पांच दिन बाद भी हमें नहीं पता कि यह जंग किस दिशा में जा रही है

    • Author, जेरेमी बोवेन
    • पदनाम, इंटरनेशनल एडिटर, बीबीसी
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

अमेरिका, इसराइल और ईरान के बीच शुरू हुई नई जंग का यह पांचवां दिन ही है.

ईरान ने खाड़ी के उस पार मौजूद अपने पड़ोसी अरब देशों, जो अमेरिका के क़रीबी सहयोगी भी हैं, पर हमला करने का फ़ैसला किया, और इसके साथ ही यह जंग अब पूरे क्षेत्र में फैल चुकी है.

ब्रिटेन ने भी आख़िरकार अपना रुख़ बदल दिया है और अमेरिका को अपने सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की इजाज़त दे दी है.

जंग लगातार भड़कती जा रही है और मेरे फ़ोन पर एक के बाद एक न्यूज़ अलर्ट आ रहे हैं.

अमेरिका ने हिंद महासागर में ईरान के एक युद्धपोत को डुबो दिया है, इसमें सौ से अधिक लोगों की जानें गई हैं.

शायद जब तक मैं यह लेख लिखकर पूरा करूंगा, तब तक और मिसाइलें दागी जा चुकी होंगी और संभव है कि कुछ लोग, जो इस वक्त जिंदा हैं, तब तक मारे भी जा चुके हों.

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यह जंग कब और कैसे ख़त्म होगी, इसका अभी अंदाज़ा लगाना भी जल्दबाज़ी होगी. जंग एक बार शुरू हो जाएं, तो उन्हें काबू में रखना मुश्किल हो जाता है.

फिर भी, युद्धरत देश इस जंग को कैसे ख़त्म होते देखना चाहेंगे, उसके कुछ तरीके ये हो सकते हैं.

ट्रंप की नज़र में जीत की परिभाषा

राष्ट्रपति ट्रंप ने जब फ़्लोरिडा स्थित अपने मार ए लागो निवास से जारी एक वीडियो संदेश में जंग शुरू होने की घोषणा की, तब वह अमेरिकी ताक़त पर पूरा भरोसा जताते नज़र आए. कोई और राष्ट्रपति शायद वॉशिंगटन में ओवल ऑफिस के रेज़ोल्यूट डेस्क के पीछे से गंभीर अंदाज़ में राष्ट्र को संबोधित करता.

ट्रंप ने खुले गले की शर्ट पहनी हुई थी और सफेद बेसबॉल कैप आँखों तक झुकी थी.

उन्होंने ईरान के ख़िलाफ़ एक लंबी चार्जशीट पढ़ी और तर्क दिया कि 1979 की इस्लामिक क्रांति से ही ईरान अमेरिका के लिए एक 'सीधा ख़तरा' बना हुआ है.

ट्रंप कभी भी अपना फैसला बदल सकते हैं, लेकिन उस भाषण में उन्होंने अपनी नज़र में जीत की परिभाषा साफ़ कर दी. यह एक तरह की चेकलिस्ट थी: "हम उनकी मिसाइलों को तबाह कर देंगे और उनकी मिसाइल इंडस्ट्री को पूरी तरह नष्ट कर देंगे. यह फिर से, पूरी तरह मिटा दी जाएगी. हम उनकी नौसेना को भी ख़त्म कर देंगे. हम यह सुनिश्चित करेंगे कि इलाक़े में मौजूद उनके आतंकी गुर्गे अब क्षेत्र या दुनिया को और अस्थिर न कर सकें, हमारे सैनिकों पर हमला न कर सकें, और अपने आईईडी या जैसा कि उन्हें कभी कभी कहा जाता है- सड़क किनारे बमों का इस्तेमाल कर हज़ारों लोगों, जिनमें कई अमेरिकी भी हैं, को गंभीर रूप से घायल न कर सकें या मार न दें."

ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ऐसी मिसाइलें बना रहा है जो अमेरिका तक पहुंच सकती हैं, जबकि अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों के आकलनों के अनुसार ऐसा नहीं है.

उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के बेहद क़रीब है- जो उनके ख़ुद के पिछले गर्मियों वाले बयान से उलट है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका ने ईरान की परमाणु साइटों को 'मिटा' दिया है.

ट्रंप का मानना है कि अमेरिका, इसराइल के साथ मिलकर, तेहरान की सरकार को कमज़ोर कर सकता है.

अगर ईरानी शासन हथियार डालने को तैयार न हो, तो ट्रंप का मानना है कि उसे इस कदर तोड़ा जा सकता है कि ईरानी जनता के पास दशकों में पहली बार सड़क पर उतरकर सत्ता संभालने का मौका होगा.

उन्होंने कहा, "जब हम काम ख़त्म कर लें, तो सरकार को अपने हाथ में ले लेना. यह मौका आपके लिए है. शायद कई पीढ़ियों में यह आपका एकमात्र मौका होगा. कई सालों से आप अमेरिका की मदद मांगते रहे हैं, लेकिन कभी मिली नहीं. कोई भी राष्ट्रपति वह नहीं करना चाहता था जो मैं आज रात करने को तैयार हूं. अब आपके पास एक राष्ट्रपति है जो आपको वह दे रहा है जो आप चाहते हैं. तो देखते हैं, अब आप क्या करते हैं."

सत्ता परिवर्तन की ज़िम्मेदारी ईरानी जनता पर डाल देना, भले ही वह ख़ुद उन्हें खुलकर प्रोत्साहित कर रहे हों, यह ट्रंप को ईरानी शासन के बचने की स्थिति में भविष्य में एक तरह से बचकर निकलने का रास्ता भी देता है.

लेकिन इसे अमेरिका की नैतिक ज़िम्मेदारी भी माना जा सकता है कि वह इस प्रक्रिया को पूरा करे. हालांकि बड़ा सवाल यह है कि यह बात एक ऐसे राष्ट्रपति पर कितना असर करेगी जो मानता है कि हर स्थिति में कोई न कोई 'डील' संभव है.

सिर्फ़ हवाई ताक़त के दम पर कोई शासन बदल देने या किसी मज़बूत और हथियारबंद दुश्मन को हरा देने का कोई उदाहरण नहीं मिलता.

2003 में, अमेरिका और उसके सहयोगियों ने सद्दाम हुसैन को हटाने के लिए इराक़ में बड़ी ज़मीनी फौजें भेजी थीं. इनमें ब्रिटेन भी शामिल था.

2011 में लीबिया के कर्नल मुअम्मर गद्दाफ़ी को विद्रोहियों ने नेटो और खाड़ी देशों द्वारा दिए गए हथियारों और उनकी हवाई सुरक्षा की मदद से सत्ता से हटाया था.

ट्रंप उम्मीद कर रहे हैं कि ईरान के लोग यह काम ख़ुद कर लेंगे.

ट्रंप की योजना एक बड़ा दांव है. सिर्फ़ बमबारी के ज़रिए सत्ता परिवर्तन कर देना बहुत मुश्किल है.

क्या अंदर से कोई पश्चिम-समर्थक तख़्तापलट हो सकता है? असंभव नहीं, लेकिन जंग के सिर्फ़ पांचवें दिन की हालत देखकर यह बहुत कम संभावना वाला विकल्प लगता है.

ज़्यादा संभावना यही है कि जो लोग अभी ईरानी शासन चला रहे हैं, वे अपनी विचारधारा की ऊर्जा लेते हुए और ज़्यादा जमकर लड़ेंगे, और भी मिसाइलें दागेंगे, इस भरोसे के साथ कि वे अमेरिका, इसराइल या खाड़ी के अरब देशों से कहीं ज़्यादा दर्द सह सकते हैं.

इस दर्द का सबसे बड़ा हिस्सा तो पहले से परेशान ईरानी जनता को ही झेलना पड़ेगा.

लेकिन इसमें उनकी राय पूछे जाने का सवाल ही नहीं है.

नेतन्याहू का गणित

डोनाल्ड ट्रंप की तरह, इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने भी बयान दिए हैं कि ईरानी लोग ख़ुद आगे बढ़कर हालात अपने हाथ में लें. लेकिन अगर वे ईरान की बेरहम सुरक्षा मशीनरी को नहीं हरा पाए, तो नेतन्याहू की पहली प्राथमिकता होगी, ईरान की सैन्य क्षमता को तोड़ना और उसकी उस ताक़त को ख़त्म करना, जिसके दम पर वह पूरे क्षेत्र में ऐसी लड़ाकू मिलिशिया खड़ा कर पाता है जो इसराइल को ख़तरा पहुंचा सकती है.

दशकों से बिन्यामिन नेतन्याहू ईरान को इसराइल का सबसे ख़तरनाक दुश्मन मानते आए हैं.

उनका मानना है कि इस्लामिक रिपब्लिक की सत्ता चलाने वाले नेता परमाणु हथियार इसलिए बनाना चाहते हैं ताकि यहूदी राज्य को मिटा सकें.

जंग के दूसरे दिन रविवार को नेतन्याहू तेल अवीव में एक छत पर खड़े थे. शायद शहर के बीचों-बीच स्थित रक्षा मंत्रालय की इमारत पर और उन्होंने बताया कि वह इस जंग का अंत कैसा देखते हैं.

उन्होंने कहा कि इसराइल और अमेरिका मिलकर "वह कर सकते हैं जिसकी उम्मीद मैं 40 साल से कर रहा हूं, आतंक के इस शासन को पूरी तरह कुचल देना."

उन्होंने कहा कि यह एक वादा है, और वह यह सुनिश्चित करेंगे कि यह हक़ीक़त बने.

हर जंग का एक घरेलू राजनीतिक पहलू भी होता है.

ट्रंप की तरह, नेतन्याहू को भी इस साल के अंत में चुनावों का सामना करना है.

लेकिन ट्रंप के उलट नेतन्याहू की अपनी कुर्सी ही दांव पर लगी है.

बहुत से इसराइली 7 अक्तूबर, 2023 को हमास को हमले का मौका देने वाली सुरक्षा चूक के लिए नेतन्याहू को ज़िम्मेदार मानते हैं.

अगर वह यह दावा कर सकें कि उन्होंने ईरान के ख़िलाफ़ निर्णायक जीत दिलाई है, तो वह राजनीतिक रूप से बहुत बड़ी बढ़त हासिल कर लेंगे. शायद फिर उन्हें हराना लगभग नामुमकिन हो जाएगा.

बचना ही जीत है

सुप्रीम लीडर और उनके शीर्ष सैन्य सलाहकारों की हत्या ईरानी शासन के लिए एक भारी झटका था. लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि इससे शासन ढह ही जाएगा.

करीब 50 साल पहले आयतुल्ला रूहोल्लाह ख़ुमैनी और इस्लामी गणराज्य के अन्य संस्थापकों ने इसकी संस्थाओं को जंग और हत्या से बचने लायक बनाया था.

ईरान की शासन व्यवस्था किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है.

सीरिया और लीबिया में असद और गद्दाफ़ी का शासन परिवारों पर टिका था. जैसे ही परिवारों को हटाया गया, गद्दाफ़ी की हत्या हुई और बशर अल असद भाग गए, शासन बिखर गया.

लेकिन ईरान का शासन एक राज्य व्यवस्था है- जो राजनीतिक और धार्मिक संस्थाओं के जटिल और मज़बूत नेटवर्क पर खड़ा है, जिनकी ज़िम्मेदारियां आपस में जुड़ी हैं और ओवरलैप करती हैं.

यह व्यवस्था जंग और हत्या के बावजूद टिके रहने के लिए ही बनाई गई है.

इसका मतलब यह नहीं कि यह टिकेगी ही.

इस्लामिक रिपब्लिक की व्यवस्था अपनी सबसे कठिन परीक्षा से गुज़र रही है. लेकिन उसने इस पल के लिए तैयारी कर रखी है.

शासन के लिए जीत की परिभाषा बस एक ही है, बचे रहना. और इसे हासिल करने के लिए उसने अपने चारों तरफ़ ज़बरदस्त सुरक्षा व्यवस्था खड़ी कर रखी है.

उसके पास एक बेहद ताक़तवर और बेरहम सुरक्षा तंत्र है जो दमन और बलप्रयोग पर आधारित है.

जनवरी में हज़ारों प्रदर्शनकारियों की हत्या के आदेश का पालन करने के लिए इसके आदमी सड़कों पर उतर गए थे.

अब तक, और जैसा मैं बार बार कह रहा हूं, जब मैं यह लिख रहा हूं तब तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि शासन की सशस्त्र सेनाएं कमज़ोर पड़ रही हों, जैसे दिसंबर 2024 में असद के मॉस्को भागने के बाद उनकी सेना बिखर गई थी.

हालांकि ये अलग बात है कि इसराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमले और तेज़ किए हैं. अमेरिका ने ईरान के दो हज़ार से अधिक ठिकानों पर हमलों का दावा किया है.

पारंपरिक सेना और भारी हथियारों वाली पुलिस के अलावा, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) भी है, जिसका लक्ष्य साफ़ है कि उसे देश के भीतर और बाहर शासन की रक्षा करनी है.

विलायत ए फ़क़ीह यानी 'धार्मिक नेता के संरक्षण' के पीछे की असली ताक़त यही है. यह ईरान की इस्लामी क्रांति का मुख्य सिद्धांत है और शिया धार्मिक नेतृत्व के शासन को जायज़ ठहराता है.

माना जाता है कि आईआरजीसी के क़रीब 1,90,000 सक्रिय सदस्य हैं और 6,00,000 तक रिज़र्व में हैं.

धार्मिक विचारधारा से इतर, इसके पास ईरान की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्सा पर नियंत्रण भी है. इसलिए उसके नेताओं के पास वफ़ादार बने रहने के आर्थिक और वैचारिक, दोनों कारण हैं.

आईआरजीसी की मदद के लिए एक स्वयंसेवी अर्धसैनिक बल, बसीज है.

इसके अनुमानित 4,50,000 सदस्य शासन के प्रति अंधी वफ़ादारी और दबंगई के लिए कुख्यात हैं.

मैंने खुद उन्हें 2009 के विवादित चुनावों के बाद शुरू हुए प्रदर्शनों के दौरान तेहरान में सड़कों पर देखा है- वे शासन की पहली रक्षा पंक्ति की तरह काम कर रहे थे, डंडों से प्रदर्शनकारियों को धमकाते और पीटते हुए.

उनके पीछे भारी हथियारों से लैस पुलिस और आईआरजीसी के लोग मौजूद थे.

बसीज के पास मोटरसाइकिलों पर घूमने वाली टीमें भी थीं, जो शहर में जहां भी असंतोष देखतीं, तुरंत पहुंचकर उसे दबा देतीं.

डोनाल्ड ट्रंप ने आईआरजीसी और बसीज को धमकी दी है कि उनकी मौत तय है. उन्होंने कहा है कि अगर वह हथियार नहीं डालते तो 'अंजाम अच्छा नहीं होगा'.

लेकिन उनके इन धमकी भरे बयानों से शासन के सशस्त्र बलों का मन बदलने की संभावना बहुत कम है.

इस्लामिक रिपब्लिक और शिया इस्लाम दोनों में ही शहादत के विचार गहरे समाए हुए हैं. जब रविवार को कई घंटों तक यह आधिकारिक दावा किया जाता रहा कि सुप्रीम लीडर सुरक्षित हैं, तब राज्य टीवी पर रोते हुए न्यूज़ रीडर ने ख़ामेनेई की मौत की घोषणा इस तरह की कि उन्होंने 'शहादत के मीठे और पवित्र घूंट को पी लिया है.'

ईरान के कुछ गंभीर विश्लेषकों का मानना है कि जब दुनिया का बड़ा हिस्सा मान रहा था कि हमला होने वाला है, तब आयतुल्ला ने तेहरान स्थित अपने परिसर में वरिष्ठ सलाहकारों के साथ बैठक इसलिए की, क्योंकि वे ख़ुद शहादत चाहते थे.

शासन के पास नागरिक वफ़ादारों का भी एक मज़बूत आधार है. सुप्रीम लीडर की हत्या के बाद, 40 दिनों के मातम के पहले दिन हज़ारों लोग तेहरान की सड़कों पर उतरे. भले ही अमेरिकी और इसराइली हवाई हमलों से उठता धुआं उनके पीछे नज़र आ रहा था, वे मोमबत्तियां और अपने मोबाइल की फ्लैशलाइटें जलाए हुए सार्वजनिक जगहों पर इकट्ठा हुए.

ख़राब मिसालें

अमेरिकियों को भरोसा है कि इस बार इसराइल की शक्ति के साथ मिलकर उनकी बेलगाम ताक़त बिना किसी बड़े विनाश के, दुश्मन पर सत्ता परिवर्तन थोप सकती है.

हालांकि पुरानी मिसालें अच्छी नहीं हैं. 2003 में इराक़ के सद्दाम हुसैन को हटाने का नतीजा एक बड़ी तबाही में निकला. सालों चलने वाली लंबी जंग शुरू हो गई, जिसने ऐसे जिहादी चरमपंथी संगठनों को जन्म दिया जो आज भी मौजूद हैं.

लीबिया, एक ऐसा देश जिसके पास इतना तेल था कि अपनी छोटी सी आबादी को पश्चिम के मानकों के हिसाब से आरामदायक जीवन दिया जा सकता था, आज टूटा हुआ, ग़रीब और विफल राज्य है. गद्दाफ़ी को सत्ता से हटाए जाने और मारे जाने के 15 साल बाद भी.

जिन पश्चिमी देशों ने उसके पतन का जश्न मनाया और उसे अंजाम दिया, उन्होंने देश के बिखरने के बाद ज़िम्मेदारी से हाथ झाड़ लिए.

ईरान एक बड़ा देश है, इराक़ से लगभग तीन गुना और 9 करोड़ से ज़्यादा की बहु जातीय आबादी वाला.

अगर ईरान की सत्ता या सरकार गिर जाती है तो डरावना परिदृश्य उभरता है जो अफ़रातफ़री, अराजकता और खूनख़राबे से भरा हो. ये सीरिया और इराक़ के गृहयुद्धों की तरह हो सकता है, जिनमें लाखों लोग मारे गए थे.

अमेरिका और इसराइल की सैन्य कार्रवाई ईरान की सैन्य क्षमता को चकनाचूर कर रही है. और अगर ईरानी शासन बच भी जाए तो भी इससे मध्य पूर्व का संतुलन बदल जाता है.

बहुत से लोग, संभवतः ज़्यादातर ईरानी, इस शासन के गिरने पर ख़ुश होंगे.

लेकिन जब किसी शासन को ताक़त से हटाया जाता है, तो उसके बाद एक शांतिपूर्ण और टिकाऊ विकल्प खड़ा करना बेहद कठिन काम होता है.

ट्रंप का दांव यह है कि यह संभव होगा कि यह जंग मध्य पूर्व को एक बेहतर और सुरक्षित जगह बनाएगी.

लेकिन ऐसा होने के संभावनाएं बहुत कमज़ोर नज़र आती हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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