यूरो को बचाने के लिए ब्रसेल्स में अहम बैठक

यूरोपीय संघ के 27 नेता यूरो मुद्रा वाले देशों यानी यूरोज़ोन में ऋण संकट के फैलते प्रभाव को रोकने के लिए एक अहम शिखर बैठक में हिस्सा ले रहे हैं.
यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष जोज़े मैनुएल बरोज़ो ने चेतावनी दी कि ब्रसेल्स में हो रही इस बैठक पर पूरी दुनिया की निगाहें लगी हैं.
वहीं हालात की गंभीरता को रेखांकित करते हुए फ़्रांसीसी राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी ने दावा किया कि यूरोप के टूट जाने का ख़तरा इससे पहले इतना ज़्यादा कभी नहीं था.
फ़्रांस और जर्मनी मिलकर यूरोपीय संघ के लिए एक नई संधि लाने की योजना पर काम कर रहे हैं जिसके तहत देशों के बजट घाटे को कम करने की कोशिश होगी.
जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल ने कहा है कि फ़िलहाल देशों को राष्ट्रीय हित किनारे रखकर काम करना होगा.
इन यूरोपीय देशों के बीच देर रात तक बातचीत जारी रही है और कोई भी ये सुनिश्चित रूप से नहीं कह पा रहा है कि बातचीत का नतीजा क्या निकलेगा.
वहाँ पहुँचे हर नेता ने ये तो माना है कि यूरोज़ोन को बजाए रखना और बाज़ार का संकट दूर करना सबकी प्राथमिकता है. मगर ये किया कैसे जाए इसे लेकर देशों की राय अलग-अलग है.
यूरोज़ोन में बजट घाटे पर लगाम कसने जैसे कुछ क़दम इस समझौते का हिस्सा हैं मगर उन्हें पहले ही काफ़ी कड़ाई से लागू किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर विवाद बना हुआ है.
ब्रिटेन

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सम्मेलन में पहुँचने के साथ ही ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि वो ऐसा कोई भी क़दम स्वीकार नहीं करेंगे जिससे ब्रितानी हितों की अनदेखी होती हो.
शिखर वार्ता शुरू होने से पहले कैमरन की जर्मन चांसलर मर्केल और फ़्रांसीसी राष्ट्रपति सार्कोज़ी के साथ लगभग 45 मिनट की बातचीत हुई मगर अधिकारियों के अनुसार उसमें कोई प्रगति नहीं हुई.
कई अन्य देशों ने भी अपनी आपत्तियाँ ज़ाहिर की हैं मगर फ़्रांस और जर्मनी ने पिछले दिनों ये स्पष्ट किया है कि आधे-अधूरे क़दमों के दिन अब लद चुके हैं.
सार्कोज़ी ने तो इस बात पर ही ज़ोर दिया है कि अब एक नई संधि की सख़्त ज़रूरत है. अब अगर यूरोपीय संघ के सभी 27 सदस्य देश उस पर राज़ी नहीं होते हैं तो माना जा रहा है कि ये देश यूरो मुद्रा वाले देशों को उसमें लेकर बाक़ी अन्य देशों को उसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित करेंगे.
मर्केल ने तो कहा है कि यूरो की विश्वसनीयता ख़त्म हो चुकी है जिसे बहाल करने की ज़रूरत है.
दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसा लग रहा है कि यूरो मुद्रा वाले देश इस बड़े संकट के मद्देनज़र अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता का एक बड़ा हिस्सा क़ुर्बान करने को तैयार दिख रहे हैं.
इसकी वजह से ब्रिटेन पर दबाव बढ़ सकता है और इस समय यूरोपीय संघ के आगे बढ़ने की ओर ये काफ़ी बड़े परिवर्तन का समय है.
































