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बेंगलुरु में रहने वालीं बालेन शाह की बहन नेपाल के भावी पीएम के बारे में क्या सोचती हैं?
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
"भारत और नेपाल के रिश्ते तभी और बेहतर होंगे जब बालेन शाह बतौर प्रधानमंत्री इस हिमालयी देश की कमान संभालेंगे", ऐसा कहना है उनकी बड़ी बहन सुजाता शाह सेजेकन का.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से बातचीत में कहा, "भारत और नेपाल के रिश्ते सदियों पुराने हैं और इन्हें कोई बिगाड़ नहीं सकता. जो हुआ, वह एक अस्थायी दौर था. स्थिति सकारात्मक ही होगी."
वह कहती हैं, "वह रिश्ते ज़रूर बेहतर करेंगे, क्योंकि मैं उन्हें एक राजनेता के रूप में नहीं देखती. उनकी भाषण शैली भी वैसी नहीं है. वह ख़ुद भी वैसे नहीं हैं. वह एक ऐसे इंसान हैं जिनके दिल में किसी के लिए बैर नहीं है, जो अपने लोगों और अपने पड़ोसियों, दोनों का ध्यान रखने वाले हैं."
वह मुस्कुराते हुए जोड़ती हैं, "उनकी दीदी भारत में है, तो वह भारत के प्रति भी अच्छे रहेंगे."
उन्हें यह जानकर भी बहुत ख़ुशी हुई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बालेन शाह की फ़ोन पर हुई बातचीत 'सकारात्मक' रही.
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जब उनसे कहा गया कि वह तो सचमुच 'राजनीतिक विश्लेषण देने वाली बड़ी बहन' की तरह बोल रही हैं, तो सुजाता ने हंसते हुए कहा, "नहीं, मुझे राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है. राजनीति में तो सिर्फ़ बालेन हैं. हमारे देश से युवा बाहर चले गए हैं. मेरे दोस्तों में कोई भी नेपाल में नहीं है. देश ख़ाली (खोखला) हो गया है. वे लोगों से वापस लौटने की अपील कर रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां अच्छी ज़िंदगी जी सकें. यह उनकी ज़िम्मेदारी है."
सुजाता एक पेंटर हैं और अपने कला‑पारखी पति हरीश सेजेकन से विवाह के बाद लंबे समय से बेंगलुरु में रह रही हैं.
'बच्चों के लिए हीरो, बुज़ुर्गों के लिए भगवान'
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने पिछले हफ़्ते नेपाल की प्रतिनिधि सभा में भारी बहुमत हासिल किया है, जिसमें बालेन शाह की लोकप्रियता का बड़ा योगदान रहा. यह चुनाव जेन‑ज़ी प्रदर्शन के बाद हुआ पहला चुनाव है जिसने पुरानी पीढ़ी के नेताओं की सरकार को गिरा दिया था.
सुजाता ने कभी जीवन में यह कल्पना नहीं की थी कि उनके भाई प्रधानमंत्री बनेंगे.
उन्होंने कहा, "जब वह काठमांडू के मेयर बने और मंदिरों के सुधार, राजधानी की संस्कृति को बेहतर बनाने का काम किया… तब हमें लगा कि वह प्रधानमंत्री भी बन सकते हैं."
अपनी बड़ी बहन की वजह से बालेन शाह पहली बार 2015 में बेंगलुरु आए थे. तब वह अपनी दीदी को उनके बेटे के जन्म के बाद वापस छोड़ने आए थे, जब एक भयानक भूकंप ने नेपाल के कई हिस्सों को तबाह कर दिया था. उस समय बालेन सिविल इंजीनियर थे.
सुजाता बताती हैं, "मैं एक महीने तक वहीं (काठमांडू में) रुकी रही क्योंकि देश में लगातार आफ्टरशॉक्स आ रहे थे और मैं अपने परिवार के साथ रहना चाहती थी. वह यहां आए और उन्हें बेंगलुरु बहुत पसंद आ गया, यहां की संस्कृति, लोग और माहौल. फिर उन्होंने निर्णय लिया कि वह निट्टे मीनाक्षी इंजीनियरिंग कॉलेज में स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग पढ़ेंगे. उनका सपना था कि वह देश को भूकंप से बचा सकें."
बालेन शाह की रैपर के रूप में लोकप्रियता, उनके बेंगलुरु आने से पहले ही फैल चुकी थी. नौवीं कक्षा से ही वह प्रतियोगिताएं जीतने लगे थे. उनके गीत समकालीन रैपर्स की तरह गाली‑गलौज भरे प्रेम गीत नहीं होते थे. उनके गीतों में सामाजिक मुद्दों की गहराई होती थी, जैसे सड़क पर रहने वाले बच्चों पर लिखा गया गीत.
सुजाता कहती हैं, "उनके शब्द लोगों के दिल को छू लेते थे. शायद उन पर हमारे पिता, जो आयुर्वेदिक डॉक्टर और कवि थे, का प्रभाव रहा होगा."
उनके अनुसार, युवा पीढ़ी के मन में उतर पाने की उनकी यही क्षमता, काठमांडू के मेयर बनने की उनकी चुनावी सफलता में भी काम आई.
सुजाता बताती हैं, "बच्चों के लिए वह हीरो जैसे थे और बुज़ुर्ग उन्हें भगवान जैसा मानते थे. बुज़ुर्ग यही कहते हैं."
बचपन में भी 'ज्ञानी पुरुष' जैसा भाव
बालेन शाह जो भी लिखते थे, उसमें परिवार का कभी कोई दख़ल नहीं होता था.
वह कहती हैं, "हमारे माता‑पिता को हमेशा भरोसा था कि वह जो भी करेंगे, सोच‑समझकर करेंगे. जब भी कोई समस्या होती, हमारे माता‑पिता हम बच्चों से पूछते कि इसका हल क्या हो सकता है. हमें सुझाव देने की पूरी आज़ादी थी. इसी वजह से हमारी सोच वैसी बनी."
सुजाता को लगातार बचपन के दिन याद आते रहते हैं.
वह कहती हैं, "मैंने उन्हें बड़ा होते देखा है. वह कभी शरारती नहीं थे. लेकिन बचपन में भी उनमें एक 'ज्ञानी पुरुष' जैसा भाव दिखता था. किसी भी बात का जवाब वह एक बड़े आदमी की तरह देते थे. बुज़ुर्ग हंस भी देते थे और साथ ही हैरान भी हो जाते थे. वह कभी उलझते नहीं थे. बहुत साफ़ बोलते थे. उनकी प्रकृति ही ऐसी थी, जब तक पूरी तरह सोच न लें, तब तक कुछ न कहना.''
लेकिन वह उनके लिए चिंतित भी रहती हैं. चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने बालेन शाह को कभी फोन नहीं किया, बस संदेश भेजती रहती थीं.
वह कहती हैं, "मुझे हमेशा उनकी चिंता रहती है कि क्या वह अपनी सेहत पर ध्यान दे पा रहे हैं या नहीं. बीच में वह काफ़ी कमजोर हो गए थे. वह देश संभालने के लिए वहां हैं, लेकिन मेरी चिंता यही रहती है कि क्या वह खुद का ख्याल रख रहे हैं या नहीं."
वह मुस्कुराते हुए आगे कहती हैं, "मेरे लिए वह सिर्फ़ भाई नहीं हैं. कई बार ऐसा हुआ कि जब मैं अपने बेटे प्रांशु को बुलाना चाहती हूं, तो गलती से बालेन का नाम ले लेती हूं. मुझे अपने बेटे में बालेन दिखते हैं और बालेन में मेरा बेटा. एक बड़ी बहन हमेशा अपने छोटे भाई को मां की तरह ही देखती है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.