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33% महिला आरक्षण और लोकसभा की सीटें 850 करने का प्रस्ताव- क्यों उठ रहे सवाल?
- Author, शुभांगी मिश्रा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
केंद्र सरकार ने मंगलवार को सांसदों को जो तीन ड्राफ़्ट बिल (मसौदा विधेयक) भेजे हैं उनमें दो बड़े ऐतिहासिक बदलाव प्रस्तावित हैं- पहला, लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करना और दूसरा, संसद के निचले सदन यानी लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना.
इन विधेयकों को 16 से 18 अप्रैल को बुलाए गए संसद के विशेष सत्र में पेश किया जाएगा.
ये तीन विधेयक हैं-
- केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक 2026
- संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026
- परिसीमन विधेयक 2026 (डीलिमिटेशन बिल 2026)
ये 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर आधारित हैं, जिसमें महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसके लागू होने को भविष्य में होने वाली जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया था.
इसी वजह से, 2023 का ये क़ानून संसद में लगभग सर्वसम्मति से पारित होने के बावजूद कई लोगों ने चिंता जताई थी कि इस आरक्षण को लागू होने में एक दशक से भी अधिक समय लग सकता है.
अगर ये तीनों विधेयक पारित हो जाते हैं, तो 2029 के अगले आम चुनाव में इस आरक्षण का रास्ता साफ़ हो सकता है.
हालांकि, मंगलवार को विपक्षी नेताओं ने इन तीनों विधेयकों की आलोचना की है.
विपक्षी दलों ने इसे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों से कुछ दिन पहले महिला मतदाताओं को लुभाने की कोशिश बताया और इसे तुष्टिकरण की राजनीति बताया.
सबसे तीखी आलोचना लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने के प्रस्ताव को लेकर हो रही है.
कई विपक्षी नेताओं ने चिंता जताई कि सीटों के पुनर्निर्धारण का जो आधार है वो दक्षिणी राज्यों के लोकसभा में प्रतिनिधित्व को कम कर सकता है.
आइए इन तीनों विधेयकों के प्रस्तावों और उनसे जुड़े विवादों को समझते हैं.
1. लोकसभा सीटों की संख्या 850
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 में प्रस्ताव है कि लोकसभा में अधिकतम 850 सीटें होंगी- 815 राज्यों से और 35 केंद्र शासित प्रदेशों से. फ़िलहाल लोकसभा में 543 सीटें हैं और संविधान में इनकी अधिकतम संख्या 550 तय की गई है.
विधेयक में संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन का भी प्रस्ताव है, ताकि 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या पर लगी रोक को हटाया जा सके.
अनुच्छेद 81 के इन्हीं प्रावधानों की वजह से 1976 से ही लोकसभा की सीटों की संख्या में इज़ाफ़ा नहीं हुआ है.
तो अगर मौजूदा लोकसभा का आधार 1971 की जनगणना थी, तो लोकसभा की सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव किस आधार पर दिया जा रहा है?
इस सवाल का जवाब डीलिमिटेशन बिल (परिसीमन विधेयक 2026) में है, जिसे भी विशेष सत्र में पेश किया जाएगा.
इस विधेयक के उद्देश्यों के बारे में कहा गया है परिसीमन (डीलिमिटेशन) की प्रक्रिया 'ताज़ा प्रकाशित जनगणना' के आधार पर होगी. आख़िरी जनगणना 2011 में हुई थी. यानी इस विधेयक का आधार होगी 2011 में हुई जनगणना.
और यही वह बिंदु है जिस पर दक्षिणी राज्यों को अपने प्रतिनिधित्व में कमी होने की चिंता है.
अब तक हर राज्य को मिलने वाली संसदीय सीटों की संख्या इस आधार पर तय होती रही है कि किसी राज्य की आबादी और उसकी निर्वाचन सीटों का अनुपात सभी राज्यों में लगभग बराबर रहे.
यानी पूरे भारत में हर एक सीट लगभग बराबर आबादी का प्रतिनिधित्व करेगी.
2. दक्षिण भारतीय राज्यों की आपत्ति
दशकों तक भारत में जनसंख्या वृद्धि असमान रही है, जिसमें दक्षिणी राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है. अध्ययनों से पता चलता है कि अगर मौजूदा परिस्थितियों में आबादी के अनुपात में सीटें तय करने का यही मानदंड लागू किया गया, तो दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कमज़ोर हो जाएगा.
राजनीतिक टिप्पणीकार अदिति फडणिस ने बीबीसी से कहा, "दक्षिणी राज्यों ने, जिन्हें आम तौर पर प्रगतिशील माना जाता है, परिवार नियोजन की नीति को बेहतर रूप से अपनाया है और छोटे परिवारों को बढ़ावा देने की कोशिश की है. दक्षिणी राज्यों को लग रहा है कि जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण की उनकी यह कोशिश उन्हें नुकसान की स्थिति में डाल देगी."
दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि परिवार नियोजन पर बेहतर काम करने का उन्हें इनाम मिलने के बजाय नुकसान झेलना पड़ेगा और सीटों को तय करने का आधार जनसंख्या ही होगा तो ज़्यादा जनसंख्या वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार में सीटें दक्षिणी राज्यों की तुलना में कहीं ज़्यादा बढ़ जाएंगी और संसद में इन राज्यों से जुड़े मुद्दों को वरीयता दी जाने लगेगी.
सरकार बार-बार यह आश्वासन देती रही है कि संसद की मौजूदा संरचना में राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी, लेकिन चुनाव विश्लेषक और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने मंगलवार को एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा कि इसे सुनिश्चित करने के लिए इन तीनों विधेयकों में कुछ भी नहीं है.
मंगलवार को दक्षिणी राज्यों के नेताओं ने भी अपनी चिंता जताई.
एक वीडियो संदेश में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा कि राज्य सरकारों से परामर्श किए बिना परिसीमन को आगे बढ़ाने की कोशिश "लोकतंत्र पर हमला" है.
उन्होंने कहा, "जब केंद्र सरकार ने हमसे जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण, छोटे परिवार रखने और परिवार नियोजन के उपाय अपनाने को कहा, तो हमने (तमिलनाडु ने) उसका पालन किया. क्या अब अनुशासित तरीके से काम करने की यही सज़ा है?"
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने आंध्र प्रदेश के अपने समकक्ष और बीजेपी के सहयोगी चंद्रबाबू नायडू को पत्र लिखकर उनसे अपील की है कि वो दक्षिणी राज्यों के साथ मिलकर सीटें बढ़ाने के 'प्रो-राटा मॉडल' का विरोध करें.
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच प्रस्तावित 850 सीटों के पुनर्गठन का सटीक ढांचा अभी साफ़ नहीं है.
विधेयक में कहा गया है कि इसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाला परिसीमन आयोग अंतिम रूप देगा, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य चुनाव आयुक्त सदस्य होंगे.
गौरतलब है कि विधेयक में यह भी प्रस्ताव है कि भविष्य में किस जनगणना को परिसीमन का आधार बनाया जाएगा, यह संसद साधारण बहुमत से तय कर सकेगी. फिलहाल इसके लिए संविधान संशोधन की ज़रूरत होती है- यानी संसद में दो-तिहाई बहुमत.
3. महिला आरक्षण-33%
महिला संगठनों और महिला सांसदों ने दशकों से महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग उठाई है. फिलहाल लोकसभा में 78 महिला सांसद (कुल सीटों का 14%) और राज्यसभा में 42 महिला सांसद (कुल सीटों का 18%) है.
सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की एक प्रेस रिलीज़ मुताबिक़, दुनिया भर में महिला सांसदों का प्रतिनिधित्व औसतन 27.2% है. यानी भारत में महिलाओं का संसद में प्रतिनिधित्व दुनिया की तुलना में काफ़ी कम है.
2023 में भारत ने एक कानून पारित किया था, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित किया गया, लेकिन इसे जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होना था.
प्रस्तावित संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 में कहा गया है कि इससे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं की "प्रभावी और समर्पित भागीदारी में देरी होगी".
आगे इसमें प्रस्ताव है कि सीटों के परिसीमन में यह आरक्षण "ताज़ा प्रकाशित जनगणना के आंकड़ों" के आधार पर लागू किया जाए-यानी फिर से 2011 की जनगणना.
महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का रोटेशन हर डीलिमिटेशन साइकिल (परिसीमन चक्र) के बाद होगा. यह आरक्षण 15 साल की अवधि के लिए वैध रहेगा, जिसे संसद आगे बढ़ा सकती है.
हालांकि इस प्रावधान के इस अंतिम उद्देश्य पर ज़्यादातर पार्टियों में सहमति दिखती है लेकिन विपक्षी नेताओं ने इसे राज्य चुनावों के बीच लाने के समय पर सवाल उठाए हैं.
पश्चिम बंगाल से राज्यसभा सांसद साकेत गोखले, ने लिखा, "सरकार महिलाओं को बहाना बनाकर परिसीमन के अपने असली एजेंडे को आगे बढ़ा रही है." उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी की 39% सांसद महिलाएं हैं.
उन्होंने लिखा, "जब 2023 में यह बिल पारित हुआ था, तब विपक्षी दलों ने आरक्षण को तुरंत लागू करने की मांग की थी, लेकिन हमारी मांगों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया. इस अचानक सामने आए परिसीमन के विचार को देश के सामने स्वीकार्य बनाना असंभव होगा, क्योंकि इसका कोई आधार नहीं है."
मंगलवार को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने भी इसी तरह की बात कही.
उन्होंने कहा, "2023 में जब यह बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) पारित हुआ था, तब महिला संगठनों ने सरकार से पूछा था कि इसे लागू करने में देरी क्यों की जा रही है और इसे जनगणना और परिसीमन से क्यों जोड़ा गया है. लेकिन उस क़ानून में प्रावधान था कि जनगणना या परिसीमन के बिना महिला आरक्षण नहीं होगा. कुछ ही महीनों में सरकार ने यू-टर्न ले लिया है और अब वह कह रही है कि वह इसे जनगणना और परिसीमन से अलग करना चाहती है. पारदर्शिता की मांग का मतलब यह नहीं है कि हम संसद में महिला आरक्षण के खिलाफ हैं."
राजनीतिक विश्लेषक राहुल वर्मा ने कहा कि बीजेपी इस क़दम से राज्य चुनावों में फ़ायदा लेने की कोशिश कर सकती है.
वर्मा ने कहा, "इस (बिल) से उन्हें थोड़ा फ़ायदा मिलेगा. अगर इस क़दम से मामूली फ़र्क भी पड़ता है, मान लीजिए इससे महिलाओं के 10 प्रतिशत वोट का झुकाव होता है, तो यह बड़ा फ़ायदा है. जब चुनाव 3–4 प्रतिशत के अंतर से जीते जाते हैं, और आप 1–2 प्रतिशत अतिरिक्त वोट ले आते हैं, तो यह गेम, सेट, मैच हो जाता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.