बेस्वाद सैंडविच के दीवाने क्यों हैं नॉर्वे के लोग

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    • Author, ज़रिया गॉरवेट
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल

नॉर्वे में यह हर दिन होता है, लगभग सबके साथ होता है. सुबह साढ़े ग्यारह बजे के करीब लोग अपने बैग में कुछ तलाशना शुरू कर देते हैं.

कागजों की सरसराहट होती है और खाने के चौकोर पैकेट बाहर आने लगते हैं.

उन पर कुछ प्यारे संदेश लिखे होते हैं, जैसे- आपका दिन शुभ हो.

नॉर्वे में यह हर जगह देखा जा सकता है- दफ्तरों में, स्कूलों में, पब्लिक ट्रांसपोर्ट में.

खाने के सभी पैकेट में एक जैसे सैंडविच होते हैं. अगर इसे सही तरीके से बनाया गया है तो यह सूखा, बेस्वाद और बेज़ कलर का होता है.

विज्ञापन में काम करने वाले और नॉर्वे की संस्कृति के बारे में यू-ट्यूब चैनल चलाने वाले रोनाल्ड सागटन कहते हैं, "इसे बनाना आसान है, साथ लेकर चलना आसान है, खाना आसान है, लेकिन इसे खाकर निराशा होती है."

ब्रिटेन में दफ्तरों के कर्मचारी लंच के समय काम छोड़कर भागते हैं, कैफ़े में लाइन लगाते हैं, सुपरफूड सलाद और डेली-स्टाइल सैंडविच पर पैसे लुटाते हैं. कई लोग दोपहर का खाना भूल ही जाते हैं.

उनके उलट नॉर्वे के लोग व्यवस्थित हैं. दशकों से हर सुबह वे अपना लंच करीने से पैक करते हैं.

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परंपरा की बात

मटपके में ब्रेड के तीन या चार पतले स्लाइस होते हैं. हर लेयर के ऊपर मीट, मछली या चीज की एक लेयर होती है. इसे घर से बाहर खाने के लिए तैयार किया जाता है.

मटपके सिर्फ़ एक बेस्वाद ओपन सैंडविच से बहुत ज्यादा है. यह नॉर्वे का प्रतीक बन चुका है. यह उसके सांस्कृतिक गौरव का एक स्रोत है.

सभी बच्चे एक मटपके अपने स्कूल ले जाते हैं. बड़े लोग अपने पूरे कामकाजी जीवन में इस आदत को निभाते हैं.

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हाल ही में रिटायर हुए हेल्ज विडर होम कहते हैं कि मटपके नॉर्वे की संस्कृति का वह हिस्सा है जिसे यहां आने वाले विदेशी छात्र सबसे पहले सीखते हैं. "थैंक्यू और सो ऑन कहने से पहले भी वे मटपके कहना सीख जाते हैं."

इस परंपरा की शुरुआत 1930 में ओस्लो ब्रेकफास्ट से हुई थी. उन दिनों नॉर्वे एक गरीब मुल्क था. इस सरकारी कार्यक्रम के तहत स्कूली छात्रों को हर दिन मुफ्त में खाना दिया जाता था.

यह कार्यक्रम बहुत सफल रहा और बाद में पूरी दुनिया में इसकी नकल की गई.

नॉर्वे में कुछ समय बाद यह जिम्मेदारी अभिभावकों ने खुद उठा ली और इस तरह मटपके की शुरुआत हुई.

यह सिर्फ़ बच्चों के लंच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़ों ने भी इसे अपना लिया, चाहे वे डॉक्टर हों, छात्र हों या कंस्ट्रक्शन मजदूर.

होम कहते हैं, "नॉर्वे के अधिकतर लोगों की तरह काम करते-करते रोज मैं अपना मटपके खाता हूं."

"यह नॉर्वे का तरीका है. यह सबसे अलग है, क्योंकि स्वीडन, डेनमार्क, आइसलैंड या फिर फिनलैंड में ऐसा नहीं होता. यह नॉर्वे की अपनी परंपरा है."

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कम समय में ज्यादा काम

नॉर्वे अब एक अमीर मुल्क है. प्रति व्यक्ति जीडीपी दर के आधार पर यह दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है.

इसकी अमीरी की एक वजह उत्तर सागर में तेल के भंडार हैं. दूसरी वजह है देश की उत्पादकता.

बिजनेस मार्केटप्लेस एक्सपर्ट मार्केट की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में उत्तरी यूरोप के देशों में नॉर्वे की उत्पादकता सबसे ज्यादा थी.

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2008 की मंदी के बाद ब्रिटेन में प्रति घंटे उत्पादकता अब तक उबर नहीं पाई है. रिपोर्ट के मुताबिक नॉर्वे में उत्पादकता 9 फीसदी बढ़ी है जबकि ब्रिटेन में यह 7 फीसदी गिरी है.

मटपके का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि ब्रेक के समय का पूरा-पूरा इस्तेमाल होता है.

नॉर्वे में कर्मचारियों को सिर्फ़ 30 मिनट का लंच ब्रेक मिलता है. यह नियम सख़्त लग सकता है लेकिन यह भी सच है कि नॉर्वे में प्रति सप्ताह काम के घंटे सबसे कम हैं- औसत रूप से सिर्फ़ 38.5 घंटे. कई कर्मचारी दोपहर के 3 बजे ही घर चले जाते हैं.

होम कहते हैं, "अगर आपके ब्रेक लंबे होंगे तो काम के घंटे बढ़ जाएंगे."

देश की भौगोलिक स्थिति और लंबी पोलर नाइट्स की वजह से भी काम जल्दी खत्म करके रात होने से पहले घर पहुंच जाना अच्छा है."

ब्रिटेन में चीजें बहुत अलग हैं. यहां काम के घंटे यूरोप में सबसे ज्यादा है, लगभग 42.3 घंटे प्रति सप्ताह.

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ज़्यादा काम करते हैं नॉर्वे के लोग

कामकाज के औसत 8 घंटे के हिसाब से देखें तो ब्रिटेन के लोग नॉर्वे के लोगों की तुलना में सालाना 3 सप्ताह अतिरिक्त काम करते हैं.

होम कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि हम ज्यादा चालाक हैं, लेकिन हमें पता है कि जब हम काम पर जाते हैं तो सिर्फ़ काम करते हैं."

हम गप्पें लड़ाने, साथियों से बातें करने और खाने-पीने पर बहुत ज्यादा समय खर्च नहीं करते. जब मैं बाहर होता हूं तो यह सब ज्यादा करता हूं."

मटपके कर्मचारियों को ब्रेक में सुस्ताने का भरपूर मौका देता है. सागटन कहते हैं, "यह बहुत आसान है. इसे खोलने बनाने में ज्यादा समय नहीं लगता. 10 मिनट के अंदर आप लंच खत्म करके अपने साथियों से बातें कर सकते हैं. इसमें समय बर्बाद नहीं होता."

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मीरा रटर लंदन में प्रोडक्टिविटी कोच हैं. उनका कहना है कि हम सब इतने ही कार्यकुशल होना चाहते हैं.

"अपना बिजनेस शुरू करने से पहले मैं इन्वेस्टमेंट एंड वेल्थ मैनेजमेंट में काम करती थी. मैंने लोगों को लंच के लिए दौड़ते हुए और लाइन में लगे हुए देखा है. फिर वह अपने डेस्क पर आकर खाते हैं. सेहत के लिए यह ठीक नहीं है."

"ब्रेक के दौरान आपकी आंखों को आराम मिलना चाहिए. थोड़ा टहल लेना, थोड़ा सुस्ता लेना अच्छा है. इससे दोपहर बाद सक्रियता बढ़ जाती है."

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पौष्टिक नहीं

मटपके समय तो बचाता है, लेकिन पौष्टिकता के मामले में यह सबसे सही नहीं है.

इसकी जड़ें बच्चों का पोषण सुधारने में है, फिर भी मॉडर्न वर्जन एक संपूर्ण लंच का मॉडल नहीं हो सकता.

इसका बेस ब्राउन ब्रेड है. इसके अंदर चीज के कटे हुए टुकड़े डाले जाते हैं, खासकर ब्राउन चीज. यह क्रीम और बकरी के दूध से बनता है, जिसे ब्रूनोस्ट कहते हैं.

इस चीज का गलनांक कम होता है और यह कमरे के सामान्य तापमान पर भी फैल जाता है. यह बहुत ज्वलनशील भी होता है.

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अन्य विकल्पों में शामिल हैं ट्यूब चीज या लिवर पेस्ट.

सागटन कहते हैं, "लिवर पेस्ट आपको दूसरे नॉर्डिक देशों में नहीं मिलेगा. यह बेस्वाद होता है और यह ताजा भी नहीं होता. इसे सालों साल स्टॉक में रखा जा सकता है."

सागटन कुछ और कमियां भी बताते हैं जैसे फिलिंग की भरमार और तीन या चार स्लाइस से ज्यादा ब्रेड का इस्तेमाल.

"इसकी जरूरत सिर्फ़ तब है जब आप भूखे हों, उससे ज्यादा नहीं. फिलिंग में सलाद या मीट न डालना भी सही नहीं है."

सहकर्मियों के सामने झेंपना न पड़े इसके लिए फिलिंग में टोमैटो सॉस के साथ मैकेरल (मछली) या टिन पैक मछली के अंडे भी डाल सकते हैं.

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मटपके की एक और खासियत है ब्रेड के आकार के वर्गाकार कागज के टुकड़े.

इनको हर दो स्लाइस के बीच में डाला जाता है और खाते समय निकाल दिया जाता है. लंच आम तौर पर गर्म चाय या कॉफी के साथ किया जाता है.

मटपके में क्या-क्या डाला जाता है, इसके अलावा भी कुछ अन्य चीजें हैं जिनको नॉर्वे की लंच संस्कृति से सीखा जा सकता है.

होम के मुताबिक यहां लंच मिस करना संभव नही है. लोग हर रोज एक तय समय पर इसे खाते हैं. सेहत दुरुस्त रखने और कार्यक्षमता बढ़ाने की यह पहली शर्त है.

लंच की इस रणनीति का कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं हुआ है, लेकिन बहुत ही कामयाब लोग इसे अपनाते हैं. जैसे- अरबपति कारोबारी रिचर्ड ब्रैन्सन और हैरी पॉटर की लेखिका जे के रॉलिंग.

खाने और कसरत करने के लिए समय तय करके यह दिनचर्या को नियमित करता है. मकसद है तनाव कम करना ताकि लोग ज्यादा से ज्यादा काम कर सकें.

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बाय-पोलर डिसऑर्डर के इलाज में भी रूटीन अपनाने की सलाह दी जाती है. नॉर्वे में लोग इस समझदारी भरी सलाह से भी एक कदम आगे बढ़े हैं. वे हर दिन एक जैसा खाना खाते हैं.

सागटन के ऑफिस में हर रोज गर्मागर्म फ्री लंच मिलता है. उनका अपना इटैलियन शेफ भी है, लेकिन उनके सहकर्मी अपना मटपके लेकर आते है.

वह कहते हैं, "कई बार लंच में पाश्ता होता है. लेकिन कतार में खड़े नॉर्वेजियन अपना ब्रेड खाने लगते हैं."

"वे मटपके की तरह पाश्ता को भी वरीयता दे सकते हैं. लेकिन वे कहते हैं कि ब्रेड खाए बिना उन्हें लगता ही नहीं कि उन्होंने लंच किया है."

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खाने के बारे में क्या सोचना

मटपके कर्मचारियों को फ़ैसले लेने की थकान से भी बचाता है.

हम जो भी फ़ैसले लेते हैं उसमें हमारा दिमाग खर्च होता है. कई बार थकान बढ़ने पर हम सबसे खराब फ़ैसला कर लेते हैं. मेडिसिन जैसे कुछ पेशों में इससे किसी की ज़िंदगी दांव पर लग सकती है.

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इस समस्या को दूर करने का एक तरीका यह है कि कम अहमियत वाले कुछ फ़ैसले एक बार ले लिए जाएं और रोजाना उसी पर टिके रहा जाए.

मिसाल के लिए, फेसबुक के सीईओ मार्क ज़करबर्ग इसी वजह से ऑफिस में रोज एक ही तरह के कपड़े पहनते हैं- ग्रे टी-शर्ट और जींस.

अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी इस स्ट्रैटजी के फ़ैन हैं. वह भी ब्लू और ग्रे सूट ही पहनते हैं.

हर रोज एक ही लंच करने का फॉर्मूला अपनाने पर नॉर्वे के सुपर-प्रोडक्टिव कामगारों को दिन में एक फ़ैसला कम लेना पड़ता है.

रटर कहती हैं, "फ़ैसले लेने की थकान को दूर करना महत्वपूर्ण है. मैं अपनी क्लाएंट को सलाह देती हूं कि इसके लिए वे फॉरवर्ड प्लानिंग करें."

वैसे यह सोचना बड़ा मुश्किल है कि सारी दुनिया रोज एक ही जैसा लंच करने के लिए तैयार हो जाए. लेकिन पैक्ड लंच की नॉर्वे की इस आदत के कई फायदे हैं.

सैंडविच का स्वाद भले ही बहुत बढ़िया न हो, लेकिन इसे चखकर देखना तो बनता है.

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