कोरोना वायरस: पुरुष मास्क पहनने से परहेज क्यों करते हैं?
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Author, फर्नांडो दुआर्ते
पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
काफी बहस के बाद मोनिका ने आख़िरकार घर छोड़कर अपने मां-बाप के घर जाने का फैसला ले लिया. उनके पति इडुआर्डो लगातार मास्क पहनने से इंकार करते रहे हैं. इसलिए मोनिका ने फैसला लिया कि वो अपने सात साल के बेटे के साथ अपने मायके चली जाएंगी.
मोनिका ब्राज़ील की राजधानी रियो डि जेनेरियो के एक क़रीब के शहर नितेरोई में अपने परिवार के साथ रहती हैं. अमरीका के बाद ब्राज़ील दुनिया का दूसरा ऐसा देश है जहाँ कोरोना के संक्रमण से सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं.
मोनिका बीबीसी से कहती हैं, "मुझे अस्थमा है जो मुझे कोरोना के संक्रमण के अधिक जोखिम वाले दायरे में लाता है. लेकिन मेरे पति को लगता था कि मैं नाहक ही बहुत परेशान हो रही हूँ."
"उनका तर्क था कि उन्हें मास्क पहनने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि जब वो घर से निकलते हैं तब वो किसी बंद जगह पर नहीं जाते हैं. वो यह बात नहीं सोचते थे कि वो मुझे और मेरे बेटे को जोखिम में डाल रहे हैं."
कोरोना से पुरुषों की मौत ज्यादा होने पर ही ये रवैया क्यों?
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जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के आकड़ों के मुताबिक 9 जुलाई तक दुनिया भर में 1.2 करोड़ लोग करोनो से संक्रमित हो चुके हैं और जिसमें से साढ़े पांच लाख लोगों की मौत हो चुकी है. ज्यादातर देशों में जहाँ के आकड़े उपलब्ध है, मौत की दर पुरुषों में ज्यादा देखी गई है.
हालांकि अध्ययनों और सर्वे से पता चला है कि पुरुष महिलाओं की तुलना में सुरक्षात्मक उपकरणों और मास्क पहनने से परहेज कर रहे हैं. पिछली महामारियों के दौरान भी पुरुषों में यही रवैया देखा गया था.
कोरोना के संक्रमण से बचने के लिए मास्क पहनने की सलाह व्यापक तौर पर स्वास्थ्य संस्थानों द्वारा दी गई है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने भी कहा है कि "मास्क पहनना कोरोना के संक्रमण को बढ़ने से रोकने की एक व्यापक रणनीति है." हालांकि डब्लूएचओ ने कपड़े या फिर ग़ैर-मेडिकल मास्क के प्रभाव को लेकर कहा है कि इनका असर को लेकर पर्याप्त प्रमाण नहीं है, इसलिए जब सोशल डिस्टेंसिंग संभव नहीं हो तब ही इसका इस्तेमाल किया जाए.
पूर्वाग्रह का मामला
तो अगर मास्क की मदद से कोरोना के संक्रमण को कम किया जा सकता है तो फिर पुरुष इसे पहनने से परहेज क्यों करते हैं?
मिडलसेक्स यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के सीनियर लेक्चरर वैलेरियो कैपरैरो और बर्कले के मैथेमैटिकल साइंस रिसर्च इंस्टीट्यूट की कैनेडियन गणितज्ञ हेलेनी बार्सिलो का पुरुषों के व्यवहार को लेकर बहुचर्चित विश्लेषण प्रकाशित हुआ है.
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इन दोनों ही विशेषज्ञों ने अमरीका में रह रहे करीब 2,500 लोगों पर एक सर्वे किया और पाया कि पुरुष ना सिर्फ़ महिलाओं की तुलना में मास्क पहनने को लेकर हिचकते हैं बल्कि यह भी मानते हैं कि "यह कमजोरी की निशानी है और कूल नहीं है."
वैलेरियो कैपरैरो बताते हैं कि, "यह खासतौर पर उन देशों में रवैया है जहाँ चेहरा ढकना अनिवार्य नहीं किया गया है."
इस सर्वे में देखा गया है कि महिलाएँ पुरुषों की तुलना में दोगुनी संख्या में इस बात के समर्थन में थीं कि जब "वो घर से बाहर निकलेंगी तो मास्क पहनेंगी."
"पुरुषों का यह भी मानना था कि वो महिलाओं की तुलना में संक्रमण से कम प्रभावित होंगे. जबकि विडंबना यह है कि अधिकारिक आकड़े यह दिखाते हैं कि कोरोना वायरस वाकई में पुरुषों को महिलाओं की तुलना में ज्यादा प्रभावित करते हैं."
दूसरे कुछ अध्ययनों में यह भी पता चला है कि पुरुष हाथ धोने को लेकर भी महिलाओं की तुलना में कम सकारत्मक रुख अपना रहे हैं. हाल में हुए पोल में यह बात सामने आई है कि 65 फ़ीसदी महिलाओं ने जहाँ माना है कि वो नियमित तौर पर हाथ धो रही है तो वहीं महज 52 फ़ीसदी पुरुषों ने हाथ धोने की बात मानी है.
कैपरैरो और बार्सिलो का अध्ययन अमरीका में हुए सर्वे पर आधारित है. हाल के हफ्तों में यह साफ़ हुआ है कि महामारी के दौरान पुरुष और महिलाएँ कैसे व्यवहार करते हैं, ये राजनीति से बहुत गहरे से प्रभावित हो रहा है.
कई सर्वे में यह बात सामने आई है कि डोनाल्ड ट्रंप के रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थकों की तुलना में मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग के पालन में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं.
लेकिन इस मामले में भी जेंडर के आधार पर फर्क देखा गया है. रिपब्लिकन पार्टी की 68 फ़ीसद महिला समर्थकों ने घर से बाहर निकलने पर मास्क पहनने का समर्थन किया है जबकि सिर्फ 49 फ़ीसद पुरुषों ने इस पर हामी भरी है.
मास्क के इस्तेमाल से मौत के मामलों में कमी
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मास्क का महत्व उस वक्त और बढ़ गया जब यह बात सामने आई कि कोरोना वायरस हवा में पैदा हो सकता है और बड़े ड्रॉपलेट्स की तुलना में छोटे-छोटे कणों के माध्यम से भी फैल सकता है.
जापानी वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया है कि 22 देशों में मास्क के इस्तेमाल और मौत के आकड़ों में गहरा संबंध है.
शोध संस्थान यूगो के पोल के विश्लेषण के आधार पर वैज्ञानिक डाइसुके मियाजावा और जेन कैनेको यह पाया है कि जिन देशों में लोग मास्क का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनमें प्रति दस लाख पर मरने वालों की संख्या कम पाई गई है.
दिलचस्प तो यह है कि इन 22 देशों में जहाँ मृत्यु दर ज्यादा थी वहाँ कुछ देशों में पुरुषों को मास्क का कम इस्तेमाल करते हुए पाया गया है. इसमें एक ब्रिटेन भी शामिल है.
क्या पुरुष अति-आत्मविश्वास के शिकार हैं?
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यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोपेनहेगन में बिहैवियरल वैज्ञानिक क्रिस्टीना ग्रैवर्ट मास्क पहनने को लेकर पुरुषों और महिलाओं के बीच इस फर्क को देखकर हैरान नहीं हैं.
वो कहती है कि इस बात को लेकर बड़े पैमाने पर अध्ययन हुए है कि जोखिम भरे दौर में पुरुष और महिलाएँ कैसे अलग-अलग व्यवहार करते हैं.
वो बीबीसी से बातचीत में कहती हैं कि डेनमार्क की राजधानी में आप अराम से देख सकते हैं कि कैसे महिलाएँ कोरोना के संक्रमण को रोकने को लेकर किए जाने वाले प्रयासों को लेकर अधिक गंभीर हैं.
वो बताती हैं, "कोपेनहेगन में जब कोरोना के दौरान जब वन-वे स्ट्रीट खोल कर रखा गया ताकि लोगों को एक-दूसरे के चेहरे के सामने से ना गुजरना पड़े तब मैंने देखा कि ज्यादातर पुरुष महिलाओं की तुलना में गलत दिशा में चल रहे हैं."
वीडियो कैप्शन, ब्राज़ील के राष्ट्रपति बोलसोनारो को कोरोना, मास्क उतारा
पुरुषों और महिलाओं के व्यवहार में यह फर्क पिछली महामरियों के दौरान भी देखने को मिला था. मेक्सिको सिटी में हुए एक अध्ययन में यह बात देखी गई थी कि 2009 में स्वाइन फ्लू के संक्रमण के दौरान भी महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक मास्क का इस्तेमाल कर रही थीं.
एशियाई देशों में भी यह फर्क देखने को मिल रहा है जबकि मास्क पहनने को लेकर यहाँ सामाजिक तौर पर ज्यादा स्वीकार्य है. 2002-03 में सार्स के दौरान हॉन्ग कॉन्ग में देखा गया कि महिलाएँ हाथ धोने और मास्क पहनने जैसी सवधानियाँ पुरुषों से ज्यादा बरत रही हैं.
क्या वाकई में पुरुष लपरवाह हैं?
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अध्ययनों के अलावा जो क्रिस्टीना ग्रैवर्ट का निजी अनुभव है, वो इस बात कि तस्दीक करता है. कार का बीमा करने वाली कंपनियाँ महिलाओं से पुरुषों की तुलना में कम पैसे लेती है क्योंकि दुनिया भर में सड़क हादसों में ज्यादातर पुरुष ही शिकार होते हैं लेकिन इसके पीछे का एक विरोधाभास यह भी है कि दुनिया में महिलाओं की तुलना में ड्राइविंग करने वाले पुरुषों की संख्या ज्यादा हैं.
लंदन में रहने वाले शोधकर्ता वैलेरियो कैपरैरो भी मानते हैं कि वो मास्क पहनने को लेकर लपरवाह रहे हैं.
वो बताते हैं, "कुछ महीने पहले जब मैं इटली गया था तब से मैंने मास्क पहनना शुरू किया. वहाँ मास्क पहनना अनिवार्य था. मैं बहुत सावधानी बरत रहा था और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन कर रहा था. इसने मुझे मास्क नहीं पहनने को लेकर ख़ुद को सही ठहराने में मदद की."
हालांकि अब उनका मानना है कि मास्क पहनने को अनिवार्य करने से ज्यादा पुरुष इस सलाह को मानेंगे.
उनका कहना है कि, "अध्ययन यह दिखाते हैं कि दोनों जेंडर के बीच व्यवहार का यह अंतर उन जगहों पर उतना नहीं देखा गया है जहाँ मास्क पहनने को अनिवार्य कर दिया गया है."
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.