जीन ढूँढा तिन पाइयाँ

भारत के ज्यादातर लोगों में दो प्राचीन जेनेटिक समूहों का मिश्रण पाया गया है, ये दो जेनेटिक समूह एक दूसरे से काफ़ी भिन्न हैं.
भारत में किए गए अब तक सबसे बड़े जेनेटिक सर्वेक्षण के बाद विज्ञान पत्रिका 'नेचर' में एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है जिसमें कहा गया है कि भारत की कठोर सामाजिक संरचना के बावजूद दो अलग-अलग जेनेटिक समूह आपस में घुलमिल गए हैं.
भारतीय दुनिया की आबादी का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा हैं लेकिन जेनेटिक अध्ययन के मामले में भारतीय समुदाय पर इससे पहले ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है.
दुनिया भर में जेनेटिक विविधता पर शोध करने वाली परियोजना हैपमैप इंटरनेशनल ने अफ्रीका, पूर्वी एशिया और यूरोपीय समुदायों का विस्तृत अध्ययन किया था लेकिन भारत के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध थी.
अमरीका के मैसाच्युसेट्स के ब्रॉड इंस्टीट्यूट के डेविड रीच और हैदराबाद के सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉल्युकुलर बायोलॉजी के लालजी सिंह ने पूरे भारत के 25 अलग-अलग जातीय समूह के 132 लोगों के पाँच लाख से अधिक जीनों का अध्ययन किया.
उन्होंने ये देखा कि ज्यादातर भारतीय लोगों की आनुवांशिक संरचना में दो जेनेटिक समूहों के जीन 40-60 प्रतिशत के अनुपात में हैं.
मध्य-एशिया, मध्य-पूर्व और कुछ यूरोपीय देशों में पाई जाने वाली जेनेटिक संरचना का अनुपात उन लोगों में अधिक था जो उत्तर भारतीय सवर्ण हैं जबकि दूसरे समूह में ऐसे जीन अधिक पाए गए जो भारत अलावा कहीं और नहीं पाए जाते.
भारत मूल के जीन सबसे अधिक अनुपात में अंडमान टापू में रहने वाले आदिवासी लोगों में पाए गए.
जाति व्यवस्था का असर
शोधकर्ताओं ने ये भी पाया कि जेनेटिक स्तर पर भारतीय आबादी कई तरह के छोटे-छोटे उपवर्गों में बँटी हुई है, यूरोप में यह उपविभाजन मूलतः क्षेत्रीय आधार पर है लेकिन भारत में इसका आधार जाति-व्यवस्था है.

डेविड रीच कहते हैं, "भारत में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो सदियों से एक ही गाँव या नगर में रह रहे हैं और उनकी जेनेटिक संरचना में कोई बदलाव नहीं आया है."
इस शोध से एक और बात सामने आई है कि भारत के सवा अरब लोग अपेक्षाकृत बहुत कम लोगों के वंशज हैं.
डेविड रीच कहते हैं, "ऐसी तस्वीर उभरती है कि पहले कुछ जेनेटिक ग्रुप थे जिनके उप-वर्ग बने और हज़ारों साल तक कठोर जाति व्यवस्था की वजह से उनमें कोई बदलाव नहीं हुआ क्योंकि जाति के अंदर ही विवाह करने की वजह से जीनों में परिवर्तन संभव नहीं था."
इस शोध से यह ज़रूर पता चला है कि जाति व्यवस्था काफ़ी पुरानी है लेकिन यह नहीं पता चल सका है कि कितनी पुरानी है, ऐसा लगता है कि वैज्ञानिकों ने जाति प्रथा के सामाजिक पहलू की संवेदनशीलता को देखते हुए कोई विस्तृत टिप्पणी नहीं की है.
इसके अलावा बायोमेडिक अध्ययन से जुड़ी फ़िलाडेल्फ़िया यूनिवर्सिटी की सारा त्रिशकॉफ़ का कहना है कि इससे भारतीय लोगों में होने वाले अनुवांशिक बीमारियों को समझने में भी काफ़ी मदद मिलेगी.
अमरीका के मेरीलैंड में स्थित जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अरविंद चक्रवर्ती कहते हैं कि यह तो शुरूआत है बीसियों बड़े सवालों का अभी जवाब नहीं मिला है और अभी बहुत अध्ययन की ज़रूरत है.
































