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जंग के बारे में ईरानी लोगों को क्या बताया जा रहा है
- Author, रेहा कांसारा
- पदनाम, बीबीसी ग्लोबल डिसइन्फ़ॉर्मेशन यूनिट
- Author, सोरौश नेगादरी
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
पहले ख़बरें विदेशी टीवी चैनलों पर आईं, जिन्हें ज़्यादातर ईरानी लोग नहीं देख पाते हैं. 28 फ़रवरी को प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा कि "ऐसे संकेत हैं कि तानाशाह अब नहीं रहा", जिससे यह संकेत मिला कि सुप्रीम लीडर अली ख़ामेनेई अमेरिका और इसराइल के संयुक्त हमले में मारे गए हैं. लेकिन जो ईरानी लोग सरकारी टीवी देख रहे थे, उन पर इस ख़बर को लेकर पूरी तरह ख़ामोशी थी.
सरकारी अधिकारियों ने न तो ख़ामेनेई की मौत की पुष्टि की और न ही इसे नकारा. सरकारी चैनल आईआरटीवी3 पर एक न्यूज़ एंकर ने दर्शकों से कहा कि वे उस पर और सरकार के पास मौजूद "ताज़ा जानकारी" पर "भरोसा" करें.
उसने ख़ामेनेई की मौत की ख़बर को "बिना आधार वाली अफ़वाह" बताया और कहा कि "सच जल्द सामने आ जाएगा."
अगली सुबह तक इंतज़ार करना पड़ा, जब ईरान के सरकारी मीडिया ने ख़ामेनेई की मौत की ख़बर दिखाई. यह ख़बर उस समय आई जब डोनाल्ड ट्रंप पहले ही सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा कर चुके थे.
इस युद्ध की शुरुआत से ईरान का सरकारी मीडिया अपने दर्शकों को घटनाओं का एक आधिकारिक रूप दिखाता रहा है, जिसमें सच और झूठ दोनों शामिल रहे हैं. इस जंग में कथित तौर पर ईरान में 1,200 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं और ये जंग लेबनान और खाड़ी के अरब देशों तक फैल गई है.
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हालांकि लाखों ईरानी लोग विदेशों से चलने वाले फ़ारसी भाषा के सैटेलाइट टीवी चैनल देखते हैं, लेकिन स्वतंत्र जानकारी तक पहुंचना फिर भी मुश्किल है. इंटरनेट बंद होना, सेंसरशिप और कई चैनलों पर रोक के कारण अशांति और युद्ध के समय ईरान के लोग अक्सर बाहरी दुनिया से कट जाते हैं.
बीबीसी ने युद्ध के पहले हफ़्ते में ईरान के सरकारी मीडिया की कवरेज पर नज़र रखी. इसमें पाया गया कि उनकी रिपोर्टिंग का ज़ोर आम लोगों की तकलीफ़, "दुश्मनों" के ख़िलाफ़ जवाबी कार्रवाई की मांग और इस्लामिक रिपब्लिक के प्रति लोगों की वफ़ादारी पर रहा.
वहीं इसराइल और अमेरिका के हमलों में जिन सैन्य और सरकारी ठिकानों को निशाना बनाया गया, उन पर बहुत कम ध्यान दिया गया.
इसके साथ ही हमें ग़लत या भ्रामक जानकारी के कुछ उदाहरण भी मिले.
ईरान का मीडिया तंत्र
मीडिया पर नज़र रखने वाली संस्था रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स के मुताबिक़ प्रेस की आज़ादी के मामले में ईरान दुनिया के सबसे सख़्त देशों में से एक है.
1979 की क्रांति के बाद, जब इस्लामिक रिपब्लिक ईरान की स्थापना हुई, तब से देश में मीडिया कड़े नियमों के तहत काम कर रहा है. पश्चिमी देशों में चलने वाले और फ़ारसी भाषा के ज़्यादातर न्यूज़ आउटलेट, जिनमें बीबीसी फ़ारसी भी शामिल है, को ईरान से रिपोर्टिंग करने की अनुमति नहीं है.
हालांकि सरकार के मुख्य प्लेटफ़ॉर्म टीवी और रेडियो हैं, लेकिन वह न्यूज़ वेबसाइटों और सोशल मीडिया जैसे इंस्टाग्राम, टेलीग्राम और एक्स के ज़रिए ऑनलाइन भी सक्रिय है. ईरान के अंदर इन प्लेटफ़ॉर्म तक पहुंचने के लिए आमतौर पर वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (वीपीएन) की ज़रूरत पड़ती है.
देश में रहने वाले लोगों के लिए सरकार का मीडिया तंत्र जानकारी का मुख्य स्रोत बन गया है, ख़ासकर तब जब इंटरनेट बंद कर दिया जाता है.
मानवाधिकार संगठन विटनेस से जुड़ीं महसा अलीमरदानी कहती हैं, "सरकार अपना एक नैरेटिव आगे बढ़ा रही है. इसमें दिखाया जाता है कि वो जीत की स्थिति में है और उनकी सेना बहुत मज़बूत है."
ईरान के कई सरकारी मीडिया संस्थानों ने यह भी रिपोर्ट किया कि ईरानी बलों ने सैकड़ों अमेरिकी सैनिकों को मार दिया या घायल कर दिया, यानी दुश्मन के नुक़सान को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया.
3 मार्च को तसनीम न्यूज़ एजेंसी जो ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) से जुड़ी एक अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी है, उसने ख़बर दी कि युद्ध के पहले दो दिनों में अमेरिका के 650 सैन्य कर्मी मारे गए. इस ख़बर में आईआरजीसी के एक प्रवक्ता का हवाला दिया गया था.
यह दावा भारत, तुर्की और नाइजीरिया जैसे देशों के कुछ वैश्विक मीडिया संस्थानों ने भी अपने यहां प्रकाशित किया.
लेकिन उस समय पेंटागन ने केवल छह अमेरिकी सैनिकों की मौत की पुष्टि की थी. बाद में 13 मार्च को अमेरिकी सेंट्रल कमान ने सात और अमेरिकी सैनिकों की मौत की पुष्टि की.
हक़ीक़त को तोड़ना-मरोड़ना
नई तकनीक भी सरकारी मीडिया को प्रोपेगैंडा फैलाने में मदद कर रही है.
सरकार द्वारा चलाए जाने वाले अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल प्रेस टीवी ने फ़ेसबुक पर एक वीडियो साझा किया था, जिसे बाद में हटा दिया गया. इस वीडियो में एक ऊंची इमारत में आग लगी हुई दिख रही थी और उससे धुआं उठ रहा था.
वीडियो के साथ लिखा था, "ईरान के हमले के बाद बहरीन में एक ऊंची इमारत से धुआं उठता हुआ."
लेकिन ध्यान से देखने पर वीडियो में कुछ अजीब बातें दिखीं- जैसे दो कारें एक-दूसरे में मिलती हुई लग रही थीं. इससे संकेत मिला कि यह वीडियो असली नहीं था, बल्कि एआई से बनाया गया था.
ब्रिटेन स्थित थिंकटैंक इंस्टिट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटेजिक डायलॉग के सीनियर डायरेक्टर ब्रेट शाफ़र कहते हैं, "युद्ध के प्रोपेगैंडा में एआई से बने कंटेंट का इस्तेमाल नया नहीं है, लेकिन बड़े सरकारी मीडिया संस्थानों का ऐसे फ़र्ज़ी एआई वीडियो इस्तेमाल करना हैरान करने वाला है. ख़ासकर उन संस्थानों का जिनकी सच्चाई के मामले में पहले से ही अच्छी छवि नहीं है."
"ईरान के सरकारी मीडिया द्वारा बार-बार डीपफ़ेक का इस्तेमाल यह दिखाता है कि यह उनकी युद्ध रिपोर्टिंग का हिस्सा बन गया है."
सोशल मीडिया पर युद्ध से जुड़ा एआई से बना बहुत-सा कंटेंट वायरल हो रहा है, लेकिन यह साफ़ नहीं है कि इन्हें किसने बनाया. हालांकि युद्ध शुरू होने के बाद बीबीसी ने ऐसे कई उदाहरण देखे हैं, जहां सरकारी मीडिया ने अपनी कहानी को आगे बढ़ाने के लिए एआई से बनी तस्वीरें साझा कीं.
इनमें से कई तस्वीरें बहुत अवास्तविक लगती हैं और उनका मक़सद लोगों को गुमराह करने से ज़्यादा माहौल बनाना या अपनी छवि दिखाना होता है.
व्हाइट हाउस और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी कई बार ऐसी एआई से बनी तस्वीरें या वीडियो साझा करते रहे हैं जो उनकी प्रशंसा करते दिखते हैं.
हाल ही में इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने इंस्टाग्राम पर एक एआई से बनी तस्वीर साझा की, जिसमें वह, ट्रंप और दूसरे विश्व युद्ध के समय के ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल एक विजयी मुद्रा में दिखाए गए थे. यह पोस्ट एक न्यूज़ आउटलेट ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के एक फ़ीचर के ज़रिए जोड़ी थी.
सच के तत्व
ईरान के सरकारी मीडिया का रिकॉर्ड ऐसा रहा है कि वह कई बार सच के छोटे हिस्से के साथ ग़लत जानकारी भी मिलाकर पेश करता है. इससे देश के अंदर और बाहर सरकार के आलोचकों के बीच भी कई बार शक पैदा हो जाता है.
3 मार्च को जब ईरान के सरकारी मीडिया ने बताया कि एक स्कूल पर हुए हमले में 160 से ज़्यादा बच्चे और कर्मचारी मारे गए, तो उसके साथ एक बड़े जनाज़े की हवाई तस्वीर भी दिखाई गई. सरकार के विरोधियों ने दावा किया कि यह तस्वीर एआई से बनाई गई है.
स्कूल पर हमले को स्वतंत्र विशेषज्ञ अमेरिका की कार्रवाई मानते हैं जो पास के एक सैन्य ठिकाने को निशाना बनाकर की गई थी.
लेकिन जांच में पता चला कि यह तस्वीर असली थी. बीबीसी ने उसकी लोकेशन पता की और पाया कि वह स्कूल से लगभग 3.7 किलोमीटर दूर एक क़ब्रिस्तान की है. तस्वीर में दिख रहे पेड़, सड़क का नक्शा और पास की इमारत सैटेलाइट तस्वीरों से मेल खाते हैं.
अंतिम संस्कार के अगले दिन की सैटेलाइट तस्वीरों में नई खोदी गई क़ब्रें भी दिखाई देती हैं. उससे एक दिन पहले ज़मीन ख़ाली थी.
मानवाधिकार संगठन विटनेस से जुड़ीं महसा अलीमरदानी कहती हैं, "हमें एक साथ दो सच्चाइयों को समझना होगा." उनका कहना है कि ईरान की सरकार कई बार ख़ुद किए गए अत्याचारों के सबूत छिपाती है, लेकिन युद्ध के दौरान वह आम लोगों की मौतों को रिकॉर्ड करने का भी काफ़ी प्रयास करती है.
उनके मुताबिक़, यह जानकारी सरकार के प्रोपेगैंडा और युद्ध के नैरेटिव को आगे बढ़ाने में काम आ सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह अपने आप ही ग़लत है.
महसा अलीमरदानी कहती हैं कि ईरान के सरकारी मीडिया की ख़बरों को देखते समय लोगों को "संतुलन और सतर्कता" के साथ देखना चाहिए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.