 'ज़ेड-10 एमई' एक विकल्प के तौर पर बरक़रार है.

अमेरिका की भूमिका

पाकिस्तानी विश्लेषकों का मानना है कि हर बार यह साबित हुआ है कि वॉशिंगटन ने पाकिस्तान को बिना भरोसे के फ़ौजी साज़ो-सामान उपलब्ध कराया है.

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ब्रिगेडियर (रिटायर) फ़ारूक़ हमीद कहते हैं कि 'सन 1980 में जब अमेरिकी अफ़ग़ानिस्तान में हमारी मदद चाहते थे तो उन्होंने हमें 20 कोबरा लड़ाकू हेलीकॉप्टर दिए थे लेकिन जब रूसी अफ़ग़ानिस्तान से वापस चले गए तो अमेरिकियों ने कोबरा हेलीकॉप्टर की मरम्मत के लिए पुर्ज़े देने से इनकार कर दिया. उस वक़्त हमारे लिए अपने कोबरा हेलीकॉप्टर को ऑपरेशनल रखना भी मुश्किल हो गया था."

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को एक बार फिर अपनी पूरी निर्भरता किसी एक पर नहीं रखनी चाहिए.

उनका कहना था कि 'अब हमारे पासे हमारे फ़्लीट में रूस में निर्मित 'एमआई 35' लड़ाकू हेलीकॉप्टर्स मौजूद हैं, हमारे पास अमेरिकी हेलीकॉप्टर्स हैं और जल्द ही हमारे पास चीनी लड़ाकू हेलीकॉप्टर भी होगा.'

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