अल्ज़ाइमर्स की जल्दी पहचान संभव

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वैज्ञानिकों का कहना है कि एक नई विधि से अल्ज़ाइमर्स बीमारी के आरंभिक संकेतों का पता लगाया जा सकता है.
इस विधि में एक आधुनिक कम्प्यूटर प्रोग्राम द्वारा व्यक्ति के मस्तिष्क के स्कैन की अल्ज़ाइमर्स रोग से पीड़ित 1200 लोगों के मस्तिष्क स्कैनों के साथ तुलना की जाती है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस विधि के आरंभिक परीक्षणों से पता चलता है कि ये 85 प्रतिशत सही है.
इस विधि का विकास इंगलैंड के मॉड्स्ले अस्पताल और किंग्स कॉलेज के जैवचिकित्सा शोध केंद्र में किया गया. इसमें स्टॉकहोम के कैरोलिंस्का अस्पताल के शोधकर्ताओं ने भी हिस्सा लिया.
मस्तिष्क का स्कैन
अल्ज़ाइमर्स सोसायटी की डॉ ऐन कॉरबेट का कहना है कि इस विधि से लोगों को पहले से पता चल सकेगा कि उन्हे ये रोग है या नहीं.
डॉ ऐन कॉरबेट ने कहा," डिमैंशिया का जल्दी पता लगने से लोग अपनी स्थिति को समझ पाएंगे, उसके लक्षणों से राहत पाने के लिए उपयुक्त इलाज करा सकेंगे और अपने भावी जीवन की योजना बना सकेंगे.
डॉक्टर अल्ज़ाइमर्स रोग का पता लगाने के लिए स्मृति परीक्षणों पर निर्भर करते हैं जो बहुत विश्वसनीय नहीं होते".
रोग का पहले से पता लगाना डिमैंशिया को समझने की दिशा में पहला क़दम है.
अभी तक लोगों को इसकी बहुत सीमित जानकारी है कि डिमैंशिया क्यों होता है या इसका इलाज कैसे किया जाए.
दीर्घायु से जुड़ी समस्याएँ
लोग अब अधिक जीते हैं लेकिन वृद्धावस्था के साथ डिमेंशिया जैसी बीमारियों की संभावना भी बढ़ती है.
दुनिया भर में करोड़ों लोग अल्ज़ाइमर्स रोग से पीड़ित हैं.
जॉन राइट 69 वर्षीय गायक हैं जो पिछले दस साल से इस रोग का शिकार हैं.
लेकिन उन्हे ये समझने में दो साल लगे कि कुछ गड़बड़ है.
वो कहते हैं, "जब संगीत शुरु होता तो मैं गाने के बोल भूल जाता. शुरु में मुझे लगा कि घबराहट के कारण ऐसा हुआ है. लेकिन जब बार बार ऐसा होने लगा तो मेरी समझ में आया कि कुछ गड़बड़ है".
हालांकि डिमेंशिया का कोई इलाज नहीं है लेकिन ब्रिटिश वैज्ञानिकों का मानना है कि इस नई विधि से लोगों को भावी जीवन के बारे में फ़ैसले करने में मदद मिलेगी.
वृद्धावस्था के मनोविश्लेषक प्रोफ़ैसर साइमन लवस्टोन कहते हैं,"इससे लोगों को अपने शेष जीवन की योजना बनाने में मदद मिलेगी, चाहे वो वित्तीय प्रबंध हों या दूसरे. उनका जल्दी इलाज भी शुरु हो सकेगा".
































