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राहुल गांधी और सोनिया गांधी को क्या वाकई नेशनल हेराल्ड मामले में अदालत से राहत मिली है?
- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
मंगलवार 16 दिसंबर को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की नेशनल हेराल्ड मामले में दायर की गई चार्जशीट का संज्ञान लेने से मना कर दिया.
ईडी का आरोप था कि कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी और राहुल गांधी समेत अन्य लोगों ने पैसों का घोटाला किया था.
इसी मामले के तहत ईडी ने इस साल अप्रैल में एक चार्जशीट दायर की थी. ईडी की चार्जशीट को प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट भी कहा जाता है.
चार्जशीट दायर करने के बाद कोर्ट को उसका संज्ञान लेना होता है. फिर मामला आगे बढ़ता है.
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इस आदेश को कांग्रेस पार्टी ने एक बड़ी जीत बताया. बुधवार की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, "ये (फै़सला) एजेंसी के दुरुपयोग का प्रमाण है."
वहीं दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि इस फै़सले से नेशनल हेराल्ड मामले में 'क्लीन चिट' नहीं मिली है.
उन्होंने कहा कि एक टेक्निकल आधार पर ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान नहीं लिया, लेकिन मामला अब भी चल रहा है.
उनका कहना था कि इस पर जांच आगे चल सकती है, और ईडी चाहे तो इस फ़ैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दे सकती है.
यह एक बड़ा फै़सला है. लेकिन इस फ़ैसले का मतलब क्या है? समझिए इस लेख में.
क्या है मामला?
2013 में भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने अदालत में एक शिकायत दर्ज की.
इसमें उन्होंने कहा कि सोनिया और राहुल गांधी समेत कई लोगों ने 'एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल)' की क़रीब 2000 करोड़ रुपए की संपत्ति को केवल 50 लाख रुपए में 'यंग इंडियन' नाम की एक कंपनी को दे दिया. एजेएल वही कंपनी है जो नेशनल हेराल्ड अख़बार को छापती है.
इसकी शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने की थी.
सुब्रमण्यम स्वामी ने इसमें 'धोखाधड़ी' और 'आपराधिक षड्यंत्र', समेत अन्य आरोप लगाए. उनकी याचिका पर कोर्ट ने 2014 में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, और अन्य लोगों को पेश होने का आदेश दिया.
ये कार्यवाही कोर्ट में चल रही थी कि 2021 में ईडी ने इस आधार पर एक शिकायत दर्ज की. ईडी की शिकायत को 'एनफ़ोर्समेंट केस इनफ़ॉर्मेशन रिपोर्ट' कहते हैं. ये पुलिस में दर्ज एफ़आईआर जैसा होता है.
इस शिकायत की जाँच करने के बाद ईडी ने इस साल अपनी चार्जशीट दायर की. इसमें उन्होंने राहुल गांधी और सोनिया गांधी, समेत अन्य लोगों पर पैसों के घोटाले का आरोप लगाया.
इस चार्जशीट में कुल सात अभियुक्त थे, जिसमें यंग इंडियन कंपनी के साथ-साथ उनके निदेशक सुमन दूबे और सैम पित्रोदा भी शामिल थे.
कानूनी प्रक्रिया क्या है?
मंगलवार को कोर्ट में क्या हुआ, यह समझने के लिए पहले समझते हैं कानूनी प्रक्रिया क्या है.
किसी भी अपराध में आम तौर पर आप पुलिस के पास जाते हैं और एफ़आईआर दर्ज करवाते हैं. फिर पुलिस उसकी तहक़ीक़ात करके चार्जशीट दायर करती है, जिसे कोर्ट भेजा जाता है उसका संज्ञान लेने के लिए.
संज्ञान लेने के बाद कोर्ट तय करती है कि किन आधारों पर मुकदमा चलना चाहिए.
हालांकि, पैसे के घोटालों के मामलों में प्रक्रिया थोड़ी अलग होती है.
उदाहरण के तौर पर, अगर किसी व्यक्ति का अपहरण होता है और उसकी फ़िरौती ली जाती है, तो पुलिस अपहरण की तहक़ीक़ात करेगी और ईडी फ़िरौती के पैसों की.
इसमें, पुलिस अपहरण के लिए पहले एक एफ़आईआर दर्ज करेगी. इस एफ़आईआर के आधार पर ईडी एक नई शिकायत दर्ज करेगी.
इसलिए पहले कोई जांच एजेंसी मामले में शिकायत दर्ज करती है, फिर अगर उस अपराध में पैसों की हेराफेरी हुई है तो ईडी उसकी जाँच करती है. मनी लॉंड्रिंग के कानून में अपराधों की सूची दी गई है, जिनसे कोई आय होने पर ईडी उसकी जाँच कर सकती है.
कोर्ट के सामने भी यही मुद्दा था. अभियुक्तों का कहना था कि इस मामले में पुलिस में कोई शिकायत या एफ़आईआर दर्ज नहीं थी, इसलिए ईडी इस मामले में आगे जांच नहीं कर सकती है.
वहीं ईडी की तरफ़ से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एएस राजू का कहना था कि क्योंकि 2014 में कोर्ट ने डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत का संज्ञान लिया था और अभियुक्तों को पेश होने को कहा था, इसलिए इस मामले में किसी एफ़आईआर की ज़रूरत नहीं है.
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने अभियुक्तों के तर्कों से सहमति जताई. कोर्ट ने कहा कि एफ़आईआर के बाद पुलिस की जांच में और किसी मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत करने में बहुत फ़र्क़ होता है.
पुलिस के पास तहक़ीक़ात करने के बेहतर संसाधन होते हैं.
कोर्ट ने कहा कि ईडी पैसों के घोटाले के लिए तभी जाँच कर सकती है, जब कोई एफ़आईआर के तहत जांच से वह अपराध उजागर हो जिससे पैसे आए हों.
किसी निजी व्यक्ति की शिकायत पर ईडी जांच नहीं कर सकती, जैसा इस मामले में हुआ था.
कोर्ट ने यह भी कहा कि ईडी की हालिया सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि बाक़ी जाँच एजेंसियों की जांच के बाद ईडी मनी लॉंड्रिंग की कार्यवाही करती है.
साथ ही कोर्ट ने दो मामलों का उदाहरण दिया जिनमें ईडी ने कार्यवाही करने से मना कर दिया जहाँ पर कोई एफ़आईआर दायर नहीं हुई थी.
कोर्ट ने इस मामले में ईडी के दस्तावेज़ों को भी देखा. कोर्ट ने पाया कि 2014 में डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने ईडी और केंद्रीय जांच एजेंसी, यानी सीबीआई, को चिट्ठी लिखी थी, और कहा था कि इस मामले में उन्हें कार्यवाही करनी चाहिए.
उन्होंने पाया कि 2014 से 2021 के बीच अनेक स्तर पर ईडी के अफ़सरों का ये मानना था कि केवल डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की कोर्ट में शिकायत के आधार पर पैसों के घोटाले का केस नहीं बनाया जा सकता.
2014 में सीबीआई को उन्होंने एक चिट्ठी भी लिखी थी जिसमें उन्होंने कहा था कि इस शिकायत पर मनी लॉंड्रिंग का मामला नहीं आगे बढ़ सकता और कहा था कि सीबीआई को इसमें पर्याप्त कार्यवाही करनी चाहिए.
2015 में डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने फिर से सीबीआई को एक शिकायत भेजी थी. लेकिन कोर्ट ने कहा कि सीबीआई ने इन 11 सालों में शिकायत नहीं दर्ज की है. ईडी ने भी केवल 2021 में ही शिकायत दर्ज की.
कोर्ट ने कहा, "ईडी ख़ुद इस बात से सहमत नहीं थी कि इस मामले में पीएमएलए (पैसों के घोटाले का क़ानून) के तहत कार्यवाही की जा सकती है क्योंकि इस मामले में कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं थी."
साथ ही कोर्ट ने कहा कि ये निष्कर्ष भी निकाला जा सकता है कि सीबीआई की फिर शिकायत दर्ज करने की 'हिचकिचाहट' की वजह से ईडी ने भी 2021 तक शिकायत दर्ज नहीं की.
इन कारणों से कोर्ट ने ईडी की चार्जशीट का संज्ञान लेने से मना कर दिया.
आगे क्या?
इस मामले में कोर्ट ने इस बात पर फै़सला नहीं दिया है कि नेशनल हेराल्ड मामले में पैसों का घोटाला हुआ है या नहीं.
कोर्ट ने कहा कि वे इस विषय पर टिप्पणी नहीं करना चाहेंगे क्योंकि अभी ईडी की जांच चल रही है. बल्कि, कोर्ट ने कहा है कि मनी लॉंड्रिंग का केस चलाने के लिए जिस प्रक्रिया का पालन होना चाहिए, वो नहीं हुआ था, यानी किसी एफ़आईआर का होना.
हालांकि, इस साल अक्तूबर में ही दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक ऑफ़ेंस विंग ने नेशनल हेराल्ड मामले में एक एफ़आईआर दर्ज की है.
जब कोर्ट ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू से पूछा कि क्या वो इस एफ़आईआर को ईडी की दायर चार्जशीट का आधार बनाना चाहेंगे, तो उन्होंने कहा कि नहीं.
एसवी राजू का कहना था कि ये एफ़आईआर आगे की प्रक्रिया के लिए है, इसका फ़िलहाल दायर चार्जशीट से कोई ताल्लुक नहीं है.
कानून के विशेषज्ञों का कहना है कि ये एक अहम फ़ैसला है. सुप्रीम कोर्ट के वकील निज़ाम पाशा का कहना है, "जब कोर्ट चार्जशीट का संज्ञान लेने से मना कर देती है, तो मामला वहीं ख़त्म हो जाता है."
ईडी ने मीडिया में सूत्रों के ज़रिए कहा है कि वे राउज एवेन्यू अदालत के फै़सले को चुनौती दिल्ली हाई कोर्ट में देंगे.
निज़ाम पाशा ने कहा कि ये संभव है कि ईडी हाल में दर्ज की गई दिल्ली पुलिस की एफ़आईआर पर एक नई शिकायत दर्ज करे. "लेकिन उसमें यह सवाल कोर्ट को तय करना होगा कि क्या ये डबल जियोपर्डी है या नहीं.
डबल जियोपर्डी का मतलब है, कि एक ही अपराध के लिए किसी पर एक से ज़्यादा बार दंड नहीं दिया जा सकता और एक से ज़्यादा बार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.
प्रतीक चड्ढा, जो मनी लॉंड्रिंग के केस लड़ते हैं और पहले कांग्रेस पार्टी के लिए भी केस लड़ चुके हैं, कहते हैं, "ये फ़ैसला कांग्रेस के लिए एक जीत है. लेकिन, इस फ़ैसले से ये मामला ख़त्म नहीं होगा. अभी और क़ानूनी प्रक्रिया चलेगी. ईडी इस फैसले के ख़िलाफ़ अपील कर सकती है. वहीं दूसरी ओर इस मामले में अभियुक्त हाल में दायर एफ़आईआर का विरोध करेंगे, और राउज़ एवेन्यू कोर्ट के फैसले का समर्थन करेंगे."
हालांकि, 2014 में डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत की कार्यवाही अब भी कोर्ट के सामने चल रही है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.