'मोदी राज में भारत पर चढ़ा लाखों करोड़ का कर्ज़', कांग्रेस के इस दावे में कितना है दम
अंशुल सिंह
बीबीसी संवाददाता

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कांग्रेस पार्टी ने दावा किया है कि मोदी सरकार ने सिर्फ़ नौ सालों में भारत पर कर्ज़ तीन गुना कर दिया है.
बीजेपी इन दिनों मोदी सरकार के नौ साल पूरे होने का जश्न मना रही है.
इस मौक़े पर बीजेपी ने महासंपर्क अभियान शुरू किया है.
इसके तहत मोदी सरकार के कैबिनेट मंत्री, बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और पार्टी कार्यकर्ता देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सरकार की उपलब्धियों के बारे में जानकारी दे रहे हैं.
पिछले हफ़्ते शनिवार को इसी मुद्दे पर कांग्रेस की तरफ़ से प्रेस कॉन्फ्रेंस की गई थी.
इस दौरान कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने आरोप लगाया कि अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति के लिए मोदी सरकार का 'आर्थिक कुप्रबंधन' ज़िम्मेदार है.
कांग्रेस ने क्या आरोप लगाए हैं?

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सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, ''मोदी सरकार नौ साल का जश्न मना रही है तो ज़रूरी है कि आईना भी दिखाया जाए. नरेंद्र मोदी जी ने वो कीर्तिमान स्थापित किया है, जो इस देश के 14 प्रधानमंत्री उनसे पहले नहीं कर पाए हैं.''
''इस देश के 14 प्रधानमंत्रियों ने कुल मिलाकर मात्र 55 लाख करोड़ रुपए का कर्ज़ा लिया. 67 साल में 14 प्रधानमंत्रियों ने कुल 55 लाख करोड़ रुपए का कर्ज़ा लिया और हर बार रेस में आगे रहने की चाहत वाले नरेंद्र मोदी जी ने पिछले नौ सालों में हिन्दुस्तान का क़र्ज़ा तिगुना कर दिया. 100 लाख करोड़ से ज़्यादा का क़र्ज़ा उन्होंने मात्र नौ साल में ले लिया.''
सुप्रिया का दावा है कि 2014 तक भारत पर 55 लाख करोड़ रुपए का क़र्ज़ था जो अभी 155 लाख करोड़ तक जा पहुँचा है.
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बीजेपी का जवाब

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कांग्रेस के आरोपों पर बीजेपी का कहना है कि कर्ज़ को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के संदर्भ में रखकर देखा जाना चाहिए.
बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने ट्वीट कर लिखा, ''अर्थव्यवस्था की सेहत को राजकोषीय घाटे के संदर्भ में मापा जाता है, जिसे हमेशा जीडीपी के प्रतिशत के रूप में कर्ज़ के तौर पर देखा जाता है. कर्ज़ अपने आप में पर्याप्त संकेतक नहीं हैं, जब तक कि इसे जीडीपी के संदर्भ में न देखा जाए.''
अमित मालवीय लिखते हैं, ''2013-14 से 2022-23 तक भारत की जीडीपी 113.45 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 272 लाख करोड़ रुपए पहुँच गई. यह 139 फ़ीसदी की भारी वृद्धि है. कर्ज़ के बावजूद, मोदी सरकार ने 2014 से अब तक वित्तीय घाटे को कम किया है.''
''हालाँकि, 2020-21 में यह थोड़े समय के लिए बढ़ा था. ऐसा उस वक़्त कोविड-19 के कारण लिए गए वित्तीय फ़ैसलों के कारण हुआ था. अब यह दोबारा नीचे आ गया है और वित्त वर्ष 2023 में सरकार का लक्ष्य इसे (जीडीपी का) 6.4 फ़ीसदी तक रखना है.''
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2014 तक केंद्र सरकार पर कर्ज़

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कर्ज़ को लेकर भारत सरकार ने केंद्रीय बजट की आधिकारिक वेबसाइट पर स्थिति स्पष्ट की है.
आधिकारिक वेबसाइट पर 2014 तक 'भारत सरकार की ऋण स्थिति' को लेकर बजट दस्तावेज़ मौजूद हैं.
दस्तावेज़ के मुताबिक़, 31 मार्च 2014 तक भारत सरकार पर 55.87 लाख करोड़ रुपए की देनदारियां थीं.
इसमें से 54.04 लाख करोड़ रुपए आंतरिक ऋण और 1.82 लाख करोड़ रुपए विदेशी (बाहरी) ऋण थे.

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आंतरिक ऋण के अंतर्गत खुले बाज़ार में जुटाए जाने वाले कर्ज़, रिज़र्व बैंक को जारी विशेष शेयर्स, क्षतिपूर्ति और अन्य बॉन्ड शामिल होते हैं.
विदेशी ऋण वह ऋण होता है, जिसे वाणिज्यिक बैकों, दूसरे देशों की सरकारों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों सहित विदेशी कर्ज़दाताओं से उधार लिया जाता है.
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2023 तक केंद्र सरकार पर कर्ज़
इस साल फरवरी में जारी किए गए बजट में वित्तीय वर्ष 2022-23 के अंत तक क़र्ज़ की धनराशि का अनुमान 152.61 लाख करोड़ रुपए लगाया गया था.
इसमें आंतरिक ऋण लगभग 148 लाख करोड़ रुपए और विदेशी ऋण लगभग पाँच लाख करोड़ रुपए है.
अगर इसमें अतिरिक्त बजटीय संसाधन (ईबीआर) और कैश बैलेंस को शामिल किया जाता है, तो कुल अनुमानित कर्ज़ 155.77 लाख करोड़ रुपए हो जाएगा.
सरकार ईबीआर को बजट में लिखित कामों से अलग ज़रूरतों को पूरा करने के लिए रखती है और कैश बैलेंस अतिरिक्त पैसा होता है, जिसे इमरजेंसी में इस्तेमाल किया जा सके.

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कर्ज़ पर वित्त मंत्री का आधिकारिक बयान

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इस साल संसद के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में सरकार पर क़र्ज़ को लेकर प्रश्न पूछा गया था.
ये प्रश्न भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के सांसद नामा नागेश्वर राव ने लिखित में वित्त मंत्रालय से पूछा था.
इसके बाद 20 मार्च, 2023 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लिखित रूप में सांसद नागेश्वर राव के सवाल का जवाब दिया था.
वित्त मंत्री ने बताया था, "31 मार्च, 2023 तक की स्थिति के अनुसार केंद्र सरकार के ऋण/देनदारियों की कुल राशि लगभग 155.8 लाख करोड़ रुपए (जीडीपी का 57.3 फ़ीसदी) होने का अनुमान है’’
‘’इसमें से वर्तमान विनिमय दर पर विदेशी ऋण 7.03 लाख करोड़ रुपए (जीडीपी का 2.6 फ़ीसदी) अनुमानित है.’’
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क्या मोदी सरकार के दौरान कर्ज़ तेज़ी से बढ़ा है?
सवाल ये उठता है कि क्या कांग्रेस सरकार के दावे के मुताबिक़ मोदी सरकार के दौरान क़र्ज़ में बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है.
बीबीसी ने पिछली पाँच सरकारों की ओर से अपने कार्यकालों के अंतिम वर्ष में जारी बजट के दौरान दिए गए कर्ज़ के आँकड़ों का विश्लेषण किया है.
इसके मुताबिक़ हर पाँच साल में सरकार पर कर्ज़ में लगभग 70 फ़ीसदी की बढ़त देखी गई है.
अर्थशास्त्री अरुण कुमार इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, ‘’सरकार का क़र्ज़ इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी आमदनी कितनी है और ख़र्चे कितने हैं. अगर ख़र्चा आमदनी से ज़्यादा है तो सरकार को उधार या क़र्ज़ लेना पड़ता है. इसका सीधा असर सरकार के राजकोषीय घाटे पर पड़ता है. ‘’
‘’1980 के बाद हमें बजट में राजस्व घाटा हो रहा है. राजस्व घाटे का मतलब है जो आपका वर्तमान ख़र्च है वो आपके राजस्व से ज़्यादा है. इसलिए मौजूदा ख़र्च को चलाने के लिए के लिए क़र्ज़ लेना पड़ रहा है. राजस्व घाटे का मतलब है कि जिसके लिए आप उधार ले रहे हैं उस पर रिटर्न नहीं आएगा. जैसे- सब्सिडी या डिफ़ेंस पर होने वाला ख़र्च. बजट का एक बड़ा हिस्सा इन पर ख़र्च होता है और फिर हमारा क़र्ज़ बढ़ता चला जाता है.’’

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राजकोषीय घाटे की मौजूदा स्थिति
भारत के राजकोषीय घाटे के ट्रेंड और मौजूदा स्थिति को जानने के लिए बीबीसी ने रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया और अलग-अलग सालों के बजट दस्तावेज़ों में मौजूद आंकड़ों का विश्लेषण करने की कोशिश की.
इस साल के बजट में केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2022-23 के लिए राजकोषीय घाटा (संशोधित) जीडीपी का 6.4 फ़ीसद रहने का अनुमान लगाया था, जोकि 17.55 लाख करोड़ रुपए है.
वित्त वर्ष 2003-04 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.5 फ़ीसदी, 2013-14 में जीडीपी का 4.4 फ़ीसद और 2018-19 में 3.4 फ़ीसद था.
कोविड के शुरुआती दौर वित्तीय वर्ष 2020-21 में राजकोषीय घाटे में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली थी.
इस दौरान राजकोषीय घाटा जीडीपी का 9.2 फ़ीसद तक पहुंच गया था.
साल 2019 से लेकर 2023 तक पिछले चार सालों का औसत देखें तो राजकोषीय घाटा जीडीपी के 6.7 फ़ीसद के आस-पास पहुंचता है.

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सरकारें कर्ज़ कहां खर्च करती हैं?
लेकिन सवाल ये है कि सरकारें क़र्ज़ क्यों लेती हैं और क़र्ज़ पर लिया पैसा कहाँ ख़र्च किया जाता है.
इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमने आर्थिक विश्लेषक परंजॉय गुहा ठाकुरता और दक्षिणपंथी आर्थिक विश्लेषक डॉ सुव्रोकमल दत्ता से बात की है.
परंजॉय गुहा ठाकुरता, आर्थिक विश्लेषक

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बढ़े हुए कर्ज़ को आर्थिक विश्लेषक परंजॉय गुहा ठाकुरता सरकार की मज़बूरी बताते हैं.
परंजॉय कहते हैं, ''मोदी सरकार के पास कर्ज़ लेने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है. आप (मोदी सरकार) बाक़ी लोगों को बोलते हैं कि आप फ्रीबीज़ (मुफ्त चीज़ें) देते हैं. लेकिन मोदी सरकार तो ख़ुद ही फ्रीबीज़ देती है. ये पैसा तो कर्ज़ लेने से ही आएगा.''
''आज जो इतना कर्ज़ लिया जा रहा है इसका बोझ सिर्फ़ हमारे और आपके ऊपर नहीं आएगा. भविष्य में इसका बोझ हमारी संतानों पर भी आएगा.''
''अगर अर्थव्यवस्था में उत्पादन नहीं बढ़ेगा, रोज़गार नहीं बढ़ेगा और हमारे देश में अमीर-ग़रीब के बीच असमानता कम नहीं होगी तो आपको क़र्ज़ लेना ही पड़ेगा. दुर्भाग्यपूर्ण है कि ये सरकार कर्ज़ के ऊपर चल रही है.''
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अमीर और अमीर हुए
जीडीपी बढ़ने के सवाल पर परंजॉय गुहा ठाकुरता का कहना है कि जीडीपी के आबंटन का तरीक़ा सही नहीं है.
परंजॉय बताते हैं, ''सरकार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आबंटन के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं देती है. सिर्फ़ जीडीपी के आँकड़े देखने के बाद आपको पूरी कहानी समझ में नहीं आएगी.''
''क्या जीडीपी इसलिए बढ़ी है क्योंकि देश के चंद उद्योगपतियों की संपत्ति की क़ीमत बढ़ी है या फिर ग़रीबी रेखा से नीचे आने वालों की संपत्ति बढ़ी है? इसलिए अर्थव्यवस्था के भीतर अमीर और ग़रीब के बीच असमानता जीडीपी के आँकड़ों से पता नहीं चलेगी. सरकार जीडीपी के बारे में तो बात करती है लेकिन इस विषय पर ख़ामोश रहती है.''
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कर्ज़ का पैसा कहाँ जा रहा है?
बकौल परंजॉय गुहा ठाकुरता सरकार क़र्ज़ का पैसा मुफ़्त की योजनाओं से लेकर नई संसद जैसी चीज़ों पर ख़र्च कर रही है.
वे कहते हैं, ''सरकार कहती है कि हम मुफ़्त गेहूँ-चावल दे रहे हैं, मुफ़्त सिलेंडर दे रहे हैं, किसान सम्मान निधि दे रहे हैं तो इन सब चीज़ों में कर्ज़ की धनराशि ख़र्च की जा रही है. इसके अलावा नई संसद बनाने में भी सरकारी कर्जे़ का इस्तेमाल हो रहा है.''
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डॉ सुव्रोकमल दत्ता, दक्षिणपंथी राजनीतिक और आर्थिक विशेषज्ञ

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'हिट एंड रन' कांग्रेस की आदत
डॉ. सुव्रोकमल दत्ता बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि आरोप लगाकर भागने वाली कांग्रेस की पुरानी आदत है.
डॉ. दत्ता कहते हैं, ''कांग्रेस ने जो आँकड़ा दिया है, उसमें उन्होंने डेटा के सोर्स के बारे में नहीं बताया है. आजकल कांग्रेस कहीं न कहीं 'हिट एंड रन' वाली राजनीति पर उतर आई है. मतलब आरोप लगा दो और फिर आरोप लगाकर भाग जाओ. 2014 के चुनावों के बाद कांग्रेस की ये रणनीति रही है.''
''भारत सरकार या कोई भी अंतरराष्ट्रीय संस्थान ने ऐसा कोई डेटा जारी नहीं किया है जिसमें कर्ज़ को आधिकारिक तौर पर दोगुना या तिगुना बताया गया हो.''
''जहाँ तक बात निर्मला सीतारमण के बयान की है तो उन्होंने कभी भी 2014 से लेकर अब तक के कर्ज़ का कोई आँकड़ा नहीं दिया है. उन्होंने 2023 तक के कुल कर्जे़ को 155 लाख करोड़ बताया है. इसमें कांग्रेस की पुरानी सरकारों का कर्ज़ा भी शामिल है. कांग्रेस ने लगभग साठ सालों तक देश में शासन किया है तो उस समय के कर्ज़े को भी तो जोड़ा जाएगा.''
''मैं कांग्रेस से सवाल पूछता हूँ कि जब कांग्रेस की सरकार थी तब प्रति व्यक्ति कर्ज़ 17 हज़ार रुपए था. इस बात की पुष्टि तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने की है, चाहे वह आईएमएफ़ हो या वर्ल्ड बैंक हो. उस समय हमारे देश में कम से कम 115 से लेकर 120 करोड़ आबादी थी. अब इस कर्ज़े का जवाब कौन देगा?''
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अर्थव्यवस्था के मुक़ाबले कर्ज़ बेहद कम

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डॉ. सुव्रोकमल सरकार पर क़र्ज़ को अर्थव्यवस्था के मुक़ाबले बहुत कम बताते हैं.
डॉ. दत्ता का कहना है, ''आज अगर भारत पर कुल कर्ज़ 155 लाख करोड़ रुपए है, तो इकोनॉमी भी तो 3.35 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की हुई है. आज भारत की इकोनॉमी दुनिया भर में पाँचवें नंबर की अर्थव्यवस्था है और 2028 तक तीसरे नंबर की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी. 3.35 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी के मुक़ाबले कर्ज़ का अनुपात बहुत कम है.''
''आज भारत में रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट और दूसरी चीज़ें बन रही हैं, इसमें पैसा तो लगता ही है. कांग्रेस के साठ साल के राज में 15 या 20 एयरपोर्ट थे, आज मोदी सरकार के राज में छोटे और बड़े मिलाकर 200 एयरपोर्ट बन चुके हैं. रेल नेटवर्क का विद्युतीकरण हुआ है. साथ ही वंदे भारत ट्रेन मोदी सरकार ने शुरू की थी.''
''उदाहरण के तौर पर कांग्रेस के समय प्रतिदिन 11 किमी. के आसपास से सड़क निर्माण हो रहा था. आज सड़क निर्माण की रफ़्तार दोगुनी हो चुकी है. जब इतना विकास होगा तो ख़र्चा भी उसी हिसाब से बढ़ेगा.''
'जीडीपी के बिना सरकारी कर्ज़ का आकलन अधूरा'

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बीजेपी की सरकारी कर्ज़ को जीडीपी के संदर्भ में देखने वाली बात को डॉ. सुव्रोकमल दत्ता सही ठहराते हैं.
उनका कहना है, ''हम जब किसी भी देश के कर्ज़ का आकलन करते हैं तो उसके साथ देश की वर्तमान जीडीपी भी देखी जाती है. बीजेपी ने जो कहा है वो सटीक कहा और उसी तरह से आकलन किया जाता है.''
''आज अगर आप देखते हो तो पिछले दो साल में भारत में रिकॉर्ड स्तर पर विदेशी संस्थागत निवेश (एफ़आईआई) और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) हुआ है. एफ़डीआई के मामले में भारत पिछले एक साल में चीन से भी आगे निकल चुका है. चीन में जितनी भी बड़ी-बड़ी कंपनियों की मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट थीं वो सब अब भारत का रुख़ कर रही हैं.''
''कोरोना काल में सरकार ने लोगों को वैक्सीन के 220 करोड़ टीके लगाए और मुफ़्त राशन बाँटा. लोगों को भले ही ये सब मुफ़्त मिला लेकिन सरकार ने तो इसके लिए भुगतान किया है.
सरकार की नीतियों के आलोचक रहे परंजॉय गुहा ठाकुरता और सरकार की नीतियों का समर्थन करने वाले डॉ सुव्रोकमल दत्ता इस बात पर एक मत नज़र आते हैं कि सरकार की ओर से समाज कल्याण के क्षेत्र में किए जाने वाले ख़र्चों की वजह से सरकार के कर्ज़ पर असर पड़ता है.
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