मुख्य चर्चा जलवायु परिवर्तन पर

राष्ट्रमंडल देशों के शिखर सम्मेलन के पहले दिन के एजेंडे में जलवायु परिवर्तन को प्रमुखता दी गई है.
त्रिनिदाद के पोर्ट ऑफ़ स्पेन में हो रही बैठक को कोपेनहेगेन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से ठीक पहले हो रहा महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन बताया जा रहा है.
पहली बार राष्ट्रमंडल शिखर सम्मेलन में संगठन से बाहर के देशों के नेताओं को भी आमंत्रित किया गया है.
सम्मेलन में भाग लेने वालों में फ़्रांस के राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी, डेनमार्क के प्रधानमंत्री लार्स रैसमुसेन और संयुक्तराष्ट्र महासचिव बान की मून शामिल हैं.
बैठक में जलवायु परिवर्तन के अलावा जिन दो अन्य प्रमुख मुद्दों को प्रमुखता दी गई है, वो हैं- रवांडा की सदस्यता का आवेदन और अगले शिखर सम्मेलन के लिए श्रीलंका की मेज़बानी की पेशकश.
बढ़ता जल स्तर
कोपेनहेगेन का जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 7 दिसंबर को शुरू हो रहा है ऐसे में दुनिया के 53 देशों के नेताओं की त्रिनिदाद बैठक में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे के हावी रहने की संभावना पहले से ही थी.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने राष्ट्रमंडल बैठक को कोपेनहेगेन से पहले का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बताया है.
बैठक का शुभारंभ करते हुए ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने भी पर्यावरण संबंधी चुनौतियों की बात की. उन्होंने कहा, “पर्यावरण पर ख़तरे को लेकर चिंता पहले से ही रही है, लेकिन अब एक विश्व स्तर की चुनौती बन गई है.”
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रमंडल के 53 सदस्य देशों में लगभग आधे द्वीपीय देश हैं, और उन्हें बढ़ते समुद्री जल स्तर से भारी ख़तरा है.
उनकी चिंता को स्वर दिया राष्ट्रमंडल महासचिव कमलेश शर्मा ने. उन्होंने धनी देशों से अपील की कि वे जलवायु परिवर्तन के ख़तरों से निबटने के लिए ग़रीब देशों की बढ़-चढ़ कर मदद करें.
शर्मा ने कहा, “ग़रीब देशों के प्रति धनी देशों का बहुत ही स्पष्ट दायित्व है. राष्ट्रमंडल के कई देशों पर अस्तित्व का संकट है. कार्बन उत्सर्जन में इन देशों की भूमिका नहीं के बराबर है, लेकिन संकट का सामना, सबसे पहले उन्हें ही करना पड़ेगा.”
विवादास्पद मुद्दे
त्रिनिदाद सम्मेलन में रवांडा की राष्ट्रमंडल सदस्यता पर विचार किया जाएगा. उल्लेखनीय है कि राष्ट्रमंडल मूलत: अंग्रेज़ी विरासत वाले देशों का संगठन है, लेकिन रवांडा में मुख्य रूप से फ़्रांसीसी भाषा बोली जाती है.
रवांडा ने फ़्रांस के साथ तनातनी के चलते राष्ट्रमंडल की सदस्यता की अर्ज़ी दी है.
माना जाता है कि सम्मेलन के दौरान ज़िम्बाब्वे की सदस्यता दोबारा बहाल किए जाने के मुद्दे पर भी विचार हो सकता है.
एक विवादास्पद मुद्दा 2011 के शिखर सम्मेलन की मेज़बानी का भी हो सकता है क्योंकि ब्रिटेन ने साफ़ कर दिया है कि वह श्रीलंका की दावेदारी का विरोध करेगा.
































