फ़्लू जो दुनिया पर क़यामत बनकर टूटा था

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- Author, लौरा स्पिनी
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
मौसम बदल रहा है. खांसी, ज़ुकाम, बुख़ार और नज़ले की शिकायतें आम हैं. इसे इनफ्लुएंज़ा या फ़्लू या फिर वायरल फ़ीवर कहते हैं. आज इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता.
मगर, आज से सौ साल पहले यही फ़्लू की बीमारी पूरी दुनिया पर क़यामत बन कर टूट पड़ी थी. इसे स्पेनिश फ़्लू महामारी के नाम से जानते हैं. दुनिया इस महामारी की चपेट में 1918 से लेकर 1920 तक रही थी.
इस दौरान दुनिया के कमोबेश हर कोने में लोग फ़्लू की चपेट में आए थे. सुदूर प्रशांत महासागर तक में लोग इस महामारी से बीमार होकर मौत के शिकार बने थे.
कहा जाता है कि स्पेनिश फ़्लू की महामारी की चपेट में दुनिया के 50 करोड़ से ज़्यादा लोग आए थे. ये उस वक़्त दुनिया की कुल आबादी का एक तिहाई था. इनमे से 5 से 10 करोड़ के बीच मरीज़ बेवक़्त मौत के मुंह में समा गए थे.
स्पेनिश फ़्लू महामारी के सौ साल पूरे हो गए हैं. इस दौरान साइंस और मेडिकल साइंस ने बहुत तरक़्क़ी कर ली है. हम ख़ांसी, ज़ुकाम, बुख़ार और नज़ले को बहुत गंभीरता से नहीं लेते. ज़्यादा तकलीफ़ होने पर ही डॉक्टर के पास जाते हैं. दवा की कुछ ख़ुराकों से आराम मिल जाता है.
मगर, जब दुनिया पर स्पेनिश फ़्लू का क़हर बरपा, तो हालात एकदम अलग थे. आज सौ साल बाद इस महामारी की तस्वीर और साफ़ हुई है. पिछले 20 साल में हुई रिसर्च ने महामारी से जुड़ी कई चौंकाने वाली बातें उजागर की हैं.

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अमरीका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एलर्जी ऐंड इन्फेक्शस डिज़ीज़ेस के डॉक्टर जेफ्री टौबेनबर्गर ने हाल ही में कहा था कि स्पेनिश फ़्लू की महामारी को एक सदी गुज़रने को है मगर हम अब तक इससे जुड़े कई सवालों के जवाब नहीं तलाश सके हैं.
टौबेनबर्गर ने अपनी सहयोगी एन रीड के साथ मिलकर इस महामारी के वायरस का जेनेटिक सीक्वेंस तैयार किया था.
पूरी दुनिया में रिसर्चर स्पेनिश फ़्लू से जुड़े सवालों के जवाब तलाशने में जुटे हैं. अब तक उन्होंने जो जानकारियां जुटाई है, वो भी काफ़ी चौंकाने वाली हैं.


जो ज़्यादा सेहतमंद थे वो ज़्यादा शिकार बने
ऑस्ट्रिया के कलाकार इगोन शीले फ़्लू की वजह से अक्टूबर 1918 में मर गए थे.
कुछ दिन पहले ही इगोन की गर्भवती पत्नी भी इस महामारी की चपेट में आकर चल बसी थीं. पत्नी और अपनी मौत के बीच में बीमार, दुखी और कमज़ोर इगोन ने एक पेंटिंग बनानी शुरू की थी.
ये पेंटिंग उनके परिवार के बारे में थी, जो अधूरी रह गई थी. पेंटिंग भी अधूरी रह गई. क्योंकि इसे पूरा करने से पहले ही इगोन भी चल बसे.
इगोन शीले केवल 28 साल के थे. 1918 की महामारी में इस उम्र के लोग सब से ज़्यादा शिकार बने थे. जबकि 20-40 साल के लोगों के बारे में माना जाता है कि वो अपने जीवन के उरूज पर रहते हैं. सेहतमंद होते हैं.

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मगर इस घातक महामारी ने बहुत से परिवारों से रोटी कमाने वाले छीन लिए थे.
इस की वजह से बहुत से परिवारों को चलाने का बोझ बुज़ुर्गों पर आ पड़ा था. बड़ी तादाद में लोग अनाथ हो गए थे, जिनकी मदद करने वाला कोई नहीं था.
स्पेनिश फ़्लू का ख़तरा सबसे ज़्यादा मर्दों को था. हालांकि गर्भवती महिलाएं भी इस बीमारी की काफ़ी तादाद में शिकार हुईं.
वैज्ञानिक अभी भी इस की ठोस वजह नहीं तलाश पाए हैं कि स्पेनिश फ़्लू के शिकार युवा क्यों ज़्यादा हुए.
रिसर्चर कहते हैं कि असल में स्पेनिश फ़्लू का वायरस बहुत तेज़ी से अपने आप को बदल लेता था.
यानी जब तक इंसान का इम्यून सिस्टम इस पर जवाबी हमला करता, तब तक ये रूप बदल चुका होता था. और हमारे शरीर का किसी भी वायरस पर पहला पलटवार ही सब से ताक़तवर होता है.
नतीजा ये कि जब स्पेनिश फ़्लू का वायरस जिसे H3N8 नाम दिया गया है, वो हमारे शरीर के पहले हमले से बच निकलता था.
युवाओं के मुक़ाबले उस वक़्त के बुज़ुर्ग चूंकि अपने जीवन के पहले दौर में H1 या N1 एंटीजन का सामना कर चुके होते थे, इसलिए उनका शरीर इस वायरस के हमले का बेहतर मुक़ाबला कर पाता था.


मौत की दर पूरी दुनिया में अलग-अलग
फ़्लू के बारे में कहा जाता है कि ये लोकतांत्रिक बीमारी होती है. हर वर्ग और हर समुदाय को वायरल होता है.
लेकिन, 1918 की महामारी के दौरान ऐसा नहीं दिखा. उस वक़्त जो लोग एशियाई देशों में रह रहे थे, उनके इस वायरस के शिकार होने की आशंका यूरोपीय लोगों के मुक़ाबले 30 गुना ज़्यादा थी.
स्पेनिश फ़्लू की महामारी से सब से ज़्यादा मौतें एशिया और अफ्रीका में हुईं. इनके मुक़ाबले यूरोप, उत्तरी अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में इस महामारी से कम लौग मौत के शिकार बने.

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मगर, यूरोप में ही देखें तो डेनमार्क की आबादी का महज़ 0.4 फ़ीसद लोग इसकी वजह से मरे. वहीं हंगरी ने इससे तीन गुनी आबादी इस बीमारी के हाथ गंवा दी. शहरों में स्पेनिश फ़्लू का असर, गांवों के मुक़ाबले ज़्यादा था. शहर-शहर के बीच भी काफ़ी फ़र्क़ था.
उस वक़्त तो इस असमानता को लेकर लोगों में जागरूकता नहीं थी. मगर कई दशकों की मेहनत के बाद आंकड़े जुटाकर इस पर तफ़्सील से लिखा गया है.
लोगों की मौत के आंकड़े में फ़र्क़ की बड़ी वजह लोगों के सामाजिक-आर्थिक हालात थे.
अमरीकी शहर कनेक्टिकट में नए-नए आ कर बसे इतालवी अप्रवासी फ़्लू के सबसे ज़्यादा शिकार बने.
वहीं, ब्राज़ील के शहर रियो डे जेनेरियो की झुग्गियों में रहने वालों पर भी ये बीमारी क़हर बन कर बरपी थी.

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पेरिस में बीमारी के असर ने लोगों को असमंजस में डाल दिया. ज़्यादातर मौतें शहर के अमीरों की बस्तियों में हुई थीं.
मगर, इसका राज़ बाद में खुला. असल में अमीर लोग नहीं मर रहे थे. उनके यहां के नौकर, जो पेरिस की आलीशान इमारतों की छोटी कोठरियों में जीवन बसर करते थे, असल में वो इस महामारी के शिकार ज़्यादा हुए.
पूरी दुनिया में ग़रीब, अप्रवासी और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग स्पेनिश फ़्लू के शिकार सब से ज़्यादा बने थे. वजह साफ थी. उनके पास खाने-पीने और सुरक्षित ज़िंदगी बसर करने के संसाधन कम थे.
ऐसा नहीं है कि पिछली एक सदी में हालात बहुत ज़्यादा बदल गए. 2009 में इंग्लैंड में फैली फ़्लू की महामारी के आंकड़े बताते हैं कि इस दौरान मरने वालों में ग़रीबों की तादाद अमीर लोगों से कई गुना ज़्यादा थी.


ये केवल सांस की बीमारी नहीं थी
स्पेनिश फ्लू से 50 करोड़ से ज़्यादा लोग बीमार पड़े. अधिकतर मरीज़ इलाज से ठीक हो गए. लेकिन, जो बदक़िस्मत लोग इस महामारी से नहीं उबर सके, उनके लिए हालात बद से बदतर होते गए.
उन्हें सांस लेने में शिकायत से बीमारी की शुरुआत होती थी. फिर उनके चेहरे का रंग बदल जाता था. वो बैंगनी से नीला पड़ता जाता था. मरने के वक़्त तक ऐसे लोग काले पड़ चुके होते थे.

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हर बार मौत की वजह वायरस नहीं होता था. बल्कि वायरस के हमले से कमज़ोर हुए शरीर पर मौक़ा परस्त कीटाणु यानी दूसरी बीमारियों के बैक्टीरिया हमला कर देते थे. सबसे ज़्यादा लोगों की मौत न्यूमोनिया की वजह से हुई.
सिर्फ़ यही नहीं, स्पेनिश फ़्लू की वजह से बाल और दांत टूट कर गिर जाते थे. लोगों को चक्कर आने लगते थे. नींद न आने की शिकायत हो जाती थी. देखने-सुनने में परेशानी होने लगती थी. इसका मनोवैज्ञानिक असर भी होता था. लोग दर्द और तकलीफ़ के दौर से गुज़रते थे. इसे पोस्ट वायरल डिप्रेशन कहते हैं.
आज भी वायरल बुखार के सीज़न के बाद लोगों की दूसरी बीमारियों से मौत की घटनाएं होती हैं, जैसे दिल का दौरा पड़ना. फ़्लू न तो पहले, न 1918 में और न ही आज केवल फेफड़े की बीमारी है. इसका असर पूरे शरीर पर पड़ता है.
महामारी से सेहत की दुनिया में इंक़लाब आया
1918 की महामारी से पहले लोगों का विचार ये था कि संक्रामक बीमारियों की रोकथाम की जा सकती है. लुई पास्चर जैसे कई विद्वान मानते थे कि कमज़ोर नस्ल के लोग फ़्लू जैसी बीमारियों के शिकार ज़्यादा होते हैं.

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लेकिन, स्पेनिश फ़्लू की महामारी ने इस मिथक को तोड़ा. भले ही इसके शिकार ग़रीब लोग ज़्यादा हुए, मगर कोई भी तबक़ा इससे अछूता नहीं रहा था.
इसकी वजह से पश्चिमी देशों में स्वास्थ्य नीतियों में भारी बदलाव आया. बहुत से देशों में सेहत के मंत्रालय बनाए गए. बीमारियों की निगरानी के नए सिस्टम विकसित किए गए. समाज को सेहतमंद रखने और महामारी की रोकथाम के लिए मुफ़्त में इलाज की सुविधा शुरू की गई.
यूं तो कोई भी सार्वजनिक स्वास्थ्य योजना रातों-रात नहीं खड़ी की जा सकती. मगर 1918 की महामारी ने देशों को इस दिशा में बढ़ने को मजबूर किया.
ब्रिटेन ने आख़िरकार 1948 में नेशनल हेल्थ सर्विस की शुरुआत करके सबके लिए इलाज की व्यवस्था की.
रूस में 1920 के दशक में ही ऐसी सेवा कम्युनिस्ट क्रांतिकारी व्लादिमिर लेनिन ने शुरू की थी. हालांकि रूस की स्वास्थ्य प्रणाली शहरों में ही लागू की गई थी.
महामारी ने समाज को बदल डाला
1918 में स्पेनिश फ़्लू के क़हर से एक पीढ़ी पूरी तरह से तबाह हो गई थी. बहुत से बच्चे अनाथ हुए. कुछ अजन्मे ही मां के पेट में चल बसे.
जो नवजात इस बीमारी के बाद जन्मे, उन पर ताउम्र इसका असर रहा. वो अच्छी कमाई वाला रोज़गार नहीं हासिल कर सके.
उनके क़ैदख़ाने जाने की आशंका भी उन लोगों के मुक़ाबले ज़्यादा हुआ करती थी, जो फ़्लू के शिकार नहीं हुए थे.

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इस बात के भी सबूत हैं कि महामारी की वजह से ही 1920 के दशक में ख़ूब बच्चे पैदा हुए. पश्चिमी देशों में इस दौर को 'बेबी बूम' कहा जाता है.
1918 की महामारी ने दुनिया पर गहरा असर डाला था. जब हम किसी और महामारी से निपटने की तैयारी करें, तो हमें ये बात याद रखनी चाहिए.
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