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वज़न कम करने की सस्ती दवाएं मोटापे से जंग को कर सकती हैं आसान
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
कम से कम सैद्धांतिक रूप से ही, भारत के लोग जल्द ही मोटापे की समस्या से निजात पा सकते हैं. इस शुक्रवार को सेमाग्लूटाइड नाम की दवा का पेटेंट भारत में ख़त्म होने जा रहे है.
डेनमार्क की दवा निर्माता कंपनी नोवो नॉर्डिस्क की ब्लॉकबस्टर वेट-लॉस दवा वेगोवी और ओज़ेम्पिक में सेमाग्लूटाइड का इस्तेमाल होता है.
पेटेंट ख़त्म होने के बाद घरेलू फ़ार्मास्यूटिकल कंपनियां बड़े पैमाने पर सेमाग्लूटाइड के सस्ते या जेनेरिक वर्ज़न बनाना शुरू कर देंगी. इसके बाद होने वाली होड़ के कारण दाम काफ़ी गिर सकते हैं.
इससे भारत ही नहीं बल्कि अन्य देशों में इसकी उपलब्धता बढ़ जाएगी.
इनवेस्टमेंट बैंक जेफ़्रीज़ ने इसे भारत के लिए संभावित 'मैजिक पिल मूवमेंट' करार देते हुए कहा है कि सेमाग्लूटाइड की घरेलू मार्केट एक अरब डॉलर तक पहुंच सकती है.
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भारतीय फ़ार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री पर नज़र रखने वालों का अनुमान है कि एक महीने के अंदर सेमाग्लूटाइड की जेनेरिक दवा के क़रीब 50 ब्रांड भारतीय बाज़ार में आ सकते हैं.
साल 2022 में डायबिटीज़ की दवा सिटाग्लिप्टिन से पेटेंट ख़त्म हुआ तो एक महीने के अंदर 30 ब्रांडेड वर्ज़न सामने आ गए थे और साल भर में इनकी संख्या 100 तक पहुंच गई थी.
भारत का दवा उद्योग इस समय 60 अरब डॉलर का है और 2030 के इसके दोगुना होने का अनुमान है. इनमें से अधिकांश जेनेरिक दवाओं का हिस्सा है और मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर के लिए सेमाग्लूटाइट में कड़ी होड़ का मंच तैयार हो चुका है.
मूल रूप से डायबिटीज़ के इलाज़ के लिए विकसित की गई ये दवाएं मोटापा कम करने के लिए एक गेमचेंजर बताई जाती हैं और दावा किया जाता है कि पहले की दवाओं से ये कहीं अधिक कारगर हैं.
कितनी सस्ती हो जाएगी दवा
कई भारतीय दवा निर्माता कंपनियां पहले ही इस दिशा में कदम बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं.
रिसर्च फ़र्म फ़ार्मारैक की वाइस-प्रेसिडेंट शीतल सपाले के मुताबिक, सिप्ला, सन फ़ार्मा, डॉ रेड्डीज़ लैबोरेट्रीज़, बायोकॉन, नैटको, ज़ायडस और मैनकाइंड फ़ार्मा जैसी बड़ी कंपनियां ब्रांडेड जेनेरिक दवाएं तैयार कर रही हैं, और कई अन्य कंपनियां भी इसमें शामिल हो सकती हैं. कीमतों में तेज़ गिरावट की उम्मीद है.
फ़िलहाल मासिक इलाज की लागत काफ़ी ज़्यादा है: ओज़ेम्पिक आमतौर पर 8,800 से 11,000 रुपये में बिकती है, जबकि वेगोवी की क़ीमत 10,000 से 16,000 रुपये तक हो सकती है.
सपाले का अनुमान है कि जेनेरिक प्रतिस्पर्धा के बाद यह लागत घटकर लगभग 3,000 से 5,000 रुपये प्रति माह रह सकती है.
कम क़ीमतें बाज़ार के गणित को बदल सकती हैं. भारत का एंटी-ओबेसिटी दवा क्षेत्र पहले ही तेज़ी से बढ़ा है. फ़ार्मारैक के अनुसार, यह बाज़ार 2021 में लगभग 1.6 करोड़ डॉलर से बढ़कर करीब 10 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है.
साल 2022 में सेमाग्लूटाइड के पहले ओरल वर्ज़न राइबेल्सस के लॉन्च के बाद मांग और तेज़ हुई. यह उछाल स्वास्थ्य से जुड़े एक बड़े बदलाव को दिखाता है.
भारत में पहले से ही टाइप-2 डायबिटीज़ से पीड़ित 7.7 करोड़ से ज़्यादा लोग हैं और यहां अधिक वज़न वाले वयस्कों की संख्या, दुनिया के शीर्ष देशों में से एक है.
शहरी जीवनशैली, कार्बोहाइड्रेट से भरपूर खानपान और कम शारीरिक गतिविधि ने इन दोनों स्थितियों को बढ़ाने में भूमिका निभाई है.
डॉक्टरों के लिए, सस्ती जीएलपी-1 दवाएं जल्द ही मोटापे के ख़िलाफ़ एक प्रभावी नया विकल्प बन सकती हैं. वज़न घटाने वाली दवाएं अब सिर्फ़ एंडोक्राइनोलॉजी क्लीनिक तक सीमित नहीं रहीं. कार्डियोलॉजिस्ट इनका इस्तेमाल एंजियोप्लास्टी जैसे प्रोसीजर से पहले मरीजों का वज़न कम करने में करते हैं.
ऑर्थोपेडिक सर्जन घुटने की सर्जरी से पहले जोड़ों पर दबाव कम करने के लिए और चेस्ट फिज़िशियन ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया जैसी स्थितियों के इलाज में इनका इस्तेमाल करते हैं.
मुंबई में सर्जन मुफ़्फ़ज़ल लकड़वाला कहते हैं कि ये दवाएं, भारत में डायबिटीज़ और मोटापे से ग्रस्त एक बड़ी आबादी के इलाज़ में नाटकीय बदलाव ला सकती हैं,
वो कहते हैं कि फ़िलहाल तक इन दवाओं तक पहुंच क़ीमत अधिक होने की वजह से बहुत सीमित थी
उनके अनुसार, यह बहुत बढ़िया है कि ये दवाएं सस्ती हो जाएंगी ताकि डायबिटीज़ और मोटापे की समस्या वाली आम भारतीय आबादी को यह उपलब्ध हो सकती है.
लेकिन वो चेतावनी भी देते हैं, "यहां बनने वाली दवाओं की क्वालिटी पर बहुत कड़ाई से निगरानी रखने ज़रूरत है."
भारत का जेनेरिक बाज़ार
यह सतर्कता भारत के फ़ार्मास्यूटिकल उद्योग की एक व्यापक हक़ीक़त को दर्शाती है, जो कम लागत वाली जेनेरिक दवाओं के मामले में वैश्विक स्तर पर एक प्रमुख ताक़त है.
भारत दुनिया में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा सप्लायर है, जो 60 से ज़्यादा चिकित्सीय श्रेणियों में लगभग 60,000 ब्रांड बनाता है और वैश्विक जेनेरिक सप्लाई का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा रखता है.
'दुनिया की फ़ार्मेसी' के रूप में भारत की पहचान काफ़ी हद तक इस क्षमता पर टिकी है कि यह महंगी दवाओं को किफ़ायती, बड़े पैमाने पर उपलब्ध उत्पादों में बदल देता है.
इसका सबसे चर्चित उदाहरण दो दशक पहले सामने आया, जब भारतीय कंपनियों ने एचआईवी एंटीरेट्रोवायरल दवाओं की क़ीमत में भारी कमी लाने में मदद की, जिससे अफ्रीका और विकासशील देशों में इलाज का दायरा तेज़ी से बढ़ा.
आज भारत 200 से ज़्यादा देशों को दवाएं सप्लाई करता है, अफ्रीका की जेनेरिक दवाओं की आधे से ज़्यादा मांग को पूरी करता है, अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली करीब 40 प्रतिशत जेनेरिक दवाएं और ब्रिटेन की लगभग एक चौथाई दवाएं भारत से आती हैं.
फ़ार्मास्यूटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन नमित जोशी कहते हैं, "भारतीय जेनेरिक वज़न घटाने वाली दवाओं का निर्यात संभावित रूप से बहुत बड़ा है. अकेले अमेरिका का बाज़ार कुछ सालों में 10 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है."
यह भारत के फ़ार्मास्यूटिकल व्यापार में एक बड़ा इज़ाफ़ा होगा. फ़िलहाल भारत 30.46 करोड़ अरब डॉलर की जेनेरिक दवाओं का निर्यात करता है. अमेरिका पहले से ही इसका सबसे बड़ा बाज़ार है.
लेकिन डॉक्टर उत्साह के साथ एहतियात बरतने की सलाह दे रहे हैं.
जीएलपी-1 दवाओं के साइड इफ़ेक्ट
जीएलपी-1 दवाएं असरदार हैं, लेकिन पूरी तरह जोखिम से मुक्त नहीं हैं. इनके साइड इफेक्ट में उल्टी और पाचन से जुड़ी समस्याएं शामिल हो सकती हैं.
कुछ कम मामलों में पित्त की पथरी या पैंक्रियाटाइटिस जैसी जटिलताएं भी हो सकती हैं. बिना पर्याप्त प्रोटीन और व्यायाम के तेज़ी से वज़न घटाने पर मांसपेशियां कमज़ोर हो सकती हैं. डॉक्टरों का कहना है कि कई मरीज इन दवाओं की भूमिका को ठीक से नहीं समझते.
कुछ लोग सोशल मीडिया और सेलिब्रिटी प्रचार से प्रभावित होकर कुछ ही हफ्तों में तेज़ वज़न घटने की उम्मीद करते हैं.
मुंबई के डायबिटोलॉजिस्ट राहुल बक्शी का कहना है कि सफलता सिर्फ दवा पर नहीं, बल्कि "सही मरीज के चयन" पर भी निर्भर करती है.
डॉक्टर सिर्फ बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) पर नहीं, बल्कि डायबिटीज़ या हाई कोलेस्ट्रॉल जैसी संबंधित बीमारियों पर भी ध्यान देते हैं. जीवनशैली भी अहम है. अगर मरीज का खानपान हेल्दी नहीं है, तो सिर्फ़ दवा काफ़ी नहीं हो सकती.
अक्सर मरीज जल्दी समाधान की उम्मीद लेकर आते हैं. बक्शी कहते हैं, "लोग 3 महीने में 10 किलो वज़न घटाने की मांग लेकर आते हैं."
तेज़ी से वज़न घटाने के नुकसान भी हो सकते हैं. बहुत जल्दी वज़न घटने पर चेहरे, गर्दन, बाजुओं और जांघों से चर्बी कम हो सकती है, जिससे व्यक्ति कमज़ोर दिख सकता है.
बक्शी के मुताबिक, "धीरे-धीरे वजन कम करना, दवा की खुराक को धीरे बढ़ाना और प्रोटीन, व्यायाम और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग पर ध्यान देना बेहतर परिणाम के लिए ज़रूरी है."
एक और चुनौती यह है कि दवा बंद करने के बाद वज़न अक्सर फिर बढ़ जाता है. शरीर चर्बी कम होने का विरोध करता है, जिससे भूख तेज़ी से वापस आ सकती है.
बक्शी कहते हैं, "अगर आप दवा बंद करते हैं, तो भूख बहुत तेज़ी से वापस आती है."
क़ीमतें घटने के साथ दुरुपयोग को लेकर भी चिंताएं सामने आ रही हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि कई मामलों में जिम ट्रेनर, ब्यूटी क्लीनिक या डाइटीशियन, जिनके पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है, मरीजों को ज़्यादा खुराक लिख रहे हैं.
ऑनलाइन फ़ार्मेसी भी कभी-कभी सतही परामर्श के बाद ये दवाएं दे देती हैं. ब्यूटी एक्सपर्ट पहले से ही शादी या सामाजिक कार्यक्रमों के लिए तेज़ वजन घटाने वाले "पैकेज" का प्रचार कर रहे हैं.
जैसे-जैसे सस्ती जेनेरिक दवाएं अधिक उपलब्ध होंगी, ऐसे मामलों के बढ़ने की आशंका है.
मुंबई के चेस्ट फिज़िशियन भौमिक कामदार कहते हैं, "सस्ती दवाओं की ज़्यादा उपलब्धता का मतलब दुरुपयोग की संभावना भी ज़्यादा है. उपलब्धता के साथ ज़िम्मेदारी और सख़्त नियमों की ज़रूरत होती है."
यह चेतावनी लकड़वाला की निर्माण गुणवत्ता को लेकर चिंता से भी मेल खाती है.
वे कहते हैं, "ये दवाएं काफ़ी फायदेमंद हैं. हम नहीं चाहते कि ख़राब गुणवत्ता की दवाओं से साइड इफेक्ट हों और इससे खुद इस दवा की छवि खराब हो."
सरकार भी इस बढ़ते प्रचार को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है. पिछले हफ्ते जारी एक सलाह में भारत के दवा नियामक ने फ़ार्मास्यूटिकल कंपनियों को जीएलपी-1 जैसी प्रिस्क्रिप्शन वज़न घटाने वाली दवाओं का सीधे उपभोक्ताओं के बीच प्रचार करने से सावधान किया.
अधिकारियों ने कहा कि ऐसे विज्ञापन जो तेज़ नतीजों का वादा करते हैं या डाइट और व्यायाम की ज़रूरत को कम करके दिखाते हैं. उन्होंने ज़ोर दिया कि इन दवाओं का इस्तेमाल केवल डॉक्टर की निगरानी में ही होना चाहिए.
नियामकों और डॉक्टरों, दोनों के लिए आने वाले महीने यह परखने वाले हो सकते हैं कि क्या भारत किफ़ायत और निगरानी के बीच संतुलन बना सकता है.
बक्शी कहते हैं कि वे वज़न घटाने की दवा लिखने से पहले मरीजों से अपनी जीवनशैली और खानपान सुधारने को कहते हैं.
वे बताते हैं कि इसके बाद भी मरीजों को पहले डाइटीशियन की मदद से हाई-प्रोटीन डाइट पर रखा जाता है.
मौजूदा साक्ष्य बताते हैं कि इन दवाओं को लंबे समय तक लेना पड़ सकता है. लेकिन कई मरीज "इंस्टाग्राम रील्स देखकर तुरंत समाधान" की मांग के साथ आते हैं, जिससे डॉक्टरों पर दबाव बनता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.