भारत में लाखों नौकरियां देने वाला ये सेक्टर और मंडराता एक ख़तरा

    • Author, निखिल इनामदार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

भारत के टेक्नोलॉजी (आईटी) कंपनियों के शेयरों में पिछले कुछ हफ्तों में भारी गिरावट देखने को मिली है.

इसकी वजह है ये आशंका कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई, उस पारंपरिक आउटसोर्सिंग मॉडल को उलट सकती है, जिस पर देश की 300 अरब डॉलर (करीब साढ़े 27 हज़ार अरब रुपये) की बैक-ऑफिस इंडस्ट्री टिकी हुई है.

आईटी शेयरों में यह बिकवाली हाल की भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से पैदा हुई शेयर बाजार की घबराहट से पहले ही शुरू हो गई थी, और भारत के लिए यह खास तौर पर अहमियत रखती है.

पिछले करीब साढ़े तीन दशकों में भारत के सॉफ्टवेयर उद्योग ने लाखों व्हाइट-कॉलर नौकरियां पैदा की हैं.

इससे एक नया मध्यम वर्ग उभरा, जिसकी महत्वाकांक्षाएं ऊंची हैं और जिसकी खरीदने की क्षमता मजबूत है.

इसी वर्ग ने पिछले 30 वर्षों में बेंगलुरु, हैदराबाद और गुरुग्राम जैसे बड़े शहरों में फ्लैट, कार और रेस्टोरेंट की मांग को बढ़ावा दिया.

नौकरियों पर ख़तरा?

देश की दस सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियों को ट्रैक करने वाला निफ्टी आईटी इंडेक्स इस साल लगभग 20 फ़ीसदी गिर चुका है, जिससे निवेशकों को करोड़ों रुपये की चपत लगी है.

यह गिरावट फ़रवरी की शुरुआत में तब शुरू हुई जब एंथ्रोपिक के क्लाउड एजेंट ने एक नया टूल जारी किया और दावा किया कि यह कानूनी, कंप्लायंस और डेटा से जुड़े कई अहम प्रोसेस को ऑटोमेट कर सकता है. इससे उस उद्योग के बिज़नेस मॉडल पर चोट पहुंची जो बड़े पैमाने पर मानव श्रम पर निर्भर है.

इसके बाद घबराहट और बढ़ गई, जब कई टेक संस्थापकों ने चेतावनी दी कि 2030 तक आईटी सर्विसेज का स्वरूप ही ख़त्म हो सकता है. कुछ सीईओ ने तो यहां तक कहा कि एआई एंट्री-लेवल की 50 फ़ीसदी व्हाइट-कॉलर नौकरियों को ख़त्म कर सकता है.

हालांकि इस बेचैनी के बीच भारत की बड़ी आईटी कंपनियों ने लोगों को भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि ये आशंकाएं बढ़ा-चढ़ाकर बताई जा रही हैं. उनका कहना है कि एआई नई संभावनाएं भी पैदा करेगा, हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि यह काम करने के तरीके को संरचनात्मक रूप से बदल देगा.

ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक जेफ़रीज़ ने एक नोट में कहा, "क्लाइंट के साथ जुड़ने का तरीका संरचनात्मक रूप से बदलकर एडवाइजरी और इम्प्लीमेंटेशन की ओर जा सकता है, जबकि एप्लिकेशन मैनेज्ड सर्विसेज (जिनका कुल आमदनी में 22–45% हिस्सा है) में तेज़ गिरावट आ सकती है."

आसान शब्दों में कहें तो इसका मतलब यह है कि भारतीय आईटी कंपनियां अब तक बैंकों या दूसरी कंपनियों जैसे अपने ग्राहकों के लिए सॉफ्टवेयर चलाने, उन्हें मेंटेन करने, बग ठीक करने और अपडेट संभालने के बदले जो फीस लेती थीं, उसमें अब कमी आ सकती है.

इसकी जगह अब कंसल्टिंग जैसे ज्यादा मूल्य वाले लेकिन कम नियमित काम बढ़ सकते हैं.

क्या एआई बनेगा मजबूत विकल्प?

जेफ़रीज़ के मुताबिक़ इससे राजस्व वृद्धि और कर्मचारियों की मांग दोनों पर असर पड़ेगा. बैंक का अनुमान है कि सबसे ख़राब स्थिति में आईटी कंपनियों की राजस्व वृद्धि अगले पांच वर्षों में 3 फ़ीसदी तक कम हो सकती है और 2031 के बाद विकास पूरी तरह रुक भी सकता है.

हालांकि, सभी विशेषज्ञ इतने निराशावादी नहीं हैं. कुछ का मानना है कि एआई के दौर में भी भारतीय आईटी उद्योग के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं.

जेपी मॉर्गन चेस जो आईटी कंपनियों का मानना है कि एआई भले ही जटिल कामों को तेज़ कर दे और ज़्यादा सॉफ्टवेयर कोड लिख दे, लेकिन यह मान लेना बहुत सरल सोच होगी कि एआई सॉफ्टवेयर कंपनियों जितना कस्टमाइजेशन दे सकता है.

बैंक के अनुसार, एक के दूसरे को पूरी तरह बदलने के बजाय भविष्य में "एआई टूल कंपनियों और आईटी सर्विस कंपनियों के बीच ज्यादा साझेदारियां" देखने को मिलेंगी, जिससे काम के कई नए मौके पैदा होंगे.

भारत की दूसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी इंफ़ोसिस के सीईओ सलिल पारेख भी इसी विचार का समर्थन करते हैं. उनका कहना है कि एआई उनके जैसे आईटी सर्विसेज फर्मों के लिए अवसरों को बढ़ाता है, क्योंकि वे ग्राहकों को इंटेलिजेंट टूल्स के जरिए पुराने सिस्टम को आधुनिक बनाने में सबसे बेहतर स्थिति में हैं.

इंफ़ोसिस के मुताबिक जनरेटिव एआई, फ्रंट-एंड डेवलपर और टेस्टर्स जैसी करीब 9.2 करोड़ नौकरियों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन इसके साथ ही डेटा एनोटेटर, एआई इंजीनियर और एआई लीड जैसे क्षेत्रों में लगभग 17 करोड़ नई नौकरियां भी पैदा हो सकती हैं.

सभी विश्लेषक एकमत नहीं

विश्लेषकों के बीच यह नज़रिया धीरे-धीरे एक आम सहमति की शक्ल लेता जा रहा है.

एचएसबीसी ने अपनी हालिया रिपोर्ट "सॉफ्टवेयर विल ईट एआई" में कहा है कि सॉफ्टवेयर कंपनियां ही दुनिया की बड़ी कंपनियों में एआई को फैलाने का मुख्य माध्यम बनेंगी. रिपोर्ट का तर्क है कि आईटी सर्विसेज़ कंपनियां ही संगठनों में एआई को अपनाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएंगी.

रिपोर्ट के अनुसार, बड़े पैमाने के एआई सिस्टम स्वभाव से ही कुछ हद तक त्रुटिपूर्ण होते हैं और वे उन बड़े सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म को पूरी तरह बदलने के लिए उपयुक्त नहीं हैं जिन्हें कंपनियां इस्तेमाल करती हैं, भले ही वे इमेज बनाने जैसे कामों के लिए अच्छे क्यों न हों.

एचएसबीसी का कहना है, "एंटरप्राइज-क्लास सॉफ्टवेयर दशकों में विकसित होकर लगभग त्रुटिरहित, तेज़ और भरोसेमंद बन गया है. इसमें मौजूद महत्वपूर्ण और निजी बौद्धिक संपदा को पब्लिक इंटरनेट के डेटा पर ट्रेन नहीं किया जा सकता."

रिपोर्ट के मुताबिक़, सबसे कठिन और महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर डिजाइन करने में एआई अभी दशकों पीछे है, जबकि यही वह क्षेत्र है जिसमें आईटी कंपनियां विशेषज्ञता रखती हैं. फिर भी, इस एक-पीढ़ी में आने वाले बड़े तकनीकी बदलाव से आईटी कंपनियां पूरी तरह अछूती नहीं रहेंगी.

जेपी मॉर्गन का कहना है कि इसका सटीक असर मापना मुश्किल है, लेकिन इसका असर इंडस्ट्री में अलग-अलग तरीकों से महसूस किया जा रहा है.

भारत के सॉफ्टवेयर उद्योग के लॉबी समूह नैसकॉम के अनुसार, इंडस्ट्री इन बदलावों को अपनाने लगी है. 2025 वह साल था जब टेक इंडस्ट्री एआई के इस्तेमाल से आगे बढ़कर उसके वास्तविक उपयोग की ओर निर्णायक रूप से बढ़ी. लेकिन 2025 में एआई प्रोजेक्ट्स से आने वाला राजस्व सिर्फ़ लगभग 10 अरब डॉलर है, जबकि पूरे उद्योग का कुल राजस्व 315 अरब डॉलर है.

इसके अलावा इस साल पूरे सेक्टर की आय करीब 6 फ़ीसदी ही बढ़ने की उम्मीद है, जो पहले के तेज़ विकास वाले दौर में देखी गई डबल डिजिट ग्रोथ से काफी कम है.

इस बीच नौकरियों में भर्ती भी धीमी रहने की संभावना है. अनुमान है कि 2026 तक कर्मचारियों की कुल संख्या में केवल 2.3 फ़ीसदी की वृद्धि होगी.

नैसकॉम के मुताबिक़, एआई की वजह से आईटी कंपनियों के क्लाइंट से फ़ीस लेने का तरीका भी तेज़ी से बदल रहा है. पहले कंपनियां काम के घंटों के आधार पर बिलिंग करती थीं, लेकिन अब यह मॉडल नतीजों के आधार पर भुगतान की ओर बढ़ रहा है.

छोटी अवधि में, यह साफ़ है कि इस बदलाव का दर्द झेलना पड़ेगा.

नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज़ के विश्लेषकों के अनुसार, शुरुआत में आईटी कंपनियों का राजस्व घट सकता है, और एआई के फ़ायदे मध्यम अवधि में ही दिखाई देंगे.

इसके अलावा तकनीक से जुड़े सवालों के साथ-साथ कुछ अन्य चुनौतियां भी हैं. हालांकि भारत के लिए टैरिफ़ से जुड़ी अनिश्चितता कम हुई है, लेकिन अमेरिका में वीज़ा प्रतिबंध बढ़ गए हैं, जो भारतीय आईटी कंपनियों का सबसे बड़ा बाज़ार है.

मूडीज़ एनालिटिक्स के अनुसार, नए वीज़ा शुल्क के कारण भारत की चोटी की आईटी कंपनियों के ऑपरेटिंग खर्च में लगभग 100 से 250 मिलियन डॉलर तक की बढ़ोतरी हो सकती है, जो उनके कुल राजस्व का करीब 1 फ़ीसदी है.

ये सभी वजहें मिलकर उस क्षेत्र के लिए कड़ी चुनौतियां पैदा कर रहे हैं, जो भारत के कुल सेवा निर्यात का लगभग 80% हिस्सा है और देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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