टी-20 वर्ल्ड कप: 'भारत की जीत पर दिल कुछ कहता है, दिमाग़ कुछ और'

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- Author, शारदा उगरा
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
क्रिकेट में दुनिया का हर बड़ा ख़िताब जीतने के बाद भारतीयों के बीच दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं - एक दिमाग़ और दूसरी दिल से.
दिमाग़ यह विश्लेषण करता है कि उस जीत का क्या मतलब है. आसपास के माहौल में उसका क्या अर्थ है, अतीत के संदर्भ में उसका क्या मतलब है और जीत हमें भविष्य के बारे में क्या बता सकती है.
दिल बस उस घटना की यादों को तस्वीरों, वीडियो, आवाज़ों और साउंडट्रैक की तरह जमा कर लेता है और जानता है कि वह जितना चाहे उतने समय तक बार-बार उन यादों के पास लौट सकता है.
पहले दिमाग़ को अपना फ़ैसला सुनाने दें.
भारत व्हाइट बॉल क्रिकेट में चैंपियन है. फिर चाहे वो पुरुष या महिला टीम हो या अंडर-19 टीम, आईसीसी की हर ट्रॉफी प्रतियोगिता में भारत का दबदबा रहा है. सिर्फ़ दो को छोड़कर. ये दो प्रतियोगिताएं हैं- पुरुषों का 50 ओवर वर्ल्ड कप और महिलाओं का टी-20 वर्ल्ड कप.
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एक नए दौर की शुरुआत

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हर आयु वर्ग की पुरुष क्रिकेट में दबदबे से ये संकेत मिलता है कि आईसीसी प्रतियोगिताओं के दौरान प्रदर्शन के मामले में आगे क्या होना चाहिए.
दो से अधिक टीमों वाले हर बड़े व्हाइट बॉल टूर्नामेंट में उतरते समय भारत को अगर सबसे बड़े दावेदार के रूप में नहीं तो कम से कम शीर्ष दावेदारों में गिना जाएगा.
आईसीसी प्रतियोगिताओं में, भारत के संसाधनों और प्रतिभा के आधार को देखते हुए, हम इस जीत को एक नए दौर की शुरुआत के रूप में देख सकते हैं, बल्कि देखना चाहिए.
ठीक वैसे ही जैसे 2000 के दशक की शुरुआत में ऑस्ट्रेलिया की पुरुष व्हाइट बॉल टीम ने और 2010 के दशक के बाद ऑस्ट्रेलिया की महिला टीम ने किया.
ऑस्ट्रेलिया की पुरुष टीम से तुलना में फ़र्क सिर्फ़ इतना होगा कि उन्होंने रेड बॉल (टेस्ट क्रिकेट) क्रिकेट में भी एक साथ सफलता हासिल की और टेस्ट में दबदबा बनाया.
टेस्ट क्रिकेट को अलग रखें तो व्हाइट बॉल क्रिकेट में दबदबे की दिशा में भारत का अगला सबसे अच्छा कदम यह होगा कि वह वनडे और टी-20 दोनों में हर तरह की परिस्थितियों में जीतने वाली टीम बने.
अब दिल की बात

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अब बात करते हैं इस जीत पर दिल की प्रतिक्रिया की और बढ़ते हैं उन यादों की ओर जो उसने अब संजोकर रख ली हैं.
नॉकआउट के रूप में ख़त्म हुए तीन मैचों में संजू सैमसन का उभरना ऐसा था जैसे पिंजरे से आज़ाद हुआ कोई पंछी हो.
सैमसन ऊंचा उड़ते दिखे. अपने उस पुराने रूप से कहीं आगे जिसमें वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के हाशिए पर खड़े एक खिलाड़ी थे. एक ऐसे खिलाड़ी जो 16 साल की उम्र से हुनर के बावजूद ऊंचाइयों को नही छू पा रहे थे.
टी-20 वर्ल्ड कप में भारत के नौ में से सिर्फ पांच मैच खेलने के बाद भी सैमसन प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट हैं. इतना ही नहीं वह इस प्रतियोगिता के तीसरे सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ी भी है. उन्होंने पांच पारियों में 321 रन बनाए हैं.
उनसे आगे पाकिस्तान के साहिबज़ादा फ़रहान और टिम सिफ़र्ट हैं. फ़रहान ने छह पारियों में 383 रन और न्यूज़ीलैंड के टिम सिफ़र्ट ने आठ पारियों में 326 रन बनाए.
बुमराह की मौजूदगी

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एक बार फिर नॉकआउट मैचों पर लौटते हैं और जसप्रीत बुमराह की उस 'ख़ामोश असर' डालने वाली मौजूदगी को याद करते हैं.
बुमराह की दक्षता, स्ट्राइक रेट और इकॉनमी रेट तो उनकी क़ाबिलियत बताते ही हैं. इसके अलावा उनके आसपास जो चीज़ और भी ज़्यादा प्रभावी थी वह थी उनका ख़ौफ़.
विरोधी टीमों को उनके लिए अलग योजना बनानी पड़ी, जो बाकी भारतीय गेंदबाज़ों के लिए बनाई गई योजनाओं से जैसी नहीं थी.
इस मास्टर प्लान के तहत विरोधी टीम के बल्लेबाज़ों पर और दबाव डाला. उन पर दबाव था कि कि वे बाकी गेंदबाज़ों के ख़िलाफ़ ज़्यादा जोखिम लें.
बुमराह के हुनर ने सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल के अपने पहले ओवरों में सबसे अहम विकेट दिलाए. इनमें से एक विकेट यादगार कैच के ज़रिए आया.
लेकिन उनका ख़तरा ऐसा था कि उन्हें जीनियस से लेकर फ़्रीक तक बुलाया जा रहा था. पूर्व भारतीय स्पिनर आर अश्विन ने उन्हें वीडियो गेम वाले सबसे सटीक शब्द में भारत का 'चीट कोड' बताया.
एक अन्य कमेंटेटर ने इसे सरल शब्दों में समझाया. कमेंटेटर ने कहा कि बुमराह एक ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्हें अगर खेल से हटा दें या विरोधी टीम में डाल दें तो मैच का नतीजा बदल जाएगा.
इसी बात को सोचते हुए दक्षिण अफ़्रीका के फ़ैफ डू प्लेसी ने बुमराह के लिए सबसे सही शब्द खोजा. उन्होंने बुमराह को जिनी (जिन) कहा.
अक्षर की फ़ुर्ती

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इस टूर्नामेंट में सेमीफाइनल तक भारत ने कम से कम 13 कैच छोड़े. लेकिन अक्षर पटेल के उस कमाल के कैच को कौन भूल सकता है?
वो कैच जल्द ही कपिल देव 1983 और सूर्यकुमार यादव के 2024 के साथ क्रिकेट की यादों में शामिल हो गया है.
अक्षर आमतौर पर बैकग्राउंड में रहते हैं, चमक-दमक से दूर. लेकिन उस पल उन्होंने अपने दिमाग़, अपनी दृष्टि और अपने पेशेवर रवैये की झलक दी.
हैरी ब्रूक के बल्ले से निकले शॉट को हवा में लपकने के लिए पीछे की ओर भागते हुए अक्षर पटेल ने उसे ग़ज़ब की फुर्ती से पकड़ा. ब्रूक बुमराह की धीमी गेंद के झांसे में आ गए थे.
सात सेकंड तक गेंद हवा में दी और उन लम्हों को कोई नहीं मिटा पाएगा.
एक और चीज़ जो फाइनल खत्म होने के बाद भी खुशबू की तरह बरकरार रही, वह इस अभियान में भारत के युवा क्रिकेटरों की ऊर्जा थी.
इशान किशन, तिलक वर्मा, शिवम दुबे और अभिषेक शर्मा की धुआंधार बल्लेबाज़ी ने कभी भी खेल की रफ़्तार थमने नहीं दी.
अर्शदीप की गेंदबाज़ी के दौरान घबराहट के बीच दृढ़ता भी दिखी जो रन पड़ने के बाद भी नहीं डिगी. नॉकआउट मैचों में युवा खिलाड़ियों की फील्डिंग के प्रति प्रतिबद्धता देखने लायक थी.
आईपीएल के बाद भारत के अगले सफेद गेंद मुकाबलों का इंतज़ार करना मुश्किल है. जून में और जुलाई में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ पांच मैचों की टी-20 सिरीज़ होने वाली है.
2003 वर्ल्ड कप फ़ाइनल जैसी जीत

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न्यूज़ीलैंड को टी-20 मैच में 96 रन से हराना 2003 वर्ल्ड कप फ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया की भारत पर 125 रन की जीत जैसा लगता है.
कुछ हफ्तों बाद घरेलू मैदान पर मिली यह जीत भारत की 2011 वर्ल्ड कप जीत जैसी लगती है.
हमने ग्रुप मैचों में कमज़ोर टीमों के ख़िलाफ़ बहुत भरोसेमंद नहीं दिखने वाली जीत से शुरुआत की. उसके बाद दक्षिण अफ्रीका से हार मिली.
लेकिन नॉकआउट में टीम ने ज़्यादा ऊंचा और ताकतवर गियर पकड़ लिया.
2011 की जीत ने भारत की पुरानी पीढ़ी के कई दिग्गजों के दौर का अंत दिखाया था.
इस जीत ने भारतीय व्हाइट बॉल क्रिकेटरों के नए समूह के आगमन की घोषणा की है. उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके साथ भारतीय क्रिकेट वैश्विक स्तर पर सफलता का मानक तय करेगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















