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काबुल एयरपोर्ट पर हमला करने वाले इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान कौन हैं?
- Author, फ़्रैंक गार्डनर
- पदनाम, बीबीसी सुरक्षा संवाददाता
- पढ़ने का समय: 3 मिनट
'आईएसआईएस-के' या इसे और विस्तार से कहें तो 'इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान प्रॉविंस' (आईएसकेपी) ख़ुद को 'इस्लामिक स्टेट' कहने वाले चरमपंथी संगठन का क्षेत्रीय सहयोगी है. ये अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में सक्रिय है.
अफ़ग़ानिस्तान के सभी जिहादी चरमपंथी संगठनों में ये सबसे ज़्यादा ख़तरनाक और हिंसक माना जाता है.
इराक़ और सीरिया में जब 'इस्लामिक स्टेट' अपने चरम पर था तो जनवरी, 2015 में आईएसकेपी की स्थापना हुई थी.
ये तब की बात है जब अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने 'इस्लामिक स्टेट' के स्वघोषित ख़िलाफ़त को शिकस्त नहीं दी थी.
ये संगठन अफ़ग़ान और पाकिस्तानी दोनों ही जिहादियों की भर्ती करता है.
ख़ासकर अफ़ग़ान तालिबान छोड़कर आने वाले उन लोगों को जो ये मानते हैं कि उनका अपना संगठन उतना कट्टर नहीं रह गया है.
कितना कट्टर है ये चरमपंथी संगठन?
हाल के सालों में हुए कुछ सबसे जानलेवा हमलों के लिए इस्लामिक स्टेट की ख़ुरासान शाखा को ज़िम्मेदार ठहराया गया है.
इसके टारगेट पर लड़कियों के स्कूल, अस्पताल और यहां तक कि अस्पताल का एक जचगी (मैटरनिटी) वॉर्ड तक रहा है.
मैटरनिटी वॉर्ड पर हमले में इसके लड़ाकों ने गर्भवती महिलाओं और नर्सों को गोली मार दी थी.
'आईएसआईएस-के' तालिबान की तरह नहीं है जिसने अपनी हदें अफ़ग़ानिस्तान तक सीमित रखी हैं.
ये संगठन 'इस्लामिक स्टेट' के वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा है जिसका मक़सद पश्चिमी, अंतरराष्ट्रीय और मानवतावादी ठिकानों को निशाना बनाना है, चाहे वे कहीं भी हों.
ये कहां सक्रिय हैं?
अफ़ग़ानिस्तान के पूर्वी प्रांत नंगरहार में 'आईएसआईएस-के' का ठिकाना है.
पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच होने वाले नशीले पदार्थों का कारोबार और मानव तस्करी के रास्ते इसके पास से ही गुज़रते हैं.
एक वक़्त था जब इस्लामिक स्टेट के पास लगभग 3,000 लड़ाके हुआ करते थे.
लेकिन तालिबान, अफ़ग़ान सुरक्षा बलों और अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना के साथ हुए मुठभेड़ों में इसे काफ़ी नुक़सान पहुंचा.
क्या तालिबान से उनका कोई रिश्ता है?
सतही तौर पर कहें तो 'हां'. ये कनेक्शन एक तीसरी पार्टी के ज़रिए हैं और उसका नाम है हक़्क़ानी नेटवर्क.
शोधकर्ताओं का कहना है कि 'आईएसआईएस-के' और हक़्क़ानी नेटवर्क के बीच तगड़े कनेक्शंस हैं.
इस बुनियाद पर उनका तालिबान के साथ क़रीबी रिश्ता बन जाता है.
तालिबान ने काबुल की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी जिस शख़्स को दी है, वो ख़लील हक़्क़ानी हैं.
अमेरिका ने ख़लील हक़्क़ानी के सिर पर 50 लाख डॉलर का इनाम रखा हुआ है.
एशिया पैसिफ़िक फ़ाउंडेशन के डॉक्टर सज्जन गोहेल अफ़ग़ानिस्तान के चरमपंथी संगठनों पर सालों से नज़र रखे हुए हैं.
वे कहते हैं, "साल 2019 से 2021 के बीच कई प्रमुख हमलों में आईएसआईएस-के, हक़्क़ानी नेटवर्क और पाकिस्तान में सक्रिय अन्य चरमपंथी गुटों की साझेदारी वाली भूमिका रही है."
जब तालिबान ने 15 अगस्त को काबुल को अपने नियंत्रण में लिया तो पुल-ए-चरकी जेल से बड़ी संख्या में क़ैदियों को रिहा कर दिया गया. इनमें इस्लामिक स्टेट और अल-क़ायदा के चरमपंथी थे. ये लोग बड़ी संख्या में हैं.
लेकिन आईएसआईएस-के के तालिबान के साथ गहरे मतभेद हैं. आईएसआईएस-के का आरोप है कि तालिबान ने जिहाद और मैदान-ए-जंग का रास्ता छोड़कर क़तर की राजधानी दोहा के महंगे और आलीशान होटलों में अमन की सौदेबाज़ी को चुना है.
इस्लामिक स्टेट के चरमपंथी आने वाली तालिबान हुक़ूमत के लिए एक प्रमुख सुरक्षा चुनौती हैं.
तालिबान नेतृत्व और पश्चिमी ख़ुफया एजेंसियां शायद इस बात पर एकमत होंगी.
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