स्टेम सेल बन सकता है ‘कैंसर के मरीजों’ का रक्षा कवच

प्रारंभिक शोध से पता चला है कि स्टेम सेल से ब्रेन ट्यूमर के इलाज में मदद मिल सकती है.

इमेज स्रोत, PA

इमेज कैप्शन, प्रारंभिक शोध से पता चला है कि स्टेम सेल से ब्रेन ट्यूमर के इलाज में मदद मिल सकती है.

अमरीका में हो रहे एक प्रारंभिक शोध से पता चला है कि कैंसर के मरीजों को कीमोथेरपी के दुष्परिणाम से बचाने में स्टेम सेल मददगार साबित हो सकता है.

कीमोथेरपी कैंसरग्रस्त कोशिकाओं को खत्म करने में मदद करता है, लेकिन वह अस्थि मज्जा (बोन मैरो) जैसे स्वस्थ्य ऊतकों यानि टीशू को भी नुकसान पंहुचाता है.

साइंस ट्रांसलेशन मेडिशिन में छपे शोध पत्र में कहा गया है कि इसके लिए अनुवांशिक रुप से संवर्धित (जेनेटिक मोडिफाइड) स्टेम सेल का प्रयोग किया गया.

इंगलैंड के कैंसर रिसर्च ने इसे “ पूरी तरह नए एप्रोच” से किया गया शोध बताया है.

बोन मैरो कीमोथेरपी की वजह से सबसे आसानी से प्रभावित हो जाती है.

उपचार के परिणाम को देखने से पता चला है कि सफेद रक्त कणिकाओं में लाल रक्त कणिका की तुलना में अधिक संक्रमण फैलता है और जिससे कि सांस फूलने लगती है और थकावट होने लगती है.

‘बुरा असर’

सिएटल के फ्रेड हुचिसन कैंसर रिसर्च सेंटर के शोधार्थियों का कहना है कि इसका कीमोथेरपी पर ‘काफी बुरा असर’ पड़ता था और इसके परिणामस्वरूप या तो कीमोथेरपी को रोक दिया जाता था या फिर कम कर दिया जाता था.

वहां के शोधार्थियों ने ग्लिओब्लास्टोमा का प्रयोग ब्रेन कैंसर से पीड़ित तीन मरीजों के बोन मैरो को बचाने के लिए किया था.

इस पर शोध कर रहे एक शोधार्थी डॉक्टर जेनिफर अदैर ने कहा, “यह उपचार बोन मैरो और ट्यूमर सेल्स के उपर एक जैसा असर करता है, लेकिन यह बोन मैरो का बचाव करता है जबकि ट्यूमर,सेल को छोड़ देता है.”

इस शोध में खून बनाने वाले स्टेम सेल को पूरी तरह अलग करके मरीज से बोन मैरो लिया गया था. उसके बाद सेल में वायरस वाले जीन को डाला जाता है जो कीमोथेरपी की दवा के खिलाफ काम करता है. उसके बाद सेल को मरीज में फिर से डाल दिया जाता है.

रिपोर्ट के प्रमुख लेखक प्रोफेसर हैंस पीटर कीम ने बताया, “हमें पता चला कि जब हम मरीज पर मोडिफाइड जीन का इस्तेमाल करते हैं तो अब वो ज्यादा अच्छी तरह कीमोथेरपी बर्दाश्त कर पाता है और उनके उपर कोई नकारात्मक असर नहीं होता है.”

शोधकर्ताओं का कहना है कि तीन मरीजों के उपर किए गए प्रयोग से पता चला कि वे मरीज सामान्य कैंसर के मरीज से 12 महीने ज्यादा समय तक जिंदा रहा. उनका कहना था कि कैंसर का एक मरीज तो उस प्रयोग के 34 महीने बाद अभी भी जिंदा हैं.

इंगलैंड के कैंसर रिसर्च के वैज्ञानिक प्रोफेसर सुजन शौर्ट का कहना है, “यह शोध काफी दिलचस्प है, जो बिल्कुल अलग तरह से काम करके सामान्य सेल का कीमोथेरपी करते हुए बचाव करता है.”

प्रोफेसर सुजन शौर्ट के अनुसार, “हालांकि यह पड़ताल और अधिक मरीजों पर किया जानी चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह भी हुआ कि हम अब कीमोथेरपी के लिए टेमोजोलोमाइड का प्रयोग पहले से अधिक ब्रेन ट्यूमर के मरीजों पर कर पाएगें.”