तो अपने सहकर्मियों से कभी नहीं मिलेंगे हम?

काम करती महिला

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    • Author, ब्रायन लुफकिन
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल

जल्द ही एक ऐसा दौर आने वाला है, जब आप बिना दफ़्तर गए काम किया करेंगे. बहुत से लोग तो ऐसे होंगे, जो शायद पूरी ज़िंदगी अपने साथी कर्मचारियों से रूबरू न मिलें. दोनों के बीच वर्चुअल दुनिया में ही मुलाक़ात हो.

ये दावा कोई विज्ञान फंतासी नहीं, हक़ीक़त के बेहद क़रीब है. अमरीका में हुए रिसर्च के मुताबिक़ 2005 से 2017 के बीच अमरीका में दफ़्तर से दूर रहकर काम करने वालों की संख्या में 115 फ़ीसद का इज़ाफ़ा हुआ.

2015 में अमरीका में जहां 5 लाख लोग रियल टाइम चैट रूम 'स्लैक' का इस्तेमाल करते थे. वहीं पिछले साल सितंबर में ये तादाद बढ़कर 60 लाख पहुंच गई थी.

2017 में अमरीका में हुए गैलप पोल के मुताबिक़ 43 फ़ीसद अमरीकी लोग कुछ वक़्त दफ़्तर से दूर रहकर काम करते हैं. ये 2012 के मुक़ाबले 4 प्रतिशत ज़्यादा आंकड़ा था.

वहीं ब्रिटेन में 2015 के सर्वे के मुताबिक़, 30 फ़ीसद लोग दफ़्तर से दूर रहकर बेहतर काम करने की बात कह रहे थे.

क्या हो अगर आप अपने साथियों के साथ कभी रूबरू काम ही न करें? तब आपको कैसा महसूस होगा, जब नौकरी के आपके साथी, आपके साथ बैठकर काम न करें?

क्या हम उस दौर में आ गए हैं, जब साथी कर्मचारियों की ग़ैरमौजूदगी से हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता?

इसका असर क्या होगा?

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जैसे-जैसे कंपनियां कर्मचारियों को दफ़्तर से दूर काम करने की इजाज़त दे रही हैं, वैसे-वैसे ये सवाल बड़े होते जा रहे हैं.

जानकार कह रहे हैं कि ऐसा करने से हमारी दिमाग़ी सेहत और सुकून पर इसका बुरा असर होगा.

कैसे होंगे बिना इंसानों वाले दफ़्तर ?

अगर, दुनिया के ज़्यादातर लोग घर से काम करने लगेंगे, तो आने वाले दौर में हम असल ज़िंदगी में साइंस-फिक्शन वाले नज़ारे देखेंगे. सुबह उठकर लोग अपने दिन भर के प्लान और टारगेट को दफ़्तर के पोर्टल पर अपलोड करेंगे. फिर आप वर्चुअल दुनिया में बाक़ी साथियों से बात करेंगे. हो सकता है कि आप ऐसी मीटिंगों के लिए अपनी वर्चुअल शख़्सियत को ही भेज दें.

आपका ये वर्चुअल जुड़वां साथी कर्मचारियों से, ग्राहकों से और कंपनी के क्लाइंट से बात करेगा. अमरीका के इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल फ्यूचर्स के जेम्स कैंटन कहते हैं कि हो सकता है कि मैं अपने इस वर्चुअल प्रतिरूप को कुछ फ़ैसले ख़ुद से लेने की भी आज़ादी दे दूं.

आज वैज्ञानिक ऐसे बॉट्स या मशीनें विकसित कर रहे हैं, जो सुपरकंप्यूटर रोबोट होंगे. लोग अपनी-अपनी पसंद के मुताबिक़ इन्हें डायनासोर से लेकर हॉलीवुड अभिनेत्री तक का लुक दे सकते हैं.

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आज ऐसा दौर आ गया है, जब लोग दफ़्तर के साथियों से रूबरू कम ही बात करते हैं. लोग चैट, मेल या वीडियो कान्फ्रेंसिंग से भविष्य की रणनीति पर चर्चा करते हैं. कई लोग तो हफ़्तों दफ़्तर नहीं आते.

इंसान एक सामाजिक प्राणी है. अब अगर वो अकेले सिर्फ़ स्क्रीन पर नज़र गड़ाए बैठा रहेगा, तो उसकी दिमाग़ी और जज़्बाती हालत कैसी होगी, ये सोचने वाली बात है.

अकेले काम करने का आपके दिमाग़ पर क्या असर होता है ?

जानकार मानते हैं कि अकेले काम करने से या तो कर्मचारी आलसी हो जाएंगे, या फिर उनके डिप्रेशन में जाने का ख़तरा होगा.

अमरीकी एक्सपर्ट फेथ पॉपकॉर्न ने एटी ऐंड टी, आईबीएम और कोका-कोला जैसी कंपनियों को भविष्य की रणनीति बनाने पर सलाह दी है. फेथ कहते हैं कि काम करने वालों को मन बहलाने का भी तो कोई ज़रिया चाहिए. हो सकता है कि कुछ लोग ख़ाली वक़्त में यू-ट्यूब देखें. वीआर यानी वर्चुअल रियालिटी वाले वीडियो देखें, या संगीत सुनें. हो सकता है कि कुछ कंपनियां अपने घर पर काम करने वाले कर्मचारियों को घूमने जाने का मौक़ा दें.

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अमरीकी मनोवैज्ञानिक डेविड बलार्ड कहते हैं कि कुछ लोगों के लिए अकेले काम करना ठीक नहीं है. बलार्ड कहते हैं कि दफ़्तर में रहते हुए लोग एक-दूसरे से बात करते हैं. हंसते-हंसाते हैं.

घर पर अकेले मशीनों से जूझते रहना कुछ लोगों को रास नहीं भी आ सकता है. कभी कभार तो मीटिंग से बचने के लिए वर्चुअल जुड़वां को मीटिंग में भेजने का आइडिया तो शानदार हो सकता है. मगर हर बार ऐसा करना, दिमाग़ी सेहत के लिए ठीक नहीं. इससे टीम के तौर पर काम करने में भी दिक़्क़त होगी.

बलार्ड कहते हैं कि आप किसी से मिले न हों, तो बेहतर तालमेल के साथ काम करना मुश्किल होता है.

जब आप किसी से सामने से मिलते हैं, चर्चा करते हैं, तो बात ही अलग होती है. आप लोगों के हाव-भाव, बोलने के तरीक़े, चेहरे पर शिकन या मुस्कान से अंदाज़े लगाते हैं. आवाज़ में तल्ख़ी से उसकी नाराज़गी का पता चलता है. मुस्कान उसके राज़ीनामे का कार्ड होती है. तो तनी हुई भौंहें नाराज़गी की चुगली कर देती हैं. वर्चुअल दुनिया में इसका लुत्फ़ तो होगा नहीं.

ब्रिटिश एक्सपर्ट केट लिस्टर कहती हैं कि आज दुनिया में लोगों की जज़्बाती अक़्लमंदी घटती जा रही है. क्योंकि लोग कंप्यूटर पर ही आंखें गड़ाए रहते हैं. वो खेलने नहीं जाते.

अमरीका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के रिसर्च से पता चला है कि आज के दौर में छात्र 40 फ़ीसद कम हमदर्दी रखते हैं. जबकि एक दशक पहले ये आंकड़ा ज़्यादा था. आज लोग दूसरों को समझने की कोशिश कम करते हैं.

भविष्य में ऐसे जज़्बात को अपने अंदर पैदा करना ज़रूरी होगा, क्योंकि आप अकेले होंगे. ऐसे में उन लोगों के प्रति लगाव रखना ज़रूरी होगा, जिनसे आप रूबरू नहीं होंगे.

घर से काम करने का विरोध क्यों ?

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अगर ज़्यादा कर्मचारी घर से काम करेंगे, तो कंपनियों का ख़र्च बचेगा. दफ़्तर में कई इंतज़ाम करने पड़ते हैं. उसका ख़र्च कम होगा. अमरीका में हर कंपनी औसतन एक कर्मचारी के लिए 11 हज़ार डॉलर सालाना ख़र्च करती है. ये रक़म कर्मचारी के घर से काम करने पर बच जाएगी.

लेकिन, दफ़्तर से दूर बैठे कर्मचारियों को मैनेज करना, उन पर नज़र रखना, उनके काम का सही आकलन करना बहुत बड़ी चुनौती है.

शायद यही वजह है कि कंपनियां घर से काम करने की छूट देने के अपने ही फ़ैसले को पलट रही हैं. आईबीएम ने 2007 में कहा था कि उसके 40 फ़ीसद कर्मचारी अब नियमित रूप से दफ़्तर नहीं आते. मगर अब कंपनी ने अपने कर्मचारियों को ऑफ़िस बुलाना फिर से शुरू कर दिया है.

यही फ़ैसला 2013 में याहू ने किया. याहू के एक लीक हुए मेमो से पता चला कि कंपनी ने ये देखा कि सबसे अच्छे क्रिएटिव फ़ैसले उस वक़्त लिए गए जब लोग आपस में बात कर रहे थे. कैफ़ेटेरिया में गप्पें मार रहे थे. या, अचानक बुलाई गई बैठकों के लिए जुटे.

अभी तक ऐसे आंकड़ें नहीं हैं, जो ये बताएं कि लोगों को घर से काम करने देने से कंपनियों को कितना माली नुक़सान हुआ. डेविड बलार्ड कहते हैं कि कंपनियों को असली डर तो इस बात का है कि, कर्मचारी वफ़ादार नहीं रह गए. आलसी हो गए. या, अपने निजी काम को ज़्यादा तरजीह देने लगे.

फिर भी आज लोग दफ़्तर से दूर, अपने घरों में, पार्क में या किसी कैफ़े में काम करते बड़ी तादाद में दिखने लगे हैं. दिक़्क़त इस बात में ज़्यादा हो रही है कि कंपनियां उन पर नज़र कैसे रखें. कैसे पता लगाएं कि वो अपना नहीं, कंपनी का ही काम कर रहे हैं. कुछ कंपनियां तो इसके लिए बायोमेट्रिक कार्ड या आईडी बैज का इस्तेमाल कर रही हैं.

असली चुनौती टीम मैनेजर्स की है-

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इसमें कोई दो राय नहीं कि आगे चलकर बड़ी तादाद में लोगों को घर से काम करने की आज़ादी होगी. ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती टीम मैनेजर्स की होगी. उन्हें देखना होगा कि लोग सही से टीम के तौर पर काम करें.

अमरीकी मनोवैज्ञानिक डेविड बलार्ड कहते हैं कि हम आज भी औद्योगिक क्रांति के दौर की तरह कर्मचारियों को नज़र के सामने देखना चाहते हैं. अब दौर बदल गया है. अब टीम मैनेजरों को देखना होगा कि दफ़्तर से दूर बैठे लोग भी टीम के टारगेट को समझें. बेहतर तालमेल के साथ काम करें.

इसका एक तरीक़ा ये है कि मैनेजर हर वक़्त हर टाइम ज़ोन के कर्मचारी के लिए उपलब्ध रहें. ताकि उन्हें हर बार टीम के अलग-अलग सदस्य को संकट में मदद करने में सहूलत हो.

हर वक़्त टीम के लिए ख़ुद को मुहैया कराना ही असल चुनौती है.

तकनीक हमें आज घर बैठ कर काम करने की आज़ादी देती है. लेकिन यही तकनीक हमें चौबीसों घंटे दफ़्तर और कर्मचारियों से जोड़े भी रखती है.

अब ये हमें देखना है कि हम इसका कैसे इस्तेमाल करते हैं.

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