ईरान के तेल पर अमेरिकी पाबंदी में ढील के संकेत, भारत को कितना फ़ायदा?

भारत अपनी तेल ज़रूरत का 90 फ़ीसदी तेल आयात करता है

इमेज स्रोत, LightRocket via Getty Image

इमेज कैप्शन, भारत अपनी तेल ज़रूरत का 90 फ़ीसदी तेल आयात करता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल मार्केट में किसी भी हलचल का भारत पर काफ़ी ज़्यादा असर होता है
    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

अमेरिका ईरान के तेल पर कोई नीतिगत बदलाव करता है तो इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा जिन देशों को हो सकता है उनमें भारत भी शामिल है.

दरअसल ईरान युद्ध के बाद दुनिया के एनर्जी मार्केट पर दबाव बढ़ा है और अमेरिका उसे कम करने के उपायों पर विचार कर रहा है.

अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने फ़ॉक्स न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि ट्रंप प्रशासन समुद्र में मौजूद जहाजों पर पहले से लदे ईरानी तेल पर लगी पाबंदियों में ढील देने की सोच रहा है.

इस तरह के कदम उठाने से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में करोड़ों बैरल तेल की सप्लाई हो सकती है. इससे युद्ध की वजह से शिपिंग और तेल उत्पादन में रुकावट की भरपाई हो सकती है.

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अपनी लगभग 90 फ़ीसदी तेल की जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है.

भारत को सस्ता तेल ख़रीदने का भी अनुभव है. अगर ईरानी तेल के मामले में सीमित ढील भी दी जाती है तो भारत के लिए राहत और अवसर दोनों पैदा हो सकता है.

स्कॉट बेसेंट ने ये सुझाव ऐसे वक़्त में दिए हैं जब युद्ध की वजह से तेल की सप्लाई पर दबाव बढ़ रहा है.

अगर अमेरिका ये कदम उठाता है तो यह उसकी लंबे समय से चली आ रही नीति में एक बड़ा और अनिश्चित बदलाव होगा.

स्कॉट बेसेंट के मुताबिक़ समुद्र में अभी 14 करोड़ बैरल तेल का कार्गो मौजूद है.

अमेरिका ख़रीदारों तक इसे पहुंचने की मंजूरी देकर सप्लाई की दिक्कतें कम करने और कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश करेगा. भले ही ये 10 से 14 दिनों तक ही क्यों न हो.

बेसेंट के मुताबिक़ इस कदम से जो तेल चीन जा रहा था वो अब दूसरे एशियाई देशों की ओर भी जा सकता है. जिससे चीन को बाज़ार दर पर तेल ख़रीदना पड़ सकता है.

साथ ही भारत, जापान और मलेशिया जैसे देशों के लिए कच्चा तेल उपलब्ध हो सकेगा. चीन अभी ईरानी तेल का सबसे बड़ा ख़रीदार है.

भारत को कितना फ़ायदा हो सकता है

भारतीय रिफ़ाइनरियों ने समुद्र में मौजूद जहाजों पर लदे लाखों बैरल रूसी तेल ख़रीदा है

इमेज स्रोत, Anadolu via Getty Images

इमेज कैप्शन, भारतीय रिफ़ाइनरियों ने समुद्र में मौजूद जहाजों पर लदे लाखों बैरल रूसी तेल ख़रीदा है

भारत के कच्चे तेल आयात का 60 फ़ीसदी से ज्यादा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है. इनमें इराक, सऊदी अरब, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं.

इनमें से भी आधा तेल होर्मुज़ स्ट्रेट से आता है. जबकि मौजूदा संघर्ष के कारण होर्मुज़ में जहाजों की आवाजाही ख़ासी बाधित हुई है.

मैरीटाइम इंटेलिजेंस फ़र्म कैप्लर के रिफ़ाइनरी और ऑयल मार्केट विश्लेषक सुमित रितोलिया के मुताबिक़ "भारत चीन के ख़रीदारों (सरकारी कंपनियां और निजी रिफ़ाइनरियां) और अन्य एशियाई देशों के साथ एक ऐसे प्रमुख डिमांड सेंटर के तौर पर रूप में उभर सकता है, जिस पर नजर रखी जाएगी."

भारत लंबे समय से ईरान के कच्चे तेल का एक बड़ा ख़रीदार रहा है.

2018 में ईरान पर पाबंदियां सख़्त होने से पहले भारत के कुल तेल आयात में ईरानी हिस्सेदारी करीब 11.5 फ़ीसदी तक पहुंच गई थी.

होर्मुज़ स्ट्रेट
इमेज कैप्शन, भारत के कच्चे तेल आयात का 60 फ़ीसदी से ज्यादा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है. इसमें से भी आधा तेल होर्मुज़ स्ट्रेट से आता है

ईरान के "लाइट" और "हेवी" ग्रेड का कच्चा तेल भारतीय रिफ़ाइनरियों के लिए काफ़ी माकूल था.

भारत को ये तेल उसकी अनुकूल कीमतों और आसान पेमेंट शर्तों पर मिलता था.

लेकिन 2019 में यह सप्लाई लगभग बंद हो गई. इसकी जगह पहले खाड़ी देशों और अमेरिका से तेल आया.

और फिर बाद में यूक्रेन युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियम बदलने से भारी छूट वाले रूसी तेल ने ले ली.

जब रियायती दरों पर रूसी तेल मिलने लगा तो भारतीय रिफ़ाइनरियां तुरंत सक्रिय हो गईं. इन रिफ़ाइनरियों ने बगैर किसी अड़चन के अपना आयात तेजी से बढ़ा दिया.

विश्लेषकों का मानना है कि अगर ईरान का तेल फिर से बाज़ार में आता है, तो ऐसे ही स्थिति दोबारा आ सकती है.

रिफ़ाइनरियां फिर हो जाएंगी ज़्यादा सक्रिय

भारत कच्चा तेल रिफ़ाइन करने वाला दुनिया का चौथा बड़ा देश है

इमेज स्रोत, LightRocket via Getty Images

इमेज कैप्शन, भारत कच्चा तेल रिफ़ाइन करने वाला दुनिया का चौथा बड़ा देश है
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

कैप्लर के अनुमान के मुताबिक़, इस समय करीब 17 करोड़ बैरल ईरानी कच्चा तेल समुद्र में मौजूद है. इनमें फ़्लोटिंग स्टोरेज और ट्रांजिट में जा रहे कार्गो शामिल हैं.

इनमें से सारा तेल पहले से तय सौदों से नहीं बंधा है. इसका एक हिस्सा अब भी बिका नहीं है.

सुमित रितोलिया के मुताबिक़ अगर पाबंदियों को ढीला किया जाता है या उनका सख़्ती से पालन नहीं होता तो इससे अतिरिक्त सप्लाई मार्केट में आ सकती है.

वो कहते हैं, "भारतीय रिफ़ाइनरियां इस तेल को फिर से अपने सिस्टम में लाने में सक्षम हैं. और इसके लिए बहुत कम ऑपरेशनल बदलाव की जरूरत होगी. क्योंकि उन्हें पहले से इसे प्रोसेस करने का अनुभव है. उनके पास इसका ट्रेडिंग नेटवर्क मौजूद है."

भारत तेल रिफ़ाइन करने वाला दुनिया का चौथा बड़ा देश है. उसे तेल और गैस सप्लाई में बाधाओं का सामना करना पड़ा है लेकिन चीन के उलट उसने रिफाइंड ईंधन के निर्यात पर रोक नहीं लगाई है.

हालांकि उसके सामने चुनौतियां कम नहीं हैं.

विशेषज्ञों के मुताबिक़, ईरानी तेल की स्थायी तौर पर वापसी होती है तो ये सिर्फ उसकी रिफ़ाइनिंग क्षमता पर नहीं, बल्कि व्यापारिक और भू-राजनीतिक कारकों पर ज्यादा निर्भर करेगी.

नई व्यवस्था साफ़ होगी तभी बनेगी बात

स्कॉट बेसेंट

इमेज स्रोत, Ludovic MARIN / AFP via Getty Images

इमेज कैप्शन, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के ईरानी तेल पर पाबंदी हल्का करने के आइडिया पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है

पाबंदियां सिर्फ बिक्री को ही नहीं रोकतीं, बल्कि शिपिंग, बीमा और पेमेंट जैसी प्रक्रियाओं को भी जटिल बना देती हैं.

सुमित रितोलिया के मुताबिक, " तेल सप्लाई आसान करने से जुड़ी बातों में कई चीजें शामिल हैं. जैसे पाबंदियों में राहत कितनी व्यापक और टिकाऊ होगी (खासतौर पर शिपिंग पर), कीमत तय करने का ढांचा क्या होगा और पेमेंट, बीमा और लॉजिस्टिक्स की क्या व्यवस्था होगी.''

जब तक इन व्यवस्थाओं को स्पष्ट या आसान नहीं किया जाता, तब तक सौदे जोख़िम भरे बने रहेंगे.

स्कॉट बेसेंट ने ये नहीं बताया कि ऐसी छूट किस तरह लागू की जाएगी.या फिर ऐसे सुरक्षा उपाय होंगे जिससे पैसा वापस ईरान तक न पहुंचे.

अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने इस पर ज़्यादा जानकारी से इनकार कर दिया है.

जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से पूछा गया कि क्या वो बेसेंट के इस आइडिया का समर्थन करेंगे तो उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया.

उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, "हम कीमत को नियंत्रित रखने के लिए जो जरूरी होगा, करेंगे'' और बात अधूरी छोड़ दी.

यह भी साफ़ नहीं है कि बेसेंट के इस प्रस्ताव को अमेरिका में कितना समर्थन मिलेगा.

क्योंकि अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव ने हाल ही में ईरान के तेल क्षेत्र पर पाबंदियां और सख़्त करने वाला एक बिल पास किया है.

यह प्रस्ताव ऐसे समय पर आया है जब अमेरिका पहले ही सप्लाई बढ़ाने के लिए कई कदम उठा चुका है.

इनमें रिजर्व से लाखों बैरल तेज जारी करने से लेकर पिछले हफ़्ते रूसी तेल पर कुछ पाबंदियों में ढील देना शामिल है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)