'वक़्त नहीं है, प्रयास दोगुना करें'

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने विश्व नेताओं से कहा है कि जलवायु समझौते के लिए अपना प्रयास दोगुना करें क्योंकि वक़्त निकल रहा है.
उनका कहना था, "मैं सभी विश्व नेताओं से अनुरोध करता हूं...समझौते की जगह बनाने के लिए अपना प्रयास दोगुना करें.’’
उन्होंने कहा कि आरोप प्रत्यारोप का वक़्त अब नहीं रह गया है.
इसके पहले कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में थोड़े समय विरोध स्वरूप बातचीत से पीछे हटने के बाद अफ़्रीकी देश वापस आ गए हैं.
अफ़्रीकी देशों ने ये कहते हुए बातचीत में हिस्सा लेने के इनकार कर दिया था कि उनकी चिंताओं को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है.
विकसित देशों के साथ विवाद के कारण जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में बातचीत ठप हो गई थी.
अफ़्रीकी देशों की माँग थी कि अमीर देश ग्रीन हाउस गैसों में और कटौती करें.
दूसरी ओर विकसित देशों ने भी घोषणा की थी कि जब तक ये मसला हल नहीं होगा, वो बातचीत के विभिन्न दौर में हिस्सा नहीं लेंगे.
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि जलवायु सम्मेलन का ये दूसरा और अंतिम सप्ताह है और आयोजक इस बात से बखूबी वाकिफ़ हैं कि बातचीत के लिए अधिक समय नहीं बचा है.
इसके पहले यूरोपीय संघ ने जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में कोई न कोई समझौता कराने के लिए हरसंभव प्रयास करने का इरादा जताया था.
यूरोपीय संघ के देश चीन और अमरीका के बाद इस समय संयुक्त रूप से दुनिया के तीसरे सबसे बड़े प्रदूषक हैं.
गहरा मतभेद
ये बात अब स्पष्ट हो गई है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर किसी संभावित समझौते के मामले में अमीर और विकासशील देशों के बीच गहरा मतभेद है.
इस सम्मलेन में समझौते के लिए दो मसौदे पेश किए गए हैं.
इन मसौदों में धनी देशों के लिए वर्ष 2020 तक कार्बन उत्सर्जन में 25 प्रतिशत तक की कटौती करने का लक्ष्य रखा गया है.
जो दो मसौदे पेश किए गए हैं उनमें से एक तो क्योटो संधि के विस्तार की तरह है और दूसरे में वैश्विक तापमान को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का प्रस्ताव किया गया है.
लेकिन इन मसौदों में ये नहीं कहा गया है कि आवश्यक क़दम उठाने के लिए धन की आपूर्ति कहाँ से होगी और यह क़ानूनी रुप से बाध्यकारी कब से होंगे.
इस सम्मलेन में दुनिया भर के 192 देश शामिल हुए हैं और इसमें कार्बन उत्सर्जन में कटौती किए जाने के मुद्दे पर समझौता करने की कोशिशें जारी हैं.
































