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पश्चिम बंगाल चुनाव: राहुल की रैली में जिन दो बातों पर भीड़ की प्रतिक्रिया रही अलग-अलग
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पश्चिम बंगाल से
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
पश्चिम बंगाल में हुगली ज़िले के श्रीरामपुर विधानसभा क्षेत्र में शनिवार को कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की चुनावी सभा थी.
श्रीरामपुर में राहुल गांधी के आने की ख़बर से ज़्यादातर लोग नावाक़िफ़ थे. कांग्रेस के झंडे, पोस्टर, बैनर भी टीएमसी और बीजेपी की तुलना में न के बराबर हैं. ऐसा तब है, जब यहाँ से पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष सुभांकर सरकार उम्मीदवार हैं.
श्रीरामपुर सीट पर कांग्रेस आख़िरी बार 1996 में जीती थी. 1996 के बाद से इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस का क़ब्ज़ा है. हालांकि 2001 और 2011 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी और कांग्रेस में गठबंधन था और यह सीट टीएमसी के हिस्से में आई थी.
सुभांकर सरकार से हमने पूछा कि राहुल गांधी के आने का अहसास शहर में इतना कमज़ोर क्यों हैं? उन्होंने जवाब में कहा, ''हम पश्चिम बंगाल में क़रीब 49 सालों से सत्ता से बाहर हैं. आप हमारी रैलियों की तुलना टीएमसी और बीजेपी से करेंगे तो आपको सब कुछ स्लो लग सकता है.''
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राहुल की रैली शहर के बाहर एक स्कूल के मैदान में थी. तीखी धूप और उमस भरी प्रचंड गर्मी में लोग स्कूल के मैदान में छाँव तलाशते दिखे.
मंच को धूप से बचाने के लिए ऊपर से ढँक दिया गया था लेकिन बाक़ी मैदान धूप के हवाले था. मंच पर एसी भी लगे थे.
आम लोग राहुल के आने तक धूप से बचने के लिए जगह-जगह पेड़, कुर्सी और दीवार की ओट लेते हुए दिखे.
रैली में आए क्या लोग
रैली का समय पहले डेढ़ बजे बताया गया, फिर तीन बजे लेकिन राहुल आए शाम में चार बजे के बाद.
राहुल ने क़रीब 17 मिनट का भाषण दिया. राहुल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर काफ़ी तीखे हमले किए. ममता बनर्जी को भी आड़े हाथों लिया लेकिन प्रधानमंत्री पर ज़्यादा आक्रामक थे.
लेकिन सबसे दिलचस्प यह था कि राहुल जब ममता पर तीखा हमला करते थे तो लोग जोश में आ जाते थे और तालियां बजाकर स्वागत करते थे.
जब राहुल नरेंद्र मोदी पर हमला करते थे लोगों की प्रतिक्रिया बहुत गर्मजोशी भरी नहीं होती थी.
कोलकाता की जादवपुर यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर अब्दुल मतीन कहते हैं कि ये चुनाव विधानसभा का है और लोगों का आक्रोश ममता बनर्जी से है.
प्रोफ़ेसर मतीन कहते हैं, ''ममता बनर्जी पर राहुल गांधी के तीखे हमले का स्वागत लोग इसलिए कर रहे हैं कि यहां सरकार नाम की कोई चीज़ नहीं है. हर सरकारी काम कराने के लिए रिश्वत देनी पड़ रही है. टीएमसी के स्थानीय नेताओं की मनमानी बढ़ी है."
उन्होंने कहा, "मैंने टीएमसी के छोटे नेताओं को चंद सालों में अमीर बनते देखा है. यूनिवर्सिटी, कॉलेज और स्कूल ध्वस्त हो चुके हैं. बेरोज़गारी चरम पर है. ममता धर्म की भी राजनीति कर रही हैं. इमामों को भत्ता देकर ममता ने समाज को ध्रुवीकृत किया. इसके बाद मंदिर की राजनीति करने लगीं.''
रैली में आए लोगों में मुस्लिम महिलाएं और पुरुषों की अच्छी ख़ासी संख्या थी. 60 साल के हाजी कुदुस मलिक भी राहुल को सुनने आए हैं.
कुदुस मलिक कहते हैं कि 'पश्चिम बंगाल में लूटमार की सरकार है और इसे अब जाना चाहिए.'
वह कहते हैं, ''ममता मुसलमानों को बीजेपी का डर दिखाकर वोट लेती रही हैं लेकिन अब ये झूठ नहीं चलेगा. राहुल गांधी पूरे देश में बीजेपी को चुनौती दे रहे हैं. ममता बनर्जी ने तो बंगाल में सीपीएम और कांग्रेस को इसीलिए ख़त्म किया ताकि बीजेपी को मज़बूत किया जा सके. राहुल गांधी को हम 2029 में प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं.''
राहुल गांधी पर तृणमूल कांग्रेस का तंज़
तृणमूल कांग्रेस ने राहुल गांधी की टिप्पणियों को 'गैर ज़िम्मेदाराना' बताया है.
पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. शशि पांजा ने बयान जारी कर कहा है, "चुनाव के दौरान भी तृणमूल नेताओं को ईडी और सीबीआई के समन भेजे जा रहे हैं, जबकि वे अपने कुत्ते के साथ खेलने और बिस्कुट खिलाने में व्यस्त हैं."
बयान के अनुसार, "बंगाल की जनता और बाद में भारत की जनता को यह तय करने दें कि बीजेपी को हराने में वास्तव में कौन सक्षम है. अगर कांग्रेस ने ईमानदारी से चुनाव लड़ा होता, तो लोकसभा चुनावों में करारी हार झेलने वाली बीजेपी महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार जैसे राज्यों में जीत हासिल नहीं कर पाती."
बीजेपी से कौन लड़ रहा है?
राहुल गांधी ने भी रैली में लोगों से कहा, ''केवल कांग्रेस पार्टी बीजेपी से लड़ती है. मैं बेल पर हूँ. मेरा घर छीन लिया. लोकसभा की सांसदी छीन ली. मेरे ऊपर 36 मुक़दमे हैं. हर 10 से 15 दिन में कहीं न कहीं मुक़दमा लड़ने जाना पड़ता है. मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि ममता जी के ख़िलाफ़ नरेंद्र मोदी ने कितने मुक़दमे कराए हैं?''
22 साल के सुहैल भी अपने दोस्तों के साथ राहुल को सुनने आए हैं. सुहैल इस चुनाव में कांग्रेस और राहुल गांधी को कैसे देख रहे हैं?
इस सवाल के जवाब में वह कहते हैं, ''कांग्रेस बहुत अच्छी पार्टी है. राहुल गांधी भी बहुत अच्छे नेता हैं. लेकिन बंगाल में ममता दीदी का रहना ज़रूरी है. ममता के कारण ही हमलोग सुकून से हैं. अगर बीजेपी आएगी तो यहाँ का माहौल ठीक नहीं रहेगा. ममता दीदी ने सब कुछ कंट्रोल करके रखा है. टीएमसी अगर हारेगी तो बीजेपी सत्ता में आ जाएगी क्योंकि कांग्रेस और सीपीएम अभी बीजेपी को हराने की हालत में नहीं हैं.''
सुहैल की इन बातों पर उनके बाक़ी के दोस्तों एक स्वर में सहमति जताई. बंगाल के लोग कांग्रेस को टीएमसी के विकल्प के रूप में क्यों नहीं देख रहे हैं?
इसके जवाब में पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष सुभांकर सरकार कहते हैं, ''टीएमसी और बीजेपी ने बाइनरी की पॉलिटिक्स बनाई है. यानी दोनों अपनी राजनीति साधते रहें और एक धारणा बन जाए कि यही दोनों एक दूसरे को हरा सकते हैं."
"टीएमसी ने एक धारणा बनाई कि अगर वो हार गई तो बीजेपी आ जाएगी और बीजेपी ने धारणा बनाई है कि वो कमज़ोर पड़ी तो यहाँ के हिन्दू ख़तरे में पड़ जाएंगे. हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इस बाइनरी की पॉलिटिक्स को तोड़ें.''
सुभांकर सरकार कहते हैं कि ममता बनर्जी ने कांग्रेस तोड़ी और पार्टी ने फिर उन्हीं से गठबंधन कर लिया. सुभांकर सरकार इसे कांग्रेस की बड़ी ग़लती मानते हैं.
वह कहते हैं, ''टीएमसी से गठबंधन के कारण कांग्रेस 2011 में पश्चिम बंगाल की 294 में से केवल 57 सीटों पर चुनाव लड़ी. ये हमारी बड़ी ग़लती थी.''
ममता का कांग्रेस से अलग होना
60 साल की माला घोषाल कांग्रेस का झंडा लिए धूप में बैठी हैं. माला से हमने पूछा कि इस बार के बंगाल चुनाव में क्या होने जा रहा है?
वह कहती हैं, ''अच्छी बात है कि कांग्रेस इस बार अकेले चुनाव लड़ रही है. कांग्रेस सरकार तो नहीं बना पाएगी लेकिन पिछली बार की तरह नहीं होगा. पिछली बार कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा. राहुल गांधी ईमानदार, सेक्युलर और संवेनशील नेता हैं. ऐसे नेताओं को धूर्त राजनीति में क़ीमत चुकानी होती है.''
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस देश की आज़ादी के बाद से 1977 तक सत्ता में रही. विधान चंद्र रॉय के नेतृत्व में कांग्रेस ने बंगाल में आधुनिकीकरण के कई काम किए.
खाद्य उत्पादन में भी बंगाल में कांग्रेस के शासन में वृद्धि हुई थी. लेकिन शरणार्थी संकट और नक्सलवादी आंदोलन के कारण कांग्रेस में दरारें बढ़ने लगी थीं.
प्रियरंजन दासमुंशी और सोमेन मित्रा जैसे नेताओं ने वाम मोर्चा के ख़िलाफ़ यूथ कांग्रेस को मज़बूत करने की ठोस कोशिश भी की. लेकिन इमर्जेंसी के दौरान वामदलों को निर्णायक बढ़त मिली.
कांग्रेस ने 1982 में 49 प्रतिशत वोट के साथ थोड़ी वापसी की लेकिन आंतरिक मतभेदों और कमज़ोर गठबंधनों ने उसकी ताक़त को कमज़ोर कर दिया.
असल मोड़ 1998 में आया. यूथ कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने पार्टी के वामदलों के प्रति कथित नरम रुख़ के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी.
सीताराम केसरी के नेतृत्व वाली कांग्रेस शुरुआती यूपीए दौर में वामपंथ-समर्थक गठबंधनों की ओर झुकाव रखती थी.
1992 में सोमन मित्रा ने पश्चिम बंगाल प्रदेश अध्यक्ष का पद बहुत कम अंतर से जीता था लेकिन ममता का उभार जल्द ही उन पर भारी पड़ गया. हालांकि मित्रा को केसरी और प्रणब मुखर्जी का समर्थन हासिल था.
टीएमसी का विकल्प कौन?
जनवरी 1997 में 'पार्टी-विरोधी' टिप्पणियों के कारण ममता को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया.
पिछले साल पश्चिम बंगाल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने हिन्दु्स्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ममता अपने निष्कासन से बहुत दुखी थीं और कांग्रेस उनके निष्कासन से आज तक उबर नहीं पाई.
1998 में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की जो वाम दलों और कांग्रेस दोनों के ख़िलाफ़ खड़ी हुई. इसका असर तुरंत दिखा.
कांग्रेस 1996 में 82 सीटों से घटकर 2001 में सिर्फ़ 26 सीटों पर आ गई.
प्रोफ़ेसर मतीन कहते हैं, ''ममता ने बंगाल में कांग्रेस को सीपीआई (एम) के सामने कमज़ोर माना. ममता चाहती थीं कि 1970 के दशक में कांग्रेसी नेताओं की हत्याएं और बूथ कैप्चरिंग के ख़िलाफ़ आक्रामकता से लड़ा जाए. ममता 1984 से ही उनसे लड़ती रही थीं. उन्होंने 29 साल की उम्र में सबसे युवा सांसद बनते हुए दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को हराया था.''
कांग्रेस छोड़ने के बाद ममता और आक्रामक हो गईं. जिस ममता बनर्जी को कांग्रेस ने पार्टी से निकाला उसी की तृणमूल कांग्रेस के साथ 2001 में गठबंधन किया और 26 सीटें जीतीं.
2011 में कांग्रेस ने जूनियर पार्टनर के रूप में ममता की लहर का सहारा लिया और 42 सीटें जीतीं. यह साझेदारी फिर टूटी, जिससे 2016 में कांग्रेस ने वाम दलों के साथ गठबंधन किया और 44 सीटें जीतीं.
लेकिन 2021 तक उसका सफाया हो गया. जो कभी वाम-विरोधी ताक़त थी, वही कांग्रेस अब विभाजन, दलबदल और घटती प्रासंगिकता से जूझ रही है.
2021 के चुनाव में कांग्रेस, सीपीआईएम और आईएसएफ़ में गठबंधन था लेकिन सीट केवल आईएसएफ़ को एक मिली. ऐसा पहली बार हुआ कि वाम दल और कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली.
1947 से लेकर 1990 के दशक तक, पश्चिम बंगाल की राजनीति मुख्यतः वाम और कांग्रेस के बीच संघर्ष का मैदान रही. लेकिन 2010 के दशक ने समीकरण बदल दिए.
ममता बनर्जी के नेतृत्व में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेसका उदय, वाम की संगठनात्मक कमज़ोरी और कांग्रेस की आंतरिक कलह ने एक नई चुनावी सोच को जन्म दिया. सवाल उठने लगा कि क्या वाम और कांग्रेस मिलकर टीएमसी का मुक़ाबला कर सकते हैं?
पश्चिम बंगाल में बीजेपी के उभार का कारण इसी सवाल के जवाब में है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.