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कश्मीर की रूह कही जाने वाली इस चीज़ को बचाने के लिए क्या किया जा रहा है?
- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
मुग़ल बादशाह शाहजहां ने लगभग 350 साल पहले कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में डल झील के किनारे लंबे-चौड़े नसीम बाग़ में 1200 चिनार के पौधे लगाए थे और उसके बाद कई दशकों तक जगह-जगह चिनार के पौधे लगाने का रुझान आम हो गया.
आज कश्मीर में शायद ही कोई जगह हो जहां चिनार के पेड़ न हों. लेकिन इसके साथ ही दशकों से चिनार के पेड़ों की बेदर्दी से कटाई में भी तेज़ी आई है. चिनार सिर्फ़ तस्करी की वजह से ही ग़ायब नहीं हो रहे हैं. सरकारी इमारतों और सड़क बनाते वक़्त भी इनकी कटाई हो रही है.
चिनार के पेड़ों की कटाई के ख़िलाफ़ कश्मीर में कई बार विरोध प्रदर्शन भी हुए और विशेषज्ञों ने इस ख़ूबसूरत पेड़ के विलुप्त होने के ख़तरे से भी सावधान किया है.
यही वजह है कि कश्मीर के वन विभाग ने चिनार की जियो टैगिंग की मुहिम शुरू की है और अभी तक इस अभियान के दौरान 35 हज़ार पेड़ों को जियो टैग किया जा चुका है.
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क्या जियो टैगिंग से चिनार बच जाएंगे?
वन विभाग के शोधकर्ता डॉक्टर सैयद तारिक़ जियो टैगिंग अभियान के प्रमुख हैं.
वह कहते हैं, "हम एक-एक चिनार के पास जाकर उसकी मोटाई, लंबाई, उसकी सेहत और उसकी जगह नोट करते हैं. इसके बाद इन जानकारियों की कोडिंग होती है. फिर इस कोड को एक प्लेट पर प्रिंट करके चिनार के पेड़ पर लगाया जाता है."
वह कहते हैं कि इस मुहिम से न केवल चिनार के पेड़ों की सही संख्या पता चलेगी बल्कि छिपकर और अवैध तरीक़े से पेड़ काटने वालों को भी रोका जा सकेगा.
मुहिम के दौरान कश्मीर के गांदरबल ज़िले में 74 फीट मोटे तने वाला चिनार भी मिला जिसकी जानकारी संबंधित अंतरराष्ट्रीय संस्थान को भी दी गई है.
चिनार को बचाने से जुड़े इस अभियान के दौरान लोगों को जागरूक भी किया जा रहा है.
डॉक्टर तारिक़ कहते हैं कि चिनार के पेड़ों से भरे बाग़ों में जब लोग आग जलाते हैं तो उनकी झुकी हुई टहनियों को नुक़सान पहुंचता है. इसकी वजह से भी चिनार के सैकड़ों पेड़ खोखले हो चुके हैं.
कश्मीर में पाए जाने वाले चिनार के पेड़ों की उम्र 100 से 300 साल के बीच है. अगर इन पेड़ों को पूरी तरह सुरक्षा भी दी जाए तब भी यह अगले डेढ़ सौ सालों के दौरान अपने आप गिर जाएंगे.
इस ख़तरे को देखते हुए गांदरबल में ही वन विभाग ने एक बहुत बड़ी नर्सरी बनाई है जहां अच्छे स्वस्थ चिनार के पेड़ों की टहनियां विशेषज्ञों की निगरानी में लगाई गई है.
डॉक्टर सैयद तारिक़ कहते हैं, "इस नर्सरी से हम हर साल अलग-अलग इलाक़ों में बोने के लिए हज़ारों चिनार 'कटिंग्स' दे सकते हैं जिसका मतलब यह है कि अगले पांच साल के दौरान हम पूरे कश्मीर में 50 हज़ार से एक लाख तक चिनार के नए पौधे लगा चुके होंगे."
धर्म और संस्कृति का प्रतीक चिनार
हर बाग़ में, हर खेत की मेड़ पर और सड़क के किनारे पाया जाने वाला चिनार कश्मीर में रहने वालों की ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है.
वसंत और गर्मी के मौसम में हरे-भरे चिनार की छांव हो या पतझड़ में चिनार के सुनहरे पत्ते, कोई तस्वीर, कोई ग़ज़ल और कोई भी शे'र चिनार के बिना पूरा नहीं होता.
कश्मीर में मध्य एशिया से आए सैकड़ों इस्लामी उपदेशकों की मज़ारें हैं. उनमें से कई चिनार के पेड़ के साए में हैं और इसी वजह से चिनार के पेड़ को धार्मिक पवित्रता भी मिली हुई है.
मशहूर शायर इक़बाल ने 1930 के दशक में कश्मीर के बारे में लिखे एक शे'र में चिनारों का वर्णन किया था.
जिस ख़ाक के ज़मीर में हो आतिश-ए-चिनार
मुमकिन नहीं कि सर्द हो वो ख़ाक-ए-अर्जुमंद
(ख़ाक= मिट्टी, अर्जुमंद= प्रतिष्ठित, योग्य)
कश्मीर की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी नेशनल कॉन्फ़्रेंस के संस्थापक और स्वायत्त कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री शेख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह ने अपनी जीवनी का शीर्षक भी 'आतिश-ए-चिनार' ही रखा था.
यहां तक कि कुछ साल पहले श्रीनगर में भारतीय सेना की 15वीं कोर के हेडक्वार्टर का नाम भी 'चिनार कोर' रखा गया था क्योंकि हज़ारों कनाल पर फैली इस फ़ौजी छावनी में चिनार के सैकड़ों पेड़ हैं.
चिनार के पेड़ों से घिरी कश्मीर की वादियों में बॉलीवुड की दर्जनों फ़िल्में शूट हुई हैं.
सन 1972 में बनी फ़िल्म 'इंतज़ार' का एक गाना डल झील के किनारे चिनार के पेड़ों के बीच शूट किया गया था.
उस फ़िल्म के लिखे गए हसरत जयपुरी के गाने की कुछ लाइनें अब भी सबकी ज़बां पर रहती हैं:
कभी हम साथ गुज़रे जिन सजीली राह ग़ुज़ारों से
फ़िज़ा के भेस में गिरते हैं पत्ते अब किनारों से
यह राहें याद करती हैं, यह गुलशन याद करता है
बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है
परिंदों का घर
डॉक्टर सैयद तारिक़ का कहना है कि चिनार केवल ख़ूबसूरती का प्रतीक नहीं बल्कि यह कई तरह के परिंदों का भी घर है और साथ ही प्रदूषण के ख़िलाफ़ एक प्राकृतिक उपाय है.
वो कहते हैं, "चिनार के पेड़ बहुत ऊंचे होते हैं. जड़ों के पास नेवले अपना घर बनाते हैं. इसके बाद छोटे परिंदे होते हैं. उसके ऊपर कौवे अपना बसेरा करते हैं और सबसे ऊंचाई पर चीलें अपना घोंसला बनाती हैं."
वो कहते हैं, "काटा जाए तो केवल चिनार ही नहीं गिरता बल्कि सैकड़ों परिंदों का घर भी उजड़ जाता है."
उनका कहना है की हवा से जितना कार्बन डाइऑक्साइड दूसरे 200 पेड़ सोखते हैं उतना केवल एक चिनार सोख सकता है.
डॉ. तारिक के मुताबिक़, "नई दिल्ली में वायु प्रदूषण का संकट गंभीर हुआ तो वहां किसी ने कहा था कि अगर यहां मौसम अनुकूल होता तो केवल 50 चिनार इस प्रदूषण को ख़त्म कर सकते थे."
कश्मीर में चिनार के पेड़ों को बचाने के लिए 1969 का एक क़ानून लागू है जिसके तहत चिनार काटना एक जुर्म है. इसकी टहनियों को काटने के लिए भी सरकारी इजाज़त ज़रूरी है.
लेकिन चिनार को बचाने के लिए इस क़ानून को और सख़्त बनाने की मांग दशकों से की जा रही है और यहां के लोगों की मांग है कि चिनार को 'हेरिटेज ट्री' घोषित किया जाए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित