पिघलते ग्लेशियर को रोकने की मुहिम

पेरू में धीरे धीरे विलुप्त हो रहे एक ग्लेशियर को उसके पुराने हालत में लाने की कोशिश की जा रही है.
लेकिन ऐसा बर्फ़बारी के ज़रिए नहीं बल्कि पहाड़ों की सफ़ेद रंग से पुताई के ज़रिए किया जा रहा है.
पेऱु के नष्ट होते जा रहे ग्लेशियरों को दोबारा पाने की कोशिश में ये पहला प्रयोग है. लेकिन इसको लेकर लोगों की राय बटी हुई है. एक पक्ष का मानना है कि ये महज़ पागलपन है जबकि दूसरे पक्ष का मानना है कि ये एक आसान और बहुत बढ़िया उपाय है जिसे कम से कम एक बार ज़रूर आज़माना चाहिए.
पेरू के 55 वर्षीय एडूआरडू गोल्ड के इस सुझाव को विश्व बैंक ने भी पसंद किया है.
दर असल 2009 के अंत में विश्व बैंक ने ‘हंड्रेड आईडियाज़ टू सेभ द प्लैनेट’ नामक एक प्रतियोगिता आयोजित की थी.
उस प्रतियोगिता में कुल 26 सुझावों को चुना गया था. एडूआरडू का सुझाव उन्हीं में से एक था.
गोल्ड के पास वैसे तो कोई वैज्ञानिक योग्यता नहीं हैं लेकिन ग्लेशियरों का उन्होंने काफ़ी गहराई से अध्य्यन किया है. गोल्ड इस बात से काफ़ी ख़ुश हैं कि अब उनके सुझावों को अमली जामा पहनाने का समय आ गया है.
पहाड़ों को रंगने का काम शुरू
गोल्ड को अभी तक विश्व बैंक से दो लाख डॉलर की इनामी रक़म नहीं मिली है लेकिन उन्होंने अपना काम शुरू कर दिया है.
राजधानी से 100 किलोमीटर दूर समुद्र तल से लगभग 4756 मीटर की उंचाई पर चलोन सौमब्रेरो नामक चोटी पर उन्होंने अपने अभियान की शुऱूआत की.
उसी घाटी में बसे एक गांव लिकापा के निवासी पहले चूना, उद्योगों में इस्तेमाल की जाने वाली अंडे की सफ़ेदी और पानी का मिस्रण बनाते हैं.
उस घोल को किसी ब्रश से नहीं बल्कि मगों की मदद से पहाड़ की चोटी पर जाकर पत्थरों के बीच डाल दिया जाता है. ये बहुत मुश्किल काम है लेकिन उन लोगों ने दो हफ़्ते में दो हेक्टेयर की पोताई कर दी. उनका इरादा लगभग 70 हेक्टेयर में पोताई करना है.
गोल्ड कोई वैज्ञानिक नहीं हैं लेकिन उनकी सोच मामूली वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित है कि जब सूरज की रौशनी किसी सफ़ेद चीज़ पर पड़ती है तो सौर ऊर्जा लौट जाती है और सतह को गर्म नहीं करती.
अमरीका के ऊर्जा सचिव स्टीवन चू ने भी इसी तरह के एक सुझाव का समर्थन किया है जिसके तहत अमरीका में सफ़ेद छतों के इस्तेमाल करने की बात कही गई है.
गोल्ड के मुताबिक़ पहाड़ों को रंगने से उसकी चोटी पर ठंडक होगी जिससे चोटी के आस पास ठंड का वातावरण पैदा होगा.
गोल्ड ने कहा, ‘’मुझे उम्मीद है कि हमलोग यहां ग्लेशियर को दोबारा हासिल कर लेंगे क्योंकि ग्लेशियर को बनने के लिए जिस तरह के जलवायु की आवश्यक्ता होती है हम वो सब कर रहे है.’’
पेरू के पिघलते ग्लेशियर
विश्व बैंक की 2009 की रिपोर्ट के मुताबिक़ ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पेरू के 22 प्रतिशत ग्लेशियर पिछले 30 सालों मे पिघल गए हैं. और अगर उनको रोकने के लिए उचित क़दम नहीं उठाए गए तो अगले 20 सालों में बचे हुए ग्लेशियर भी पिघल जाएंगे.
पेरू के पर्यावरण मंत्री अंटोनियो बरैक के मुताबिक़ जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से बचने के लिए पेरु को सालाना 40 करोड़ डॉलर की ज़रूरत है. पर्यावरण मंत्री पहाड़ों की पोताई करने के सुझाव से सहमत नहीं हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए और बहुत सारे उपाए हैं और इन पैसों का इस्तेमाल वहीं होना चाहिए.
लेकिन मंत्रालय के जलवायु परिवर्तन प्रमुख एडूआऱडू डूरंड ने गोल्ड के सुझाव का ये कहते हुए समर्थन किया है कि हर नए विचार को ज़रूर सुना जाना चाहिए.
































