बांग्लादेश: जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफ़ीकुर रहमान की क्यों हो रही है चर्चा

    • Author, रकीब हसनत
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला, ढाका
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

बांग्लादेश चुनाव में भले ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) भारी बहुमत से जीत की ओर बढ़ रही है लेकिन जमात-ए-इस्लामी के प्रदर्शन की भी विशेषज्ञ तारीफ़ कर रहे हैं.

जमात गठबंधन ने 77 सीटों पर जीत हासिल की है. जिसमें अकेले जमात-ए-इस्लामी की 68 सीटें हैं.

यह एक इस्‍लामी राजनीत‍िक पार्टी है. इसे एक दशक से ज़्यादा वक़्त तक चुनाव लड़ने से रोका गया था.

अरसे तक इस देश के चुनाव में अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनल‍िस्‍ट पार्टी यानी बीएनपी ही मुख्‍य मुक़ाबले में रहती थीं.

अगस्त 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना की सरकार सत्ता से बेदख़ल हो गई. उनकी पार्टी आवामी लीग पर पाबंदी लगा दी गई.

जमात-ए-इस्‍लामी कभी बीएनपी की सहयोगी भी रही थी.

जमात के कुछ ख़ास सामाज‍िक-राजनीत‍िक-धार्म‍िक व‍िचार हैं.

ख़ासकर देश के चर‍ित्र, मह‍िलाओं और अल्‍पसंख्‍यकों के बारे में.

इसल‍िए जमात के उभार पर बांग्लादेश में ही नहीं, पड़ोसी भारत में भी राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में भी नज़र रखी जा रही थी.

और चर्चा में हैं जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान भी.

उन्होंने सिलहट में एमसी कॉलेज के नाम से मशहूर मुरारी चंद कॉलेज से पढ़ाई की थी.

उसी दौरान उन्होंने कालेज के छात्रावास में ही गोपनीय रूप से संचालित होने वाले इस्लामी संगठन के सदस्यों से मुलाकात की थी.

उसके कुछ साल बाद कई छात्र शिविरों में शिरकत करने के बाद साल 1984 में वो औपचारिक रूप से सिलहट में जमात की राजनीति में शामिल हुए थे.

आगे चल कर बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध का विरोध करने वाले नेताओं को अवामी लीग सरकार के कार्यकाल के दौरान फांसी की सजा होने के कारण संगठन में नेतृत्वहीनता की स्थिति पैदा हो गई थी.

इसी दौर में वो पहले जमात के महासचिव और उसके बाद अमीर चुने गए.

जमात की राजनीति पर करीबी निगाह रखने वाले लोगों का कहना है कि रहमान के नेतृत्व में ही जमात अपने सांगठनिक कवच से बाहर निकल कर धीरे-धीरे विभिन्न पेशे से जुड़े आम लोगों तक पहुंचने लगी. अपनी इसी कवायद के तहत पार्टी ने अल्पसंख्यकों और मुक्ति योद्धाओं को पार्टी से जोड़ते हुए संसदीय चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे.

'दैनिक नया दिगंत' के संपादक सलाहुद्दीन मुहम्मद बाबर बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "रहमान ने पार्टी को एक खास दायरे में सीमित रखने की बजाय उसे आम लोगों तक पहुंचाया है. यह जमात के इस्लामी इतिहास का एक नया और अलग पहलू है."

जमात-ए-इस्लामी की वेबसाइट पर पार्टी के अमीर शफीकुर रहमान की जीवनी में बताया गया है कि वो साल 1973 में छात्र राजनीति में शामिल हुए थे. उसके तीन साल बाद रहमान इस्लामी छात्र शिविर में शामिल हुए थे.

राजनीतिक जीवन और जमात

जमात-ए-इस्लामी की वेबसाइट से मिली जानकारी के मुताबिक, रहमान का जन्म 31 अक्तूबर, 1958 को मौलवीबाजार के कुल उड़ा में हुआ था. वो अपने चार भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर थे. उनकी एक ही बहन है.

वेबसाइट में बताया गया है कि उन्होंने साल 1974 में एसएससी यानी दसवीं की परीक्षा पास की थी. लेकिन उससे पहले साल 1973 में ही वो जासद छात्र लीग में शामिल हो गए थे. साल 1976 में एचएससी यानी 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए रहमान ने सिलहट मेडिल कालेज (अब उस्मानी मेडिकल कॉलेज) में दाखिला लिया.

डॉ. मुश्ताक हुसैन उस समय जासद छात्र लीग की ओर से ढाका कॉलेज छात्र संघ के महासचिव थे. बाद में वो ढाका विश्वविद्यालय के केंद्रीय छात्र संघ के महासचिव भी चुने गए थे.

वो बीबीसी बांग्ला को बताते हैं, "मेडिकल छात्र के तौर पर शफीकुर रहमान मुझसे दो साल जूनियर थे. देश की आजादी के बाद उस दौर में जासद छात्र लीग का बोलबाला था. उस समय तमाम छात्र जासद छात्र लीग या छात्र यूनियन का समर्थन करते थे. मुझे सिलहट में जासद छात्र लीग के नेताओं से रहमान की सक्रियता के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है."

हुसैन ने बताया कि उनकी जानकारी के मुताबिक जमात के महासचिव मिया गुलाम परवर और चापाई नवाबगंज में जमात के टिकट पर सांसद बने लतीफुर रहमान जासद छात्र लीग में सक्रिय रहे थे.

राजनीतिक हलकों में ऐसी चर्चा है कि देश के आजाद होने पर जमात पर पाबंदी लगने के बाद पार्टी के मौजूदा नेताओं में से कुछ लोग ही छात्र लीग, जासद छात्र लीग या छात्र यूनियन जैसे वामपंथी छात्र संगठनों के साथ जुड़े थे.

बाद में जियाउर रहमान सरकार के कार्यकाल के दौरान जमात को राजनीति की अनुमति मिलने के बाद ऐसे नेता धीरे-धीरे जमात-ए-इस्लामी में सक्रिय होने लगे.

दूसरी ओर, जमात का कहना है कि साल 1983 में एमबीबीएस की डिग्री हासिल करने के बाद शफीकुर रहमान ने पूरी तरह राजनीति पर ध्यान देने का फैसला किया और साल 1984 में औपचारिक तौर पर जमात में शामिल हो गए.

सिलहट शहर, जिला और महानगर के अमीर की जिम्मेदारी निभाने के बाद रहमान साल 2016 से 2019 तक पार्टी के महासचिव रहे.

उस दौरान जून 2010 में जमात के तत्कालीन महासचिव अली अहसान मोहम्मद मुजाहिद के गिरफ्तार होने के बाद एटीएम अजहरुल इस्लाम ने कार्यवाहक महासचिव की जिम्मेदारी निभाई थी.

लेकिन अगले साल ही इस्लाम के युद्ध अपराध के एक मामले में गिरफ्तार होने के बाद सितंबर 2011 में तत्कालीन सहायक महासचिव शफीकुर रहमान को कार्यवाहक महासचिव बनाया गया.

आखिर में नवंबर, 2019 में पार्टी के दिग्गज नेताओं के सीधे मतदान के जरिए उनको पहली बार दो साल के लिए पार्टी का अमीर चुना गया. उसके बाद रहमान को साल 2023 और 2025 में भी अमीर चुना गया.

पार्टी में उत्थान

विश्लेषकों का कहना है कि जमात के जिन नेताओं ने साल 1971 में बांग्लादेश की स्वाधीनता के खिलाफ रुख अपनाया था उनके राजनीतिक दौर का खात्मा साल 2013 से 2016 के बीच हो गया. इस दौरान युद्ध अपराध के आरोप में अदालत ने उनमें से कइयों को फांसी की सजा दे दी.

बांग्लादेश की स्वाधीनता का विरोध करने वाले राजनेताओं में जो लोग विभिन्न स्तर पर जमात का राजनीतिक नेतृत्व कर रहे थे उनको फांसी की सजा होने का असर पार्टी पर भी पड़ा.

कई लोगों की राय में उस दौर में पार्टी के एक गुट ने बांग्लादेश की जमीनी परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए स्वीकार्य नेताओं को सामने लाने की मांग उठाई थी. उसी मांग ने शफीकुर रहमान के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने का रास्ता खोला था.

सलाहुद्दीन मुहम्मद बाबर बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "रहमान ने पार्टी के कठिन दौर में बागडोर हाथ में लेकर उसे मजबूती से संभाला था. उन्होंने पार्टी के उसके आवरण से बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाई थी. उनके दौर में ही पार्टी में खुलेपन का दौर शुरू हुआ और सबको आगे बढ़ने का मौका मिला था. बाबर का कहना था, उन्होंने अल्पसंख्यकों और कुछ मुक्ति योद्धाओं को भी पार्टी में शामिल किया है. जमात के इतिहास में यह एक उल्लेखनीय कदम है."

देश की आजादी के बाद से ही शरीफ नुरुल आंबिया जासद छात्र लीग के एक प्रमुख नेता रहे हैं. फिलहाल वो जासद के एक गुट के अध्यक्ष हैं.

उनका कहना था, "उस समय जासद छात्र लीग को भारी समर्थन हासिल था. यह कहना मुश्किल है कि शफीकुर रहमान छात्र लीग में शामिल थे या नहीं. लेकिन अगर वो छात्र लीग में थे तो इसे छोड़ कर इस्लामी छात्र शिविर में नहीं जाते तो देश और समाज का काफी भला होता."

हालांकि जमात के बाहर के कई लोगों की राय में रहमान दरअसल जमात या छात्र शिविर घराने के ही नेता थे. लेकिन मुक्ति युद्ध के बाद उपजी परिस्थिति में जासद छात्र लीग में शामिल होना या उसका समर्थन करना खुद को सुरक्षित तरीके से छिपाए रखने की रणनीति थी.

रहमान ने सितंबर, 2024 में ढाका के दैनिक युगांतर को दिए गए अपने इंटरव्यू के दौरान कहा था,..."उस समय देश में विद्रोही मानसिकता वाले युवा स्वाभाविक रूप से बड़े पैमाने पर जासद छात्र लीग में शामिल होने लगे. उनके साथ मैं भी शामिल हो गया."

इसी इंटरव्यू ने उनका कहना था, "एमसी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान मैंने देखा कि यह लोग (जासद छात्र लीग) भी बैंक लूटने लगे. उसके बाद थानों और हथियारों को लूटने के साथ लो तरह-तरह के कुकर्म करने लगे. इससे मुझे उनसे नफरत हो गई. उसके बाद मैंने खुद को समेट लिया. मुझे उनके कुछ रहस्य मालूम थे. इसी वजह से मेरे जीवन पर खतरा मंडरा रहा था."

रहमान ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि एक दौर ऐसा भी आया जब वो कॉलेज का हॉस्टल छोड़ कर चले गए थे. लेकिन बाद में बड़े भाइयों यानी सीनियर छात्र उनको दोबारा हॉस्टल ले गए थे.

अपने बारे में बताते हुए उन्होंने कहा था, "बाद में अल्लाह की मेहरबानी से मुझे पता चला कि मैं जिस कमरे में रहता हूं उसमें रहने वाले कुछ छात्र गोपनीय तरीके से एक इस्लामी संगठन चलाते हैं. वो काफी गोपनीयता बरतते थे. बाद में मुझे पता चला कि वो एक इस्लामी छात्र संगठन से जुड़े थे. मैंने उनसे मनुहार कर संगठन में शामिल होने का न्योता हासिल किया था."

वो आगे चल कर साल 1977 में छात्र शिविर में शामिल हो गए और बाद में संगठन की सिलहट मेडिकल कॉलेज शाखा और सिलहट शहर शाखा का अध्यक्ष पद भी संभाला था. साल 1984 में वो औपचारिक रूप से जमात में शामिल हो गए.

जमात में रहते हुए सिलहट जिले में विभिन्न पदों पर रहने के बाद साल 1998 में रहमान पार्टी की केंद्रीय कार्यपरिषद के सदस्य बने और साल 2010 में सहायक सचिव चुने गए.

उसी दौर में 'दैनिक नया दिगंत' के मौजूदा संपादक और राजनीतिक विश्लेषक सलाहुद्दीन मोहम्मद बाबर के उनके साथ करीबी संबंध बने. बाबर के मुताबिक, शफीकुर रहमान अपनी सांगठनिक क्षमता और कौशल के कारण ही धीरे-धीरे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचे हैं.

बाबर ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "रहमान ने बेहद मुश्किल हालात में पार्टी की कमान संभाली है. उनके प्रयासों से ही जमात-ए-इस्लामी अपनी सीमाओं को पार करने और विभिन्न तबके के रोगों को जोड़ते हुए सबको साथ लेकर चलने के मुकाम तक पहुंची है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.