शेख़ हसीना के मामले में भारत के सामने क्या हैं विकल्प?

    • Author, शुभज्योति घोष
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला, दिल्ली
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

बीते महीने की पांच तारीख़ तक बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं शेख़ हसीना वहां से आने के बाद तीन सप्ताह से भी ज़्यादा समय से भारत में रह रही हैं.

भारत सरकार ने बेहद गोपनीयता और कड़ी सुरक्षा के बीच उनके और उनकी छोटी बहन शेख़ रेहाना के रहने का इंतज़ाम तो ज़रूर किया है. लेकिन उसने अब तक औपचारिक रूप से यह नहीं बताया है कि इस मामले में उसका अंतिम फ़ैसला क्या होगा.

इस बीच, बांग्लादेश सरकार ने बीते सप्ताह शेख़ हसीना का राजनयिक या सरकारी पासपोर्ट रद्द कर दिया है. इससे सवाल उठने लगा है कि अब भारत में उनके रहने का क़ानूनी आधार क्या है

मौजूदा पृष्ठभूमि में दिल्ली में भारत के शीर्ष सरकारी अधिकारियों और विश्लेषकों के साथ बातचीत से बीबीसी को संकेत मिला है कि फ़िलहाल शेख़ हसीना के मुद्दे पर भारत के सामने तीन विकल्प या रास्ते खुले हैं.

क्या हैं वो तीन विकल्प

पहला विकल्प है, बांग्लादेश के पूर्व प्रधानमंत्री के लिए किसी तीसरे देश में शरण लेने की व्यवस्था करना. वह ऐसी जगह हो जहां उनके सुरक्षित रहने की गारंटी मिले.

दूसरा विकल्प है, शेख हसीना को राजनीतिक शरण देकर तात्कालिक तौर पर यहीं उनके रहने की व्यवस्था कर दी जाए.

तीसरे विकल्प का चयन शायद इस समय संभव नहीं हो. लेकिन भारतीय अधिकारियों और पर्यवेक्षकों का एक गुट मानता है कि कुछ दिनों बाद परिस्थिति में सुधार होने की स्थिति में भारत बांग्लादेश में शेख़ हसीना की राजनीतिक रूप से वापसी का भी प्रयास कर सकता है.

इसकी वजह यह है कि एक पार्टी या राजनीतिक ताक़त के तौर पर अवामी लीग अभी ख़त्म नहीं हुई है और अपने देश लौटकर हसीना पार्टी की कमान संभाल सकती हैं.

राजनयिक हलकों और थिंक टैंक के कर्ता-धर्ताओं में इस बात को लेकर भी कोई संदेह नहीं है कि भारत के लिए पहला विकल्प ही सबसे बेहतर है.

इसकी वजह यह है कि अगर शेख़ हसीना भारत में ही रह जाती हैं तो इसका दिल्ली-ढाका संबंधों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है.

इसके साथ ही यह भी तय है कि अगर भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि के तहत ढाका की ओर से शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण का कोई अनुरोध मिलता है तो दिल्ली किसी न किसी दलील के आधार पर उसे ख़ारिज कर देगी.

पर्यवेक्षकों का कहना है कि शेख़ हसीना को न्यायिक प्रक्रिया का सामना करने के लिए बांग्लादेश को सौंपना भारत के लिए कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं है.

ऐसे में सीधे तौर पर कहें तो शेख़ हसीना के मुद्दे पर भारत के सामने वही तीन विकल्प खुले हैं जिनका ज़िक्र ऊपर किया गया है. इस रिपोर्ट में इन्हीं तीनों विकल्पों के तमाम पहलुओं और उनकी संभावनाओं पर चर्चा की गई है.

किसी मित्र देश में भेजना?

भारत के आख़िरी औपचारिक बयान के मुताबिक़ शेख़ हसीना का भारत आना ‘सामयिक’ था. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बीती छह अगस्त को संसद में बांग्लादेश की परिस्थिति पर बयान के दौरान इस मुद्दे यानी हसीना के भारत आने का ज़िक्र करते हुए इसके लिए ‘फार द मोमेंट’ यानी फिलहाल शब्द का इस्तेमाल किया था. उसके बाद से सरकार की ओर से इस मामले में अब तक कोई टिप्पणी नहीं की गई है.

इसकी वजह यह है कि अब भी शेख़ हसीना को सुरक्षित रूप से किसी तीसरे देश में भेजने का प्रयास जारी है. लेकिन अगर इसमें फौरी कामयाबी नहीं भी मिली तो भारत उनको राजनीतिक शरण देकर लंबे समय तक यहां रखने में नहीं हिचकेगा.

विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना था, "वी आर होपिंग फार द बेस्ट, प्रीपेयरिंग फॉर द वर्स्ट."

उनके कहने का मक़सद था कि भारत को अब भी उम्मीद है कि शेख़ हसीना के मामले में कुछ बेहतर ही होगा (वो किसी तीसरे मित्र देश में जाकर रह सकेंगी). लेकिन अगर वैसा नहीं हुआ तो दिल्ली सबसे ख़राब (यानी शेख़ हसीना को लंबे समय के लिए भारत में रखना होगा) के लिए भी तैयार रहेगी.

बीबीसी को पता चला है कि शेख़ हसीना के अमेरिका जाने के प्रस्ताव पर शुरुआत में ही बाधा खड़ी होने के बाद भारत ने संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और यूरोप के दो-एक छोटे देशों के साथ भी इस मुद्दे पर बात की थी.

हालांकि इस मामले में अब तक किसी कामयाबी की जानकारी नहीं मिली है. पता चला है कि अब भारत शेख़ हसीना को शरण देने के मुद्दे पर मध्य पूर्व के एक अन्य प्रभावशाली देश क़तर के साथ भी बातचीत कर रहा है.

इसके साथ ही यह बात भी सही है कि शेख़ हसीना ने अब तक ख़ुद लिखित रूप से अमेरिका या इन तमाम देशों में से किसी से राजनीतिक शरण के लिए आवेदन नहीं किया है. उनकी ओर से और उनकी मौखिक सहमति के आधार पर इस मुद्दे पर तमाम बातचीत भारत सरकार ही कर रही है.

अब सवाल उठता है कि अगर कोई तीसरा देश शेख़ हसीना को राजनीतिक शरण देने पर सहमत होता है तो वो दिल्ली से किस पासपोर्ट पर उस देश की यात्रा करेंगी?

ढाका में भारत की पूर्व राजदूत रीवा गांगुली दास बीबीसी से कहती हैं, "यह कोई बड़ी समस्या नहीं है. बांग्लादेश सरकार ने अगर उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया है तो वो भारत सरकार की ओर से जारी ट्रैवल डॉक्यूमेंट या परमिट के सहारे तीसरे देश की यात्रा कर सकती हैं. मिसाल के तौर पर ऐसे हज़ारों तिब्बती शरणार्थी यहां हैं जिन्होंने कभी पासपोर्ट नहीं बनवाया है. ऐसे विदेशी लोगों के लिए भारत एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट (टी.डी) जारी करता है. यह लोग उसी के सहारे पूरी दुनिया में घूमते रहते हैं."

मान लेते हैं कि अगर 'एक्स' देश शेख़ हसीना को शरण देने पर तैयार होता है तो वो भारत सरकार की ओर से जारी ट्रैवल डॉक्यूमेंट पर संबंधित देश का वीज़ा लेकर आसानी से वहां जा और रह सकती हैं.

रीवा गांगुली कहती हैं, "यह नियम व्यक्ति विशेष के लिए हैं. इसके साथ ही यह याद रखना होगा कि शेख़ हसीना की एक विशाल 'पोलिटिकल प्रोफाइल' है. उसकी वजह से उनके मामले में कई नियम आसान बन सकते हैं."

राजनीतिक शरण

दिल्ली से इस बात के भी संकेत मिले हैं कि बेहद ज़रूरी होने पर भारत शेख़ हसीना को राजनीतिक शरण देकर उनको इसी देश में रखने से भी नहीं हिचकेगा.

भारत इससे पहले तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा, नेपाल के राजा त्रिभुवन बीर विक्रम शाह और अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद नजीबुल्लाह को भी राजनीतिक शरण दे चुका है. ख़ुद शेख़ हसीना भी वर्ष 1975 में सपिरवार भारत में रह चुकी हैं.

लेकिन इस विकल्प को चुनने की स्थिति में दिल्ली को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि भारत-बांग्लादेश के द्विपक्षीय संबंधों पर इसका क्या असर होगा.

पर्यवेक्षकों का कहना है कि वर्ष 1959 में दलाई लामा को राजनीतिक शरण देने के बाद भारत-चीन संबंधों में जो कड़वाहट पैदा हुई थी, अब 65 साल बाद भी उसका असर नज़र आता है.

भारत या दुनिया के बाकी हिस्सों में दलाई लामा को भले ही जितनी भी श्रद्धा की निगाह से देखा जाता हो, दिल्ली और बीजिंग के आपसी संबंधों में वो हमेशा गले की फांस ही रहे हैं.

भारत में भी कई विश्लेषकों का मानना है कि भारत अगर शेख़ हसीना को यहां राजनीतिक शरण देता है तो यह बांग्लादेश की नई सरकार के साथ संबंधों की मज़बूती में बाधा बन सकता है.

दिल्ली में आईडीएसए की सीनियर फेलो स्मृति पटनायक कहती हैं, "जिस आंदोलन के ज़रिए शेख़ हसीना की सरकार को सत्ता से जाना पड़ा, उसका एक भारत-विरोधी पहलू भी था. वह आंदोलन हसीना के विरोध में था तो भरत के भी विरोध में था. अब ऐसे में अगर भारत शेख़ हसीना को राजनीतिक शरण देता है तो बांग्लादेश में एक ग़लत संदेश जाएगा और इससे उस देश में भारत विरोधी भावनाओं को और उकसावा मिलेगा."

भारत सरकार भी इस बात को अच्छी तरह समझती है. इसके बावजूद पहले विकल्प में कामयाबी नहीं मिलने की स्थिति में उसे मजबूरन दूसरे विकल्प को चुनना होगा. इसकी वजह यह है कि दीर्घकालिक मित्र शेख़ हसीना को संकट में अकेला छोड़ना उसके लिए किसी भी हालत में संभव नहीं है.

राजनीतिक पुनर्वास में मदद

भारत के शीर्ष नीति निर्धारकों के एक ताकतवर गुट को अब भी भरोसा है कि बांग्लादेश की राजनीति में शेख़ हसीना की प्रासंगिकता या भूमिका अभी ख़त्म नहीं हुई है और उचित समय आने पर भारत के लिए उनके राजनीतिक पुनर्वास में मदद करना उचित होगा.

ऐसी सोच वाले एक अधिकारी ने बीबीसी से कहा, "हमें इस बात को याद रखना होगा कि शेख़ हसीना ने बांग्लादेश की राजनीति में तीन-तीन बार (वर्ष 1981, 1996 और 2008 में) ज़बरदस्त वापसी की है. इनमें से हर बार कइयों ने सोचा था कि अब शायद हसीना के लिए वापसी संभव नहीं होगी. लेकिन उन्होंने हर बार ऐसे लोगों को ग़लत साबित किया है."

लेकिन इस बात को भी याद रखना होगा कि उस समय उनकी उम्र कम थी. अब अगले महीने ही वो 77 साल की हो जाएँगी. क्या यह उनकी वापसी की राह में कोई बाधा नहीं होगी?

इसके जवाब में उस अधिकारी का कहना था, "शायद उम्र पूरी तरह उनके साथ नहीं है. लेकिन जब 84 साल की उम्र में मोहम्मद यूनुस जीवन में पहली बार सरकार के मुखिया बन सकते हैं तो हम यह क्यों मान रहे हैं कि उनके मुक़ाबले काफी कम उम्र वाली शेख हसीना ऐसा नहीं कर सकती हैं."

"मूल बात यह है कि दिल्ली में एक गुट इस बात पर गंभीर रूप से विश्वास करता है कि शेख़ हसीना एक दिन बांग्लादेश लौट कर अवामी लीग का नेतृत्व संभाल सकती हैं. इस गुट की दलील है कि ज़रूरत पड़ने पर इसके लिए भारत को उस देश के अंतरिम सरकार और सेना पर दबाव डालना होगा."

ऐसे लोगों का कहना है कि अवामी लीग पर बांग्लादेश में कोई पाबंदी नहीं लगाई गई है और पूरे देश में उसका एक ताक़तवर नेटवर्क है. उस दल की सर्वोच्च नेता के तौर पर शेख़ हसीना आने वाले दिनों में बांग्लादेश लौट ही सकती हैं.

इस समूह की राय में शेख़ हसीना बांग्लादेश में अपने खिलाफ दायर मामलों में अदालत का सामना कर सकती हैं और हो सकता है कि वो अगला चुनाव भी न लड़ सकें. लेकिन उनकी स्वदेश वापसी और राजनीति में उतरने पर कोई रोक लगाना मुश्किल है.

राजनीति शास्त्री और ओ पी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रोफेसर श्रीराधा दत्त मानती हैं कि भारत अवामी लीग को पुनर्जीवित करने में मदद भले दे सकता है, शेख़ हसीना को पुनर्वासित करना बेहद मुश्किल होगा.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "मुझे नहीं लगता कि निकट भविष्य में शेख़ हसीना के नेतृत्व में अवामी लीग राजनीति के मैदान में दोबारा खड़ी हो सकेगी. अवामी लीग राजनीतिक ताक़त के तौर पर ज़रूर टिकी रहेगी. उसे राजनीति से पूरी तरह हटाना उतना आसान नहीं है. लेकिन इसके लिए पार्टी में बड़े पैमाने पर बदलाव के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है."

यही वजह है कि बांग्लादेश के अगले चुनाव में शेख़ हसीना के नेतृत्व में अवामी लीग के मैदान में उतरने की कल्पना को वो व्यावहारिक नहीं मानती.

लेकिन भारत ने बीते क़रीब पचास वर्षो के दौरान शेख़ हसीना पर जो राजनीति निवेश किया है उसके कारण दिल्ली का एक असरदार तबका फिलहाल किसी भी हालत में उनको (हसीना को) राजनीतिक तौर पर ख़त्म हो चुकी मानने को तैयार नहीं है.

पासपोर्ट रद्द होने के बाद

बीते सप्ताह बीबीसी बांग्ला की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि शेख़ हसीना जब बांग्लादेश से भारत आई थीं तो उनके पास डिप्लोमेटिक पासपोर्ट था और उसकी सहायता को वो कम से कम 45 दिनों तक बिना वीज़ा के ही भारत में रह सकती हैं..

लेकिन बीबीसी की उस रिपोर्ट के बाद बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने अगले दिन ही शेख़ हसीना समेत तमाम मंत्रियों और सांसदों को जारी डिप्लोमेटिक पासपोर्ट रद्द करने का एलान कर दिया.

ऐसे में अब सवाल उठ सकता है कि बिना किसी पासपोर्ट के शेख़ हसीना के भारत में रहने का वैध आधार क्या है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए मैंने भारत के पूर्व राजनयिक पिनाक रंजन चक्रवर्ती से बात की. वो लंबे समय तक विदेश मंत्रालय में प्रोटोकॉल डिवीज़न के प्रमुख रह चुके हैं.

उनका कहना है कि भारत में शेख़ हसीना का प्रवास तकनीक रूप से पूरी तरह वैध है. पिनाक रंजन कहते हैं, "वो वीज़ा-फ्री दौर में आएं या किसी दूसरी विशेष परिस्थिति में उनके भारत आते समय पासपोर्ट पर अराइवल की मुहर तो लगाई गई थी न इस मुहर का मतलब ही है कि उसी समय से उनका भारत आना और यहां रहना वैध है. इसके बाद अगर उनका देश पासपोर्ट रद्द भी करता है तो इससे भारत को कोई फर्क नहीं पड़ेगा."

अगर कूटनयिक चैनल से भारत को पासपोर्ट रद्द करने वाली बात बताई भी गई तो भारत उसके आधार पर वैकल्पिक कदम उठा सकता है.

चक्रवर्ती कहते हैं, "इसके बाद भी शेख़ हसीना के पास मान्य पासपोर्ट के लिए आवेदन करने का अधिकार होगा. बांग्लादेश की नई सरकार भले ही उनका आवेदन स्वीकार नहीं करे, लेकिन एक बार आवेदन करने पर ही भारत की निगाह में उनका यहां रहना कानूनन वैध ही माना जाएगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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