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अमेरिका-ईरान युद्धविराम को इसराइल का समर्थन, पर नेतन्याहू के लक्ष्य अधूरे
- Author, डेनियल डी सिमोन
- ........से, यरूशलम
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
फरवरी के आख़िर में इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ईरान के ख़िलाफ़ इसराइल-अमेरिका के सैन्य अभियान की शुरुआत का एलान किया था, तो उनका रवैया काफी आक्रामक था.
लेकिन युद्धविराम को स्वीकार करते हुए उनके ऑफ़िस ने जो बयान जारी किया, उसका लहज़ा काफ़ी नरम था. इससे साफ़ हो गया कि युद्धविराम का फ़ैसला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लिया था.
अमेरिका और ईरान ने अपने बयानों में जीत के जो दावे किए उनमें एक तरह का विरोधाभास था.
दोनों ने ही पांच हफ्ते तक चली लड़ाई के बाद बड़ी जीत का दावा किया.
बुधवार रात प्रसारित बयान में नेतन्याहू ने इस ऑपरेशन को सफल बताया, लेकिन कहा कि युद्धविराम अंत नहीं है और इसराइल के पास अभी और लक्ष्य हैं, जिन्हें समझौते से या फिर लड़ाई दोबारा शुरू करके हासिल किया जाएगा.
'राजनीतिक तौर पर नाकाम रहे नेतन्याहू'
युद्ध की शुरुआत में नेतन्याहू ने कहा था, "इस ऑपरेशन का मकसद ईरान में आयतुल्लाह शासन से पैदा ख़तरे को ख़त्म करना है और यह ऑपरेशन तब तक जारी रहेगा, जब तक इसकी ज़रूरत होगी."
लेकिन ये मकसद पूरे नहीं हो पाए हैं. ईरान की सेना अभी भी लड़ रही है और वहां पहले वाली ही सत्ता कायम है. हालांकि ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई और दूसरे बड़े नेता अमेरिका और इसराइल के हमलों में मारे जा चुके हैं.
ईरान के परमाणु कार्यक्रम और संवर्द्धित (एनरिच्ड) यूरेनियम के भंडार की स्थिति भी अभी तक अनसुलझी ही है. भले ही ईरान के बैलिस्टिक मिसाइलों का जख़ीरा घटा हो, फिर भी उसने पूरे युद्ध के दौरान इसराइल की ओर लगातार मिसाइलों की बौछारें जारी रखीं.
ट्रंप के समझौते की घोषणा किए जाने के बाद भी बुधवार रात को यरूशलम में मिसाइल अलर्ट जारी हुए और धमाकों की आवाज़ें सुनाई दीं. इसराइल डिफ़ेंस फोर्सेज़ (आईडीएफ़) ने बताया कि ईरान की ओर से कई मिसाइलें दागी गई थीं.
ऐसा लगता है कि नेतन्याहू ने ईरान की सेनाओं को हराने और वहां की सत्ता में बदलाव लाने की इसराइल और अमेरिका की क्षमता का कुछ ज़्यादा आंक लिया था.
इसराइल के जाने-माने पत्रकार और नेतन्याहू की बायोग्राफी लिखने वाले एंशेल फेफर ने कहा, "प्रधानमंत्री ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत से पहले, सिर्फ लड़ाई 'रोकने' की बात कही, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार नहीं किया था कि युद्ध ख़त्म हो गया है."
उन्होंने कहा, "नेतन्याहू का अपने तय लक्ष्यों को हासिल न कर पाना उनके लिए 'अच्छा नहीं' था. एक और समस्या यह हो सकती है कि अगर इसराइल की ज़्यादा राय लिए बिना ही युद्धविराम पर सहमति बन जाती है, तो अमेरिका के साथ किसी तरह की दरार पैदा हो सकती है."
अभी तक नेतन्याहू और ट्रंप के बीच एकता देखने को मिल रही है. लेकिन हो सकता है कि अब उनके लक्ष्य पूरी तरह से न मिलते हों.
अगर युद्ध की पूरी समाप्ति 'ईरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव' पर आधारित होती है, जिसका ज़िक़्र ट्रंप ने किया है, तो इसे ईरान के लिए एक रणनीतिक सफलता के तौर पर देखा जाएगा. इसकी वजह यह है कि इस प्रस्ताव में वहां के नेतृत्व की मांगों की एक सूची शामिल है.
इसराइल के विपक्ष के नेता येर लापिड ने कहा, "हमारे पूरे इतिहास में ऐसी राजनीतिक आपदा पहले कभी नहीं आई, जब हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के मूल से जुड़े फैसले लिए जा रहे थे, तब इसराइल चर्चा में शामिल नहीं था."
उन्होंने कहा, "सेना ने वह सब कुछ किया जो उससे करने को कहा गया था. जनता ने ज़बरदस्त हिम्मत दिखाई. लेकिन नेतन्याहू राजनीतिक तौर पर नाकाम रहे. रणनीतिक तौर पर नाकाम रहे. और उन्होंने ख़ुद जो लक्ष्य तय किए थे, उनमें से एक भी पूरा नहीं कर पाए."
इसराइल में इस साल चुनाव होने हैं. जिसका मतलब है कि नेतन्याहू कुछ ही महीनों में सत्ता गवां सकते हैं.
अमेरिका में स्थित आरएएनडी कॉरपोरेशन में इसराइल नीति प्रमुख शिरा एफ़्रॉन ने कहा कि नेतन्याहू ने "इसराइलियों से वादा किया था कि यह अभियान इस्लामी शासन का अंत कर देगा, कि 'सांप का सिर कुचल देने' से यह युद्ध इसराइल के अस्तित्व पर मौजूद ख़तरे को ख़त्म कर देगा."
"लेकिन वह सांप कई सिरों वाला हाइड्रा बन गया."
वह कहती हैं कि इसराइली जनता के लिए युद्ध को पचाना 'काफ़ी कठिन' हो रहा है, क्योंकि ईरान में कोई शासन परिवर्तन नहीं हुआ, ईरान के पास अब भी समृद्ध (एनरिच्ड) यूरेनियम मौजूद है, और ईरानी मिसाइलों का ख़तरा बना हुआ है.
"मिसाइल कार्यक्रम अब भी मौजूद है, और भले ही ईरान की 70 या 80 फ़ीसदी क्षमताएं नष्ट कर दी गई हों लेकिन पिछले पांच हफ्ते से (मिसाइलों से) बचने के लिए शरण लेने वाले इसराइलियों की स्थिति में कोई साफ़ फर्क़ नज़र नहीं आया है."
वहीं, इसराइली सैन्य खुफ़िया विभाग में काम कर चुके और अब यरूशलम इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटेजी एंड सिक्योरिटी (जेआईएसएस) के निदेशक योसी कुपरवासर कहते हैं कि इसराइलियों को "व्यावहारिक और हासिल किए जा सकने वाले लक्ष्यों" और "उन सभी ख़्वाहिशी लक्ष्यों, जिन्हें हम सभी होते देखना चाहते थे, लेकिन जिनकी गारंटी नहीं दे सकते," के बीच फ़र्क़ समझना चाहिए.
उनका कहना था कि "हासिल किए जा सकने वाले लक्ष्य पूरी तरह पूरे हो चुके हैं," क्योंकि ईरान की परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल उत्पादन सुविधाओं को निशाना बनाया गया और उसकी सैन्य क्षमताओं व नेतृत्व को "काफ़ी हद तक नष्ट कर दिया गया."
उन्होंने कहा कि जो 'ख़्वाहिशी लक्ष्य' पूरे नहीं हो पाए, उनमें जनता के विद्रोह के ज़रिए ईरान में शासन परिवर्तन कराना, सैन्य बल के ज़रिए ईरान से अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम हटाना, और ईरान की मिसाइल दागने की क्षमता को पूरी तरह ख़त्म करना शामिल है.
यह भी संभव है कि नेतन्याहू की गठबंधन सरकार में शामिल सुदूर दक्षिणपंथी सदस्य किसी भी युद्धविराम समझौते या युद्ध के अंत को मंज़ूर न करें, जिससे उनके लिए राजनीतिक चुनौती खड़ी हो जाए.
लेबनान से युद्धविराम पर ख़तरा
इसके अलावा, इस बात को लेकर भी तीखा विवाद सामने आया है कि क्या युद्धविराम समझौते में लेबनान शामिल है या नहीं, जिससे पूरा युद्धविराम ख़तरे में पड़ गया है.
ईरान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़, जिन्होंने युद्धविराम कराने में मदद की, दोनों ने कहा कि इस समझौते में लेबनान भी शामिल है, जहां इसराइल ईरान-समर्थित हथियारबंद संगठन हिज़बुल्लाह से लड़ रहा है.
लेकिन नेतन्याहू के कार्यालय ने कहा कि युद्धविराम में 'लेबनान शामिल नहीं है' और इसराइली डिफ़ेंस फ़ोर्स (आईडीएफ़) ने बुधवार को लेबनान में मार्च में संघर्ष शुरू होने के बाद से उनके शब्दों में 'सबसे बड़े हमले' किए.
लेबनान सरकार ने कहा है कि इन हमलों में राजधानी बेरूत समेत, देश भर में कम से कम 182 लोगों की मौत हो चुकी है और 890 लोग घायल हुए हैं.
इसके बाद ट्रंप ने पीबीएस के एक पत्रकार से बातचीत में भी कहा कि लेबनान, 'हिज़्बुल्लाह की वजह से', युद्धविराम समझौते का हिस्सा नहीं है. जब उनसे इसराइली हमलों को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने जवाब दिया, "यह समझौते का ही हिस्सा है- सबको यह पता है. यह एक अलग झड़प है."
बुधवार देर दोपहर हुई एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि लेबनान युद्धविराम का हिस्सा नहीं है, लेकिन अमेरिका, इसराइल और अन्य सभी पक्षों के बीच लेबनान को लेकर बातचीत 'जारी रहेगी'.
ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने अमेरिका और इसराइल को 'कड़ी चेतावनी' जारी करते हुए कहा है कि अगर इसराइल ने 'प्रिय लेबनान के ख़िलाफ़ आक्रामक कार्रवाई' तुरंत बंद नहीं की, तो वे जवाब देंगे.
हाल के हफ़्तों में इसराइल ने दक्षिणी लेबनान में ज़मीनी सेनाएं भेजी हैं और कहा है कि वह लितानी नदी के दक्षिण वाले इलाक़े पर अपना नियंत्रण बनाए रखेगा- उसके शब्दों में, ताकि वहां एक 'सुरक्षा बफ़र ज़ोन' बनाया जा सके.
इसराइली सेनाएं उस इलाके में घरों और गांवों को नष्ट कर रही हैं, जहां आईडीएफ़ के अनुसार हिज़बुल्लाह के लड़ाके सक्रिय हैं. इसकी वजह से लाखों लोग अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं. इसराइल ने कहा है कि जब तक हिज़बुल्लाह को हटाया नहीं जाता, तब तक लोगों को वापस लौटने की इजाज़त नहीं दी जाएगी.
संघर्ष के तीसरे दिन, ख़ामेनेई की हत्या के बदले में हिज़बुल्लाह ने इसराइल पर रॉकेट दागे थे और पिछले कुछ हफ्तों से वह ऐसा लगातार करता आ रहा है.
लेबनान सरकार के साथ साथ ब्रिटेन, फ़्रांस, इटली, जर्मनी और कनाडा जैसे कई देशों ने भी मांग की है कि युद्धविराम लेबनान पर भी लागू होना चाहिए.
लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ़ औन ने कहा है कि इसराइल ने बार-बार 'सभी अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और मानदंडों' का तिरस्कार किया है.
अब यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नेतन्याहू क्या प्रतिक्रिया देते हैं और ट्रंप उनका साथ देते हैं या नहीं- यही युद्धविराम के भविष्य का फ़ैसला करेगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.