बदलेगा मच्छरों का डीएनए, डेंगू से होगा बचाव

ब्रितानी वैज्ञानिकों का कहना है कि डेंगू बुखार से निजात पाने के लिए उन्होंने आनुवांशिक रूप से परिवर्तित मच्छरों के साथ प्रयोग किया है.
प्रयोगशाला के बाहर किए गए इस परीक्षण में वैज्ञानिकों ने कैरेबिया के एक छोटे से द्वीप पर क़रीब 30 लाख नर मच्छरों को छोड़ा.
जंगलों में रहने वाली मादा मच्छरों और इन नर मच्छरों के बीच हुए प्रजनन के बाद पैदा हुए अंडे लार्वा के जन्म ले पहले ही नष्ट हो गए.
इस प्रयोग के लिए मच्छरों के डीएनए में परिवर्तन किया गया ताकि जंगलों में रहने वाली मादा मच्छरों के साथ उनके प्रजनन का प्रभाव देखा जा सके.
मच्छरों की संख्या
डेंगू एक जानलेवा रोग है जो मच्छरों के काटने से फैलता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनियाभर में हर साल डेंगू के पांच करोड़ से ज़्यादा मामले सामने आते हैं.
'ऑक्सिटेक' नामक कंपनी इस प्रयोग के ज़रिए मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों जैसे मलेरिया और डेंगू को जड़ से खत्म करने की कोशिश में जुटी है.
ऑक्सिटेक के मुताबिक इस प्रयोग के बाद कुछ महीने के अंदर ही इस इलाक़े में मच्छरों की संख्या में 80 प्रतिशत तक की कमी देखी गई. वैज्ञानिकों का कहना है कि डेंगू के संक्रमण में कमी के लिए यह काफ़ी था.
पर्यावरण पर असर
हालांकि इस प्रयोग से जुड़े लोगों का कहना है कि मच्छरों की अनुवांशिकी में ये बदलाव पर्यावरण के लिए घातक हो सकते हैं.
आलोचकों का कहना है कि आनुवांशिक रूप से परिवर्तित मच्छरों को जंगलों में छोड़ने से पर्यावरण पर विनाशकारी असर पड़ेगा.
दुनिया भर की 40 प्रतिशत आबादी पर डेंगू रोग की चपेट में आने का ख़तरा है.
इस समय इस रोग से लड़ने के लिए कोई टीका उपलब्ध नहीं है. मच्छरों से बचने के लिए मच्छरदानी का उपयोग भी ज्यादा कारगर नहीं दिखता क्योंकि जो मच्छर डेंगू रोग फैलाते हैं वे दिन के समय भी काटते हैं.
कीट-पतंगों की अनुवांशिकी में बदलाव के ज़रिए बीमारियों को खत्म करने की इस तकनीक की शुरुआत 1950 में हुई.
































