कोरोना वायरस: कम्युनिटी ट्रांसमिशन और हर्ड इम्यूनिटी क्या है?

दुनिया में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर डेढ़ करोड़ के पास पहुँच रही है, भारत में आँकड़ा 10 लाख से ऊपर जा चुका है.

दुनिया भर में मरने वालों की संख्या छह लाख से ज़्यादा हो चुकी है, भारत में मृतकों की संख्या 26,000 से ज़्यादा है.

वैक्सीन निकालने की कोशिशें हो रही हैं, मगर इसी सबके बीच कम्युनिटी ट्रांसमिशन और हर्ड इम्यूनिटी के सवाल सामने आने लगे हैं.

हालांकि भारत सरकार और इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के मुताबिक़ भारत में अभी तक कम्युनिटी ट्रांसमिशन की स्थिति नहीं आई है.

कम्युनिटी ट्रांसमिशन क्या है?

कम्युनिटी ट्रांसमिशन तब होता है जब कोई व्यक्ति किसी ज्ञात संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए बिना या वायरस से संक्रमित देश की यात्रा किए बिना ही इसका शिकार हो जाता है.

यह संक्रमण का तीसरा स्तर होता है. इस स्तर के बाद बड़े पैमाने पर संक्रमण के फैलने की आशंका रहती है.

कैसे होता है कम्युनिटी ट्रांसमिशन?

आईसीएमआर के अनुसार कोरोना वायरस फैलने के चार चरण हैं.

पहले चरण में वे लोग कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए जो दूसरे देश से संक्रमित होकर भारत में आए. यह स्टेज भारत पार कर चुका है क्योंकि ऐसे लोगों से भारत में स्थानीय स्तर पर संक्रमण फैल चुका है.

दूसरे चरण में स्थानीय स्तर पर संक्रमण फैलता है, लेकिन ये वे लोग होते हैं जो किसी ना किसी ऐसे संक्रमित शख़्स के संपर्क में आए जो विदेश यात्रा करके लौटे थे.

तीसरा चरण कम्युनिटी ट्रांसमिशन का होता है. इसमें ट्रांसमिशन के स्रोत का पता चलना मुश्किल होता है.

किसी महामारी का चौथा चरण भी होता है, जब संक्रमण स्थानीय स्तर पर महामारी का रूप ले लेता है.

हर्ड इम्यूनिटी क्या है?

अगर कोई बीमारी आबादी के बड़े हिस्से में फैल जाती है और इंसान की रोग प्रतिरोधक क्षमता उस बीमारी के संक्रमण को बढ़ने से रोकने में मदद करती है तो जो लोग बीमारी से लड़कर पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, वो उस बीमारी से 'इम्यून' हो जाते हैं, यानी उनमें प्रतिरक्षात्मक गुण विकसित हो जाते हैं. उनमें वायरस का मुक़ाबला करने को लेकर सक्षम एंटी-बॉडीज़ तैयार हो जाता है.

कैसे होता है हर्ड इम्यूनिटी?

जैसे-जैसे ज़्यादा लोग इम्यून होते जाते हैं, वैसे-वैसे संक्रमण फैलने का ख़तरा कम होता जाता है. इससे उन लोगों को भी परोक्ष रूप से सुरक्षा मिल जाती है जो ना तो संक्रमित हुए और ना ही उस बीमारी के लिए 'इम्यून' हैं.

अमरीकी हार्ट एसोसिएशन के चीफ़ मेडिकल अफ़सर डॉक्टर एडुआर्डो सांचेज़ ने अपने ब्लॉग में इसे समझाने की कोशिश की है.

वे लिखते हैं, "इंसानों के किसी झुंड (अंग्रेज़ी में हर्ड) के ज़्यादातर लोग अगर वायरस से इम्यून हो जाएं तो झुंड के बीच मौजूद अन्य लोगों तक वायरस का पहुँचना बहुत मुश्किल होता है और एक सीमा के बाद इसका फैलाव रुक जाता है. मगर इस प्रक्रिया में समय लगता है. साथ ही 'हर्ड इम्यूनिटी' के आइडिया पर बात अमूमन तब होती है जब किसी टीकाकरण प्रोग्राम की मदद से अतिसंवेदनशील लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित कर ली जाती है."

एक अनुमान के अनुसार किसी समुदाय में कोविड-19 के ख़िलाफ़ 'हर्ड इम्यूनिटी' तभी विकसित हो सकती है, जब तक़रीबन 60 फ़ीसद आबादी को कोरोना वायरस संक्रमित कर चुका हो और वे उससे लड़कर इम्युन हो गए हों.

लेकिन जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के मुताबिक हर्ड इम्यूनिटी के स्तर तक पहुँचने के लिए क़रीब 80 फ़ीसदी आबादी के इम्युन होने की ज़रूरत होती है. हर पाँच में से चार लोग अगर संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने के बाद भी संक्रमित नहीं होते हैं तब संक्रमण पर नियंत्रण रखा जा सकता है. हालांकि ये इस पर भी निर्भर करता है कि बीमारी कितनी संक्रामक है. आम तौर पर 70 से 90 फ़ीसद आबादी का इम्यून होना ज़रूरी होता है हर्ड इम्यूनिटी के स्तर तक पहुँचने के लिए.

ख़सरा, गलगंड, पोलियो और चिकन पॉक्स कुछ ऐसी संक्रामक बीमारियां हैं जो कभी बहुत आम हुआ करती थीं लेकिन अब अमरीका जैसी जगह पर दुर्लभ है क्योंकि वैक्सीन की मदद से हर्ड इम्यूनिटी के स्तर तक पहुँचने में वहाँ मदद मिली और पहुँच पाए.

अगर कोई ऐसी संक्रामक बीमारी है जिसका वैक्सीन तैयार नहीं हुआ है लेकिन व्यस्कों में उस संक्रमण को लेकर पहले से इम्यूनिटी मौजूद है तब भी ये बच्चों या फिर कमज़ोर इम्युन सिस्टम वाले लोगों को संक्रमित कर सकता है.

ऊपर जिन बीमारियों का ज़िक्र किया गया है, उनमें से कई बीमारियों के मामले में वैक्सीन बनने से पहले यह देखा जा चुका है.

कुछ दूसरे वायरस जैसे फ्लू के वायरस में समय के साथ बदलाव होता रहता है इसलिए पुराने एंटी-बॉडी जो इंसान के शरीर में तैयार हुए होते हैं वो काम नहीं आते हैं और फिर से इंसान संक्रमित हो जाता है. फ्लू के मामले में यह बदलाव एक साल से भी कम समय में हो जाता है.

अगर कोविड-19 के लिए ज़िम्मेदार सार्स-कोवी-2 दूसरे कोरोना वायरस की तरह ही है तो फिर हम इससे इम्युन होने वाले लोगों के कुछ महीने या साल तक संक्रमित नहीं होने की तो उम्मीद कर सकते हैं, लेकिन पूरी ज़िंदगी भर के लिए नहीं.

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