फ़ारस की खाड़ी जितना तेल और गैस दुनिया में कहीं और क्यों नहीं है

    • Author, स्कॉट एल मोंटगोमरी
    • पदनाम, द कन्वर्सेशन
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

फ़ारस की खाड़ी के देशों को अपने विशाल तेल और गैस भंडारों से जहां बहुत फ़ायदा मिला है वहीं उन्हें इसके कारण नुक़सान भी झेलने पड़े हैं.

ये जगह पूरी दुनिया की ऊर्जा का केंद्र है. यही कारण है कि जब यहां युद्ध होता है तो वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा हो जाता है.

इस क्षेत्र का अध्ययन करने वाले एक पेट्रोलियम भूविज्ञानी के रूप में, मैं अभी भी इसके हाइड्रोकार्बन भंडारों की विशालता से हैरान हूं.

उदाहरण के लिए फ़ारस की खाड़ी के आसपास 30 से अधिक विशालकाय तेल भंडार हैं. जिनमें से हर एक में पांच अरब बैरल या उससे अधिक कच्चा तेल मौजूद है.

खाड़ी क्षेत्र के कुएं उत्तरी सागर और रूस के सबसे अच्छे कुओं की तुलना में भी प्रतिदिन दो से पांच गुना अधिक तेल का उत्पादन करते हैं.

आधुनिक भूविज्ञान ने चट्टानों में कई प्रमुख कारकों की पहचान की है जो किसी क्षेत्र को तेल से विशेष रूप से समृद्ध बनाते हैं. इनमें हाइड्रोकार्बन उत्पन्न करने और बनाए रखने की उनकी क्षमता भी शामिल है.

फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र में, ये सभी कारक बहुत अच्छे स्तर पर मौजूद हैं.

इसी कारण फ़ारस की खाड़ी का इलाका तेल और गैस के मामले में दुनिया में सबसे खास और अनोखा है.

एक लंबा इतिहास

हिमयुग (आइस एज) के अंत में, लगभग 14,000 से 6,000 साल पहले, जब बाढ़ से फ़ारस की खाड़ी का निर्माण हुआ था, उससे बहुत पहले ही मनुष्य इस क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन की उपस्थिति के बारे में जानते थे.

इस क्षेत्र के कई हिस्सों में नदियों और घाटियों के किनारे कच्चे तेल और गैस का प्राकृतिक रिसाव आम बात है.

हजारों साल पहले (ईसा के बाद का समय या ईस्वी सन्), लोग बिटुमेन नामक एक प्रकार के भारी पेट्रोलियम पदार्थ का उपयोग मोर्टार बनाने और जहाजों को जलरोधक बनाने के लिए करते थे.

तेल की पहली आधुनिक खोज 1908 में पश्चिमी ईरान में एक मशहूर रिसाव स्थल पर हुई थी.

1950 और 1960 के दशक में, जब तेल और गैस की खोज में तेजी से विस्तार हो रहा था, तब यह साफ हो गया कि पृथ्वी पर किसी अन्य क्षेत्र में तेल और गैस इतनी मात्रा में नहीं मिलेगा.

रूस में पश्चिमी साइबेरिया और हाल ही में अमेरिका में पर्मियन बेसिन जैसे अन्य क्षेत्रों में भी तेल और गैस के विशाल भंडार पाए गए हैं. लेकिन फ़ारस की खाड़ी में मौजूद विशाल भंडारों से इनकी तुलना नहीं की जा सकती.

जियोलॉजिकल सेटिंग

फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र दो टेक्टोनिक प्लेट्स के टकराव वाले स्थान पर स्थित है. दक्षिण-पूर्व में अरब प्लेट और पूर्व और उत्तर में यूरेशियन प्लेट.

यह टकराव लगभग साढ़े तीन करोड़ सालों से हो रहा है और इसकी वजह से एक गतिशील परिदृश्य पैदा हुआ है जहां चट्टानों की परतें मुड़ गई हैं और टूट गईं, और गहरे स्तरों पर, बहुत ज़्यादा गर्मी और दबाव से रूपांतरित हो गईं.

खाड़ी के दोनों किनारों की भूवैज्ञानिक विशेषताएं काफी अलग हैं. ईरान की ओर, ज़ाग्रोस पर्वत श्रृंखला ओमान की खाड़ी से लेकर तुर्की की सीमा तक करीब 1,800 किलोमीटर तक फैली हुई है.

विशाल अल्पाइन-हिमालयी पर्वत श्रृंखला का एक हिस्सा, ज़ाग्रोस पर्वत श्रृंखला अत्यधिक मुड़ी हुई और टूटी हुई चट्टानों से बनी है. ये पिछले 6 करोड़ सालों में अफ्रीका, अरब और भारत के यूरेशिया के साथ टकराव के कारण बनी हैं.

खाड़ी के अरब तट पर उस प्रकार का झुकाव और विखंडन नहीं हुआ.

टक्कर की ताकत ने गहरी और सख्त चट्टान के ठोस हिस्से को दबाकर बदल दिया, जिसे "बेसमेंट रॉक" के रूप में जाना जाता है. इससे विशाल आकार की गुंबदनुमा संरचनाएं बन गईं, जो दसियों, यहां तक ​​कि सैकड़ों वर्ग किलोमीटर तक फैली हुई हैं.

फ़ारस की खाड़ी के नीचे ज़ाग्रोस पर्वत उठने से एक बड़ा गड्ढा बना, जो मिट्टी और पत्थरों से भर गया. इस गड्ढे के सबसे गहरे हिस्सों में बहुत ज़्यादा गर्मी और दबाव रहा, जिससे तेल और गैस बनने की प्रक्रिया हुई. इसलिए यह जगह तेल और गैस बनने और जमा होने के लिए बहुत अच्छी है.

कच्चे तेल का उत्पादन करने वाली चट्टानें

कच्चा तेल और गैस छोटे समुद्री जीवों (ज़ूप्लंकटन और फाइटोप्लंकटन) से बनते हैं. ये जीव मिट्टी वाली चट्टानों और चूना पत्थर में दबे रहते हैं.

जब इन चट्टानों पर बहुत ज़्यादा गर्मी और दबाव पड़ता है, तो तेल और गैस बनने लगते हैं. अगर किसी चट्टान में कम से कम 2 फीसदी जैविक पदार्थ हो, तो उसे तेल और गैस बनाने के लिए अच्छा माना जाता है.

खाड़ी क्षेत्र में ऐसी चट्टानों की परतें बहुत ज़्यादा हैं, जिनमें से कुछ मोटी और जैविक पदार्थ से भरपूर हैं. उदाहरण के तौर पर, अरब खाड़ी में हनीफा और तुवैक़ संरचनाएं (जुरासिक काल, 200–145 मिलियन साल पहले) और ईरान की कज़दुमी संरचना (क्रेटेशियस काल, 145–66 मिलियन साल पहले) शामिल हैं.

इन चट्टानों में 1 फीसदी से 13 फीसदी तक जैविक पदार्थ पाया जाता है, और कुछ जगहों पर यह मात्रा इससे भी अधिक है.

तेल और गैस संरचनाएं

इस क्षेत्र की चट्टानें मुड़ी-तुड़ी और टूटी हुई हैं, जिनमें गुंबद जैसी संरचनाएं भी हैं. ये सब तेल और गैस को फंसाने के लिए बहुत उपयुक्त हैं.

ज़ाग्रोस पर्वतमाला, जो उपग्रह तस्वीरों में बेहद खूबसूरत दिखती है, में सैकड़ों अरब बैरल तेल और बहुत बड़ी मात्रा में गैस मौजूद है. अगर फ़ारस की खाड़ी का तेल-गैस मानचित्र देखें, तो उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व तक फैली लंबी पट्टियां दिखती हैं, जो चट्टानों के मुड़ने को दिखाती हैं.

इन संरचनाओं में सैकड़ों भंडार हैं, जो दक्षिणी ईरान से लेकर उत्तर-पूर्वी इराक तक फैले हुए हैं. अरब पठार पर गुंबदनुमा चट्टानों ने बहुत बड़े तेल-गैस भंडार बनाए हैं. इनमें सऊदी अरब का घवार क्षेत्र शामिल है, जो दुनिया का सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है और 70 अरब बैरल से ज़्यादा तेल दे सकता है.

ईरान और क़तर के बीच का साउथ पार्स-नॉर्थ डोम गैस क्षेत्र भी बेहद विशाल है, जिसकी ऊर्जा क्षमता 200 अरब बैरल तेल के बराबर है.

सबसे अहम भंडारण चट्टानें चूना पत्थर हैं, जिनमें दरारें और घुली हुई जगहें तेल-गैस के बहाव को आसान बनाती हैं. ज़ाग्रोस क्षेत्र में प्लेटों की टक्कर से बनी दरारों से तरल पदार्थ आसानी से चलता है.

सऊदी अरब और ईरान में ये चट्टानें सैकड़ों-हज़ारों वर्ग किलोमीटर तक फैली हैं. दुनिया में कहीं और इतनी बड़ी और अनोखी पेट्रोलियम संरचना नहीं मिलती, जो फ़ारस की खाड़ी को खास बनाती है.

भविष्य की संभावनाएं

दुनिया के लगभग आधे पारंपरिक तेल और 40 फीसदी गैस, पृथ्वी की सतह के सिर्फ़ 3 फीसदी हिस्से के नीचे मौजूद हैं.

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण का कहना है कि सौ साल से ज़्यादा समय तक तेल-गैस निकालने के बाद भी फ़ारस की खाड़ी में अभी बहुत बड़ा भंडार बाकी है.

2012 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अरब प्रायद्वीप और ज़ाग्रोस पर्वतमाला में पहले से खोजे गए भंडारों के अलावा 86 अरब बैरल तेल और 9.5 ट्रिलियन घन मीटर गैस हो सकती है.

अमेरिका में 2000 और 2010 के दशक में विकसित नई तकनीकें, जैसे क्षैतिज ड्रिलिंग (होरिज़ोंटल ड्रिलिंग) और फ्रैकिंग से और ज़्यादा तेल-गैस निकाला जा सकता है.

सऊदी अरब और यूएई इन तरीकों को आज़मा रहे हैं. अभी यह कहना मुश्किल है कि ये कितनी सफल होंगी, लेकिन अध्ययनों से लगता है कि उत्पादन और बढ़ सकता है.

यह जानकारी प्रोफेसर स्कॉट एल. मोंटगोमरी ने अपने लेख में दी थी, जो द कन्वर्सेशन में प्रकाशित हुआ था.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.