कोरोना महामारी के बहाने नागरिकों की सरकारी निगरानी किस हद तक जाएगी

कोरोना महामारी, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

कोरोना महामारी ने भले ही मज़बूत मौजूदा विश्व व्यवस्था को बुरी तरह से हिलाकर रखा दिया हो लेकिन आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के इकोसिस्टम को आगे बढ़ाने में इसने अहम भूमिका निभाई है.

न केवल कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने और वायरस को फैलने से रोकने के काम में इस तकनीक की मदद ली जा रही है, बल्कि नागरिकों की निजता का उल्लंघन करने और नागरिकों पर निगरानी का दायरा बढ़ाने के लिए भी अभूतपूर्व तरीक़े से इसका इस्तेमाल किया जा रहा है.

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को लेकर जानकारों की चेतावनी के बावजूद कोरोना महामारी से जंग में ये बेहद अहम साबित हो रहा है.

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर दो कड़ी की इस सिरीज़ की पहली कड़ी पढ़िए यहां - कोरोना महामारी से जंग में कितना काम आएगा आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस

हाल में बीबीसी हार्डटॉक कार्यक्रम में जाने-माने दार्शनिक और लेखक युवाल नोआ हरारी ने कहा था, "लोग पीछे मुड़कर बीते सौ सालों की तरफ़ देखेंगे तो पाएंगे कि कोरोनो महामारी मानव इतिहास का वो दौर था जब सर्विलांस की नई ताक़तों ने अपना सिक्का जमाया, ख़ासकर इस दौर में इंसान के शरीर की मशीन के ज़रिए निगरानी करने की क्षमता बढ़ी है. मुझे लगता है कि इक्कीसवीं सदी में सबसे महत्वपूर्ण विकास यही है कि इंसान को हैक करने में कामयाबी मिल गई है."

हरारी कहते हैं, "बायोम्ट्रिक डेटा एक ऐसा सिस्टम बनाने में सक्षम है जो इंसान को इंसान से बेहतर समझता है."

इस जाने-माने इसराइली लेखक का इशारा उन समार्टफ़ोन मोबाइल ऐप्स और ख़ास ब्रेसलेट की तरफ़ था जो ये पढ़ सकेंगे कि इंसान के दिमाग़ में क्या चल रहा है और वो कैसी भावनाओं से गुज़र रहा है.

इसराइली विचारक युवाल नोआ हरारी
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एक हो रहे हैं 'मैन और मशीन'

सुनने में ये किसी साइंस फ़िक्शन की कहानी जैसा लगता है, लेकिन जल्द ही ये सच्चाई बन सकता है.

वैन्कूवर में मौजूद तकनीकी मामलों के जानकार कुमार बी. गंधम ने बीबीसी को बताया कि "इस तरह का एक प्रयोग अब एडवांस्ड स्टेज पर है जिसमें आप जो कुछ सोचते हैं उसके बारे में मशीन को पता चल जाएगा."

ड्राइवर-लेस कार बनाने के काम में लगी इलोन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक इस प्रयोग को लिए ज़रूरी आर्थिक मदद की व्यवस्था कर रही है.

15.8 करोड़ डॉलर की फ़ंडिंग के साथ शुरू हुए अमरीका के कैलिफ़ोर्निया की इस स्टार्ट-अप कंपनी ने दुनिया का सबसे छोटा चिप बनाया है जिसे इंसान के दिमाग़ के भीतर फिट किया जा सकेगा.

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इंसान के बाल से बारीक इस चिप को रक्तवाही धमनियों के चारों ओर बांधा जा सकता है. ये चिप एक हज़ार अलग-अलग जगहों की पहचान कर सकेंगे. इसे एक वीयरेबल डिवाइस (शरीर पर पहनी जाने वाली घड़ी जैसी छोटी मशीन) से जोड़ने पर इंसान के दिमाग़ में क्या चल रहा है ये जाना जा सकेगा.

इस तरह की जानकारी इकट्ठा होने के बाद मशीन लर्निंग इससे एक पैटर्न बना सकेगी, इसे वैज्ञानिक भाषा में डीप लर्निंग कहते हैं. इस प्रयोग में निवेश करने वालों को उम्मीद है कि इसके ज़रिए जल्द ही वो समय आएगा जब मशीनें वही सोच सकेंगी जो इंसानी दिमाग़ सोच सकता है.

लेकिन इसके परिणाम भयंकर हो सकते हैं. अगर ये तकनीक सफल हो जाती है और कमर्शियल इस्तेमाल के लिए उपलब्ध हो जाती है तो निरंकुश नेता इसका इस्तेमाल भविष्य में ये जानने के लिए कर सकते हैं कि वो जो भाषण दे रहे हैं कौन उसे पसंद कर रहा है और कौन नहीं.

हरारी कहते हैं कि अगर आप किसी से नाराज़ होते हैं, किसी पर ग़ुस्सा होते हैं या फिर नेता के भाषण से असहमत होते हुए भी उसके लिए बेमन से ताली बजाते हैं तो ये तकनीक नेता को इस बारे में जानकारी दे देगी.

इसके ज़रिए व्यक्तियों और समूहों दोनों को टारगेट किया जा सकता है और उनके विचारों को पढ़ा और बदला जा सकता है. इससे विरोध का दमन किया जा सकेगा और एक तरह से कहा जाए तो डेमोक्रेसी का ख़ात्मा हो सकता है.

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आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस क्या है?

जानकार कहते हैं कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेन्स एक तरह की तकनीक है जो कंप्यूटर को इंसान की तरह सोचना सिखाती है. इस तकनीक में मशीनें अपने आसपास के परिवेश को देखकर जानकारी इकट्ठा करती हैं और उसी के अनुरूप प्रतिक्रिया देती हैं.

इसके लिए सटीक डेटा की ज़रूरत होती है, हालांकि मशीन लर्निंग और एल्गोरिद्म के ज़रिए ग़लतियां दुरुस्त की जा सकती हैं. इससे समझा जा सकता है कि आज के दौर में डेटा क्यों बेहद महत्वपूर्ण बन गया है.

कितना सुरक्षित है आरोग्य सेतु मोबाइल ऐप?

इसी साल दो अप्रैल को भारत सरकार ने कोरोना वायरस के मामलों को ट्रेस करने के लिए एक मोबाइल ऐप लॉन्च किया, जिसका नाम है आरोग्य सेतु. लॉन्च होने के बाद से ही ये मोबाइल ऐप विवादों में घिर गया.

सबसे पहले इस ऐप पर सवाल तब उठाए गए जब सरकार ने सभी सरकारी और ग़ैर-सरकारी कर्मचारियों के लिए ये ऐप डाउनलोड करना बाध्यकारी कर दिया.

ये सवाल उठाया गया कि ऐप यूज़र के फ़ोन के ब्लूटूथ और जीपीएस का इस्तेमाल करता है जिस कारण इससे यूज़र की सभी गतिविधियों के बारे में जाना जा सकता है.

इस ऐप की प्राइवेसी पॉलिसी में भी स्पष्ट लिखा था कि ऐप इस्तेमाल करने पर "रजिस्ट्रेशन के वक़्त यूज़र के लोकेशन के बारे में जानकारी इकट्ठा कर सर्वर में अपलोड की जाएगी. "

मोदी सरकार का कहना है कि "ब्लूटूथ के ज़रिए कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, कॉन्टैक्ट मैपिंग और संभावित हॉटस्पॉट की पहचान कर, ये ऐप कोरोना महामारी को फैलने से रोकने में मदद करेगा."

आरोग्य सेतु ऐप

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हाल में जारी एक बयान में सरकार ने कहा है कि 26 मई तक देश में 11.4 करोड़ लोग इस ऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं. सरकार का दावा है कि, "दुनिया के किसी भी कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप की तुलना में ये कहीं अधिक है."

12 भाषाओं में उपलब्ध इस ऐप के 98 फ़ीसदी य़ूज़र ऐन्ड्रॉएड ऑपरेटिंग सिस्टम के ज़रिए इस्तेमाल कर रहे हैं. सरकार के बयान के अनुसार इस ऐप के ज़रिए अब तक नौ लाख यूज़र्स से संपर्क किया जा चुका है और उन्हें क्वारंटीन में रहने, सावधानी बरतने या फिर टेस्टिंग करवाने के लिए कहा जा चुका है.

और इसके ज़रिए जो डेटा इकट्ठा किया जा रहा है उसका क्या? इस बारे में सरकार का कहना है कि ऐप के ज़रिए जो डेटा इकट्ठा किया जा रहा है वो महामारी के बाद ख़ुद-ब-ख़ुद ही नष्ट हो जाएगा.

पहले इस मामले में विवादों से बचने की कोशिश कर रही सरकार ने अब इस मोबाइल ऐप का प्रोडक्ट डिज़ाइन और सोर्स कोड भी सार्वजनिक कर दिया है.

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अब तक दुनिया भर की 30 से अधिक सरकारें कोविड-19 के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए इस तरह के मोबाइल ऐप लॉन्च कर चुकी हैं.

कोविड-19 क़ॉन्टैक्ट ट्रेसिंग के लिए चीनी सरकार का आधिकारिक मोबाइल ऐप यूज़र के मूवमेन्ट को कंट्रोल करता है, उनका डेटा इकट्टा करता है जो निजता का उल्लंघन है लेकिन महामारी के बाद इस मोबाइल ऐप को हटाया जाएगा या नहीं इस पर न तो भारत सरकार कुछ कह रही है और न ही चीनी सरकार.

सैद्धान्तिक रूप से ऐसा कुछ नहीं जो महामारी के ख़त्म होने के बाद भी सरकारों को इसे बाध्यकारी करने से रोक सके.

दुनिया भर की सरकारें किस तरह आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर रही हैं, इस बारे में पिछले साल के आख़िर में अमरीकी थिंक टैंक कार्नेगी ने एक रिपोर्ट जारी की थी.

इस रिपोर्ट के अनुसार वो सरकारें जो ख़ुद को उदार लोकतंत्र कहती हैं वो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस आधारित सर्विलांस का अधिक इस्तेमाल कर रही हैं. चीनी और अमरीकी कंपनियों ने अब तक क़रीब सौ देशों की सरकारों को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस तकनीक बेची है.

रिपोर्ट के अनुसार उदार लोकतंत्रिक सरकारों की अपेक्षा निरंकुश सरकारें इस तकनीक का अधिक ग़लत इस्तेमाल कर सकती हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है, "चीन, रूस और सऊदी अरब जैसे देश अपने नागरिकों की निगरानी करने के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन अपने राजनीतिक हित साधने के लिए कोई भी इस तकनीक का ग़लत इसतेमाल कर सकता है."

कोरोना महामारी, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस

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कुमार बी. गंधम कहते हैं कि लोगों का बायोमेट्रिक डेटा इकट्ठा करने वाली भारतीय व्यवस्था, आधार पहले ही विवादों में घिरी है.

वो कहते हैं कि, "इसे लेकर न केवल हैकिंग से जुड़ी चिंताएं हैं बल्कि ये भी बड़ी चिंता है कि तकनीक का इस्तेमाल कर सरकार किसी व्यक्ति की जासूसी कर सकती है."

वो कहते हैं, "आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एल्गोरिद्म और मशीन लर्निंग बड़ी मात्रा में डेटा पर निर्भर करते हैं. भारत सरकार के पास 1.3 अरब लोगों का डेटा है. इसका इस्तेमाल लोगों के बैंक खाते में सीधे पैसा पहुंचाने के लिए किया जा सकता है, तो लोगों के सर्विलांस के लिए भी."

सरकारी आश्वासन के बावजूद आरोग्य सेतु ऐप को लेकर वो नर्वस महसूस करते हैं. वो कहते हैं, "मेरी चिंता ये है कि यूज़र होने के नाते मैं आरोग्य सेतु ऐप को कंट्रोल नहीं कर सकता बल्कि इसका कंट्रोल सरकार के हाथों में है. अगर सरकार इसके ज़रिए मेरे मूवमेन्ट की जानकारी रख सकती है तो एक यूज़र के तौर पर ऐप को लेकर सरकार की आलोचना कर सकता हूं."

नक्शे पर

दुनिया भर में पुष्ट मामले

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स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां

आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST

न्यूयॉर्क में मौजूद आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एक्सपर्ट योगेश शर्मा कहते हैं कि "किसी भी थर्ड पार्टी ऐप के इस्तेमाल को लेकर डेटा प्रावेसी और मॉनिटरिंग की चिंता होती है."

उनका कहना है कि भारत जैसे देशों को नियमन की ऐसी व्यवस्था लाने की ज़रूरत है जिसमें यूज़र को न केवल अपना ऑनलाइन डेटा नष्ट करने की ताक़त मिले बल्कि वो कंपनियों को ये गुज़ारिश कर भी कर सकें कि उनका डेटा किसी के साथ साझा न किया जाए या फिर कंपनी के सर्वर से उनका डेटा हमेशा के लिए मिटाया जाए.

हालांकि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर काम करने वाली सिंगापुर की कंपनी QUILT.AI का मानना है कि डेटा को लेकर अकारण अधिक चिंता जताई जा रही है.

कंपनी के सह-संस्थापक अंगद चौधरी और अनुराग बैनर्जी कहते हैं कि आरोग्य सेतु ऐप में व्यक्ति की पहचान को उसके ट्रेवल हिस्ट्री से जोड़कर देखने की कोशिश की गई है.

"हम इस ऐप के बारे में बोलने के लिए योग्य तो नहीं हैं लेकिन हम मशीन लर्निंग मॉडल्स के बारे में जानते हैं और जितना सटीक डेटा होगा मॉडल भी उतना ही कारगर होगा. अगर ये ऐप डेटा के तौर पर जगह, व्यक्ति की पहचान और ट्रेवल हिस्ट्री का इस्तेमाल करता है तो चेतावनी इसी पर आधारित होगी, हमें नहीं लगता कि इससे सर्विंलांस का ख़तरा हो सकता है."

डेटा ही सोना, डेटा ही संपत्ति

अंगद चौधरी और अनुराग बैनर्जी कहते हैं कि अगर आप देखें तो समझेंगे कि हमने हमेशा से बहुत डेटा जेनरेट किया है.

वो कहते हैं, "सभी देशों के लिए डेटा इकट्ठा करना एक नियम के जैसा है. आप जनगणना को ही ले लें. नागरिकों पर निगरानी रखने की संभावना तो हमेशा रहती आई है. हमने इतिहास में इसके उदाहरण देखे हैं. अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर लोगों का डेटा पहले ही मौजूद है. बैंकों, ई-कॉमर्स प्लेफॉर्म, एयरलाइन्स, ओला, ऊबर जैसी कंपनियों के पास आपका काफ़ी डेटा मौजूद है. कोई भी कंपनी जो किसी इंसान से संपर्क करती है वो उसके बारे में कुछ न कुछ डेटा रखती है."

इसके अलावा अब लोग फ्री दिखने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी अपनी जानकारी साझा करते हैं. सही मायनों में ये प्लेटफॉर्म फ्री नहीं होता. आप इन्हें अपना डेटा देते हैं जो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इकोसिस्टम के लिए सोने की खदान के समान है. ये व्यवस्था लेन-देन पर आधारित होती है जिसमें आप कुछ पाते हैं तो कुछ देते भी हैं. और इसकी बारीकियां उस प्राइवेसी पॉलिसी में लिखी होती हैं जिन्हें आप रजिस्ट्रेशन के वक़्त बिना पढ़े स्वीकार कर लेते हैं यानी "आई अग्री" बटन दबा देते हैं.

फ़ेसबुक, ट्विटर, अमेज़न और अलीबाबा जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म इस तरह काम करते हैं. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इकोसिस्टम का इस्तेमाल करते हुए ये आपकी और लाखों लोगों की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन जाते हैं.

दक्षिण और पूर्वी एशिया में भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले सबसे अधिक हैं. . .

सोच कर देखें- गूगल पर आप जितना सर्च करते हैं उतना गूगल आपके बारे में जानने लगता है. हम गूगल मैप का इस्तेमाल करते हैं तो गूगल को पता चलता है कि हम कहां से कहां जाना चहते हैं. सोशल मीडिया पर हम जितना अधिक समय बिताते हैं उनके लिए वो उतना ही फ़ायदेमंद होता है. हम अपनी पसंद नापसंद के बारे में लिखते पढ़ते हैं और मशीनें हमारी सोच, राजनीतिक रूझान और वैचारिक सोच के बारे में जानकारी इकट्ठा कर लेती हैं.

इससे कंपनियों को सामान बेचने में आसानी होती है. हालांकि निरंकुश सरकारें इसके ज़रिए नागरिकों पर नज़र रख सकती हैं. इस जानकारी के ज़रिए राजनीतिक नेताओं के कैंपेन मैनेजर ख़ास समुदायों तक ख़ास जानकारी पहुंचा सकते हैं.

न्यूयॉर्क में मौजूद आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एक्सपर्ट योगेश शर्मा कहते हैं कि हम कम्यूटर पर काम करना शुरू करते ही हम अपने डिजिटल निशान छोड़ते जाते हैं, इसी का इस्तेमाल कंपनियां और सरकारें कर सकती हैं.

एम्बर्स नाम की कंपनी रोज़ाना सोशल मीडिया पर पोस्ट की जा रही हर तरह की जानकारी पढ़ कर विज्ञापन कंपनियों के लिए ट्रेंड्स का पता लगाती है.

QUILT.AI नाम की कंपनी कहती है कि वो इंटरनेट पर इंसान के व्यवहार को बेहतर सनमझने की कोशिश करती है. इस कंपनी के सह-संस्थापक अंगद चौधरी और अनुराग बैनर्जी कहते हैं कि वो सामाजिक मुद्दो पर काम करते हैं.

डेटा लेन-देन की व्यवस्था से वो इनकार नहीं करते और मानते हैं कि इसके लिए किसी टूल या सॉफ्टवेयर को ज़िम्मेदार ठहराना पेड़ से गिरने पर पेड़ को ज़िम्मेदार ठहराने जैसा है.

वो कहते हैं कि ये संपर्क दोनों के हित में होता है, कंपनी को कुछ मिलता है तो इसके बदले यूज़र को भी कुछ फ़ायदा होता है.

लेकिन इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि मौजूदा दौर में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, डीप लर्निंग और एल्गोरिद्म का मिला-जुला खेल इससे कहीं आगे बढ़ चुका है.

ये हमारी ज़िंदगी को कंट्रोल करने की ताक़त रखता है. निरंकुश सरकारें और बड़ी तकनीकी कंपनियां हमारे निजी ज़िंदगियों में दख़ल दे रही हैं हमारे बारे में कहीं अधिक जानकारी इकट्ठा कर रही हैं.

आज के दौर में कितनी प्रीवेसी बाक़ी है?

मोटे तौर पर ये सवाल एक दूसरे सवाल पर निर्भर करता है कि, सुरक्षित रहने के लिए हम अपनी प्राइवेसी के साथ कितना समझौता कर सकते हैं?

दिल्ली में मौजूद डेटा विश्लेषक ललित कुमार कहते हैं कि ये सीधे तौर पर इस बात से जुड़ा है कि हम उन लोगों पर कितना भरोसा करते हैं जो हमारा डेटा मैनेज कर रहे हैं.

योगेश शर्मा कहते हैं कि किसी यूज़र के लिए उसकी प्राइवेसी बेहद महत्वपूर्ण है और उस पर उसका पूरा कंट्रोल होना चाहिए.

तो क्या हमें इसके बारे में चिंतित होना चाहिए?

प्रोफ़ेसर हरारी कहते हैं कि कम से कम इस बारे में जानकरी तो होनी ही चाहिए. वो कहते हैं कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस ऐसी तकनीक है जिसका इस्तेमाल धरती को स्वर्ग बनाने के लिए किया जा सकता है तो नर्क बनाने के लिए भी किया जा सकता है.

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

सवाल और जवाब

कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

आपके सवाल

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    कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है

    सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं

    कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.

    ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.

    कोरोना वायरस के अहम लक्षणः ज्यादा तेज बुखार, कफ़, सांस लेने में तकलीफ़

    लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.

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    जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.

    यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.

    ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.

    यह नया वायरस उन सात कोरोना वायरस में से एक है जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं.
  • कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स

    वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.

    कोविड-19 के कुछ लक्षणों में तेज बुख़ार, कफ़ और सांस लेने में दिक्कत होना शामिल है.

    वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.

    इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.

  • क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक

    दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.

    ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.

    फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.

    • बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
    • जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
    • खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
  • आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता

    हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.

    इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.

    अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.

End of कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

मेरी स्वास्थ्य स्थितियां

आपके सवाल

  • अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन

    अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.

    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

  • क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड

    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

  • जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे

    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अपने आप को और दूसरों को बचाना

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    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

End of अपने आप को और दूसरों को बचाना

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आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

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