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क्या आपसी मनमुटाव ख़त्म कर एक-दूसरे के क़रीब आ सकेंगे भारत और बांग्लादेश?
- Author, शुभज्योति घोष
- पदनाम, बीबीसी न्यूज बांग्ला, दिल्ली
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
भारत और बांग्लादेश के आपसी संबंधों में एक लंबे तनावपूर्ण दौर के बाद ढाका में एक चुनी हुई सरकार सत्ता में आई है. और पहली बार उस सरकार का कोई महत्वपूर्ण मंत्री दिल्ली दौरे पर आया.
बांग्लादेश के विदेश मंत्री डॉ. खलीलुर रहमान के दौरे को भारत ने भी काफ़ी अहमियत दी.
मंगलवार शाम को दिल्ली पहुंचने के बाद डॉ. रहमान ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ बैठक की. उन दोनों ने एक साथ डिनर भी किया. उसके बाद आठ अप्रैल को भी विदेश मंत्री एस जयशंकर के अलावा, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के साथ मुलाक़ातों का दौर जारी रहा.
अनुमान है कि इस दौरान गंगा नदी के पानी पर हुए समझौते के नवीनीकरण के लिए बातचीत शुरू करने के अलावा क़रीब डेढ़ साल पहले ख़त्म की गई व्यापारिक सुविधाओं की बहाली और मौजूदा समझौते के तहत पाइप लाइन के जरिए बांग्लादेश को ईंधन की सप्लाई जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई होगी.
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लेकिन भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से डॉ. रहमान के दौरे पर कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है. इससे यह साफ़ नहीं हो सका है कि इस दौरे के प्रति भारत सरकार का क्या नज़रिया है.
दिल्ली के बाद डॉ. रहमान भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ मॉरीशस में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में शिरकत करने के लिए रवाना हुए.
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में दो देशों के विदेश मंत्रियों की इस तरह एक साथ किसी लंबी दूरी की हवाई यात्रा कम ही देखने को मिलता है. इससे पता चलता है कि दोनों देशों की सरकारें एक-दूसरे को काफ़ी अहमियत दे रही हैं और आपसी समझ बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं.
आपसी संबंधों में खींचतान का कितना असर?
अगस्त, 2024 में बड़े पैमाने पर हुए जिस आंदोलन के बाद लगातार 16 साल तक सत्ता में रहीं शेख़ हसीना की अवामी लीग सरकार का पतन हुआ उस आंदोलन में भारत-विरोधी छाप स्पष्ट थी.
आंदोलनकारी लगातार आरोप लगा रहे थे कि 'शेख़ हसीना ने देश के हितों को भारत के हाथों बेच दिया है.'
उस समय बांग्लादेश की सड़कों पर नारे लग रहे थे कि दिल्ली या ढाका? भीड़ इसका जवाब देती थी, ढाका, ढाका, ढाका... उसी दौरान भारतीय वस्तुओं के बहिष्कार की अपील की गई और ढाका स्थित भारतीय दूतावास के सांस्कृतिक केंद्र में भी आग लगी दी गई थी.
दूसरी ओर, भारत ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए बांग्लादेश में अपना वीज़ा कार्यक्रम रोक दिया, एक के बाद एक व्यापारिक सुविधाएं ख़त्म कर दीं और क्रिकेट टीम का पूर्व निर्धारित दौरा भी रद्द हो गया.
अब उस स्थिति में कुछ सुधार ज़रूर हुआ है. लेकिन इस बात पर संदेह बना हुआ है कि क्या कभी पहले जैसी स्थिति बहाल हो पाएगी.
हाल में दोनों देशों के लोगों के बीच एक-दूसरे के प्रति जिस पैमाने पर नफऱत और हमले देखे गए, उनकी पूरी तरह अनदेखी करना दोनों सरकारों के लिए मुश्किल होगा.
इसकी वजह यह है कि दोनों देशों के सत्तारूढ़ दलों के सामने अंदरूनी राजनीति की मजबूरियां भी हैं. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) सरकार ने पहले ही बांग्लादेश फ़र्स्ट को अपनी विदेश नीति का मूल मंत्र घोषित कर दिया है.
बांग्लादेश में कई लोग अक्सर भारत में अल्पसंख्यक मुसलमानों के उत्पीड़न के आरोप लगाते रहे हैं. अब दिल्ली इस धारणा का खंडन करने की कोशिश कर रही है.
बीबीसी बांग्ला को मिली जानकारी के मुताबिक़, प्रधानमंत्री कार्यालय किसी प्रतिष्ठित मुस्लिम बुद्धिजीवी को ढाका में भारतीय उच्चायुक्त के तौर पर तैनात करने के मुद्दे पर गंभीरता से विचार कर रहा है.
इसके लिए किसी राजनेता या पूर्व राजनयिक के नाम पर भी विचार चल रहा है. पहले एक पूर्व मंत्री के नाम पर भी विचार किया गया था. लेकिन उन्होंने खुद ही इस पर अनिच्छा जता दी थी.
ऐसे प्रस्ताव का हक़ीक़त में बदलना भारत के लिए एक दुर्लभ बात होगी. इसकी वजह यह है कि लंदन या वॉशिंगटन के अलावा किसी दूसरे देश में राजदूत के तौर पर राजनीति नियुक्ति की पहले ख़ास मिसाल नहीं मिलती.
आख़िरकार अगर ऐसे किसी व्यक्ति को ढाका में राजदूत बनाकर भेजा जाता है तो शायद इसकी अहमियत प्रतीकात्मक ही हो. लेकिन इससे यह संदेश ज़रूर जाएगा कि भारत बांग्लादेश के बहुसंख्यक लोगों के विचारों का सम्मान कर रहा है.
'पश्चिम बंगाल के चुनाव से पहले कुछ नहीं होगा'
ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की विशेषज्ञ श्रीराधा दत्त मानती हैं कि भारत को ये बात अच्छी तरह से पता है कि बांग्लादेश में भारत-विरोधी मानसिकता काफ़ी मजबूत है. लेकिन उनको इस बात का अनुमान नहीं है कि भारत की विदेश नीति को लागू करने के मामले में इस बात को कितनी अहमियत दी जाती है.
इसका एक प्रमुख कारण यह हो सकता है कि अवामी लीग के लंबे शासनकाल के दौरान दिल्ली के बारे में बांग्लादेश के आम लोगों की राय की अनदेखी करते हुए भारत के ज़्यादातर हितों की रक्षा की गई थी.
दरअसल, शेख़ हसीना सरकार ने भारत की ओर मदद का हाथ बढ़ा दिया था. इसलिए भारत को इस बात पर ज़्यादा माथापच्ची करने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि वहां के आम लोग क्या सोचते हैं.
श्रीराधा दत्त बीबीसी बांग्ला से कहती हैं, "भारत, बांग्लादेश के लोगों के साथ भी दोस्ती के पक्ष में है. इसमें कुछ ग़लत नहीं है. लेकिन वहां भारत विरोधी भावना हमेशा रही है और भविष्य में भी रहेगी. दिल्ली ने इस तथ्य को स्वीकार करते हुए ही ढाका से संबंध बनाए रखा है और भारत विरोधी भावना इसमें बाधा नहीं बनी है."
वो कहती हैं, "अगस्त, 2024 के बाद बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति में आए बदलाव को ध्यान में रखते हुए भारत को अब यह दिखाने की कोशिश करनी होगी कि वह भी भारत विरोधी विचारों की वजहों को दूर करने की कोशिश कर रहा है."
उनका मानना है कि इस मामले में दिल्ली का नज़रिया बदलने के बावजूद पश्चिम बंगाल और असम में विधानसभा चुनाव पूरे नहीं होने तक इसका कोई ख़ास ज़मीनी असर नहीं नज़र आएगा.
बीजेपी किसी तरह बंगाल चुनाव जीतना चाहती है. उसके प्रचार का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार यह है कि वह पश्चिम बंगाल को बांग्लादेश नहीं बनने देना चाहती. इसलिए भारत के सत्तारूढ़ दल की आक्रामक बांग्लादेश-विरोधी राजनीतिक विचारधारा में फ़िलहाल किसी स्पष्ट बदलाव की संभावना कम ही है.
पश्चिम बंगाल और असम विधानसभा चुनाव के वोटों की गिनती चार मई को होगी. प्रोफ़ेसर श्रीराधा दत्त के मुताबिक़, बांग्लादेश के मुद्दे पर भारत की नीतियों में कोई भी बदलाव उसके बाद ही संभव होगा.
'संबंधों को सामान्य बनाने की इच्छा महत्वपूर्ण'
ढाका में भारत के पूर्व राजदूत पिनाक रंजन चक्रवर्ती पूरे मामले को अलग नज़रिए से देखते हैं.
उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, "बांग्लादेश के एक वर्ग में भारत विरोध की आक्रामक भावना कोई नई नहीं है. यह बात भारत को भी पता है."
चक्रवर्ती के मुताबिक़, बांग्लादेश में भारत-विरोध के मुद्दे पर राजनीति करने वाली ताक़तें ही ऐसे मुद्दे उठाती हैं कि भारत एक बड़ी ताक़त के तौर पर बांग्लादेश में जनमत की अनदेखी कर रहा है.
पूर्व राजदूत की दलील है कि बांग्लादेश की आज़ादी के बाद से ही उसकी आबादी का एक बड़ा हिस्सा भारत विरोधी नज़रिया अपनाता रहा है. लेकिन दोनों देशों के आपसी संबंधों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है. इसमें उतार-चढ़ाव ज़रूर होता रहा, लेकिन संबंध कभी पूरी तरह ठप नहीं हुए.
चक्रवर्ती कहते हैं कि अब दोनों देशों के हित एक दूसरे से जुड़े हैं और व्यापार और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में कई तरह से एक-दूसरे पर निर्भर हैं. इसलिए दोनों देश आपसी संबंधों को मजबूती से आगे बढ़ाएंगे.
उनका कहना था, "बांग्लादेश में आबादी के एक हिस्से में भारत-विरोध की भावना है. ठीक उसी तरह भारत की आबादी के एक हिस्से में बांग्लादेश विरोध की भावना भी है. इन भावनाओं में समय-समय पर उतार-चढ़ाव होता रहता है."
चक्रवर्ती का कहना था कि परस्पर विरोधी भावनाओं के बावजूद, अब तक व्यापार, कनेक्टिविटी और संपर्क व्यवस्था बंद नहीं हुई है, "मुझे भरोसा है कि दोनों देश सार्वजनिक रूप से कोई भी रुख़ अपनाएं, वो इस संबंध को स्वाभाविक रखना चाहते हैं. इसकी वजह यह है कि ऐसा करने में ही दोनों की भलाई है."
अवामी लीग का मुद्दा अड़चन बनेगा?
भारत और बांग्लादेश के आपसी संबंधों में फ़िलहाल अवामी लीग एक प्रमुख बाधा बन कर उभरी है. बांग्लादेश की इस राजनीतिक पार्टी के साथ दिल्ली की काफ़ी क़रीबी रही है और इसे लगभग ऐतिहासिक कहा जा सकता है.
बांग्लादेश में इस समय सक्रिय लगभग सभी राजनीतिक ताक़तें शेख़ हसीना के शासन को 'फासीवादी' करार दे रही हैं. अब उन्हीं शेख़ हसीना को भारत में शरण मिलने से जटिलता और बढ़ गई है.
दूसरी ओर, यह भी साफ़ हो गया है कि बांग्लादेश की अदालत से मौत की सज़ा मिलने के बाद हसीना को ढाका प्रत्यर्पित करने की मांग पर भारत कोई प्रतिक्रिया नहीं जता रहा है.
भारत के एक पूर्व राजदूत और बांग्लादेश के हालात पर क़रीबी नज़र रखने वाले सोमेन राय मानते हैं कि अवामी लीग के साथ अब तक भारत के भले ही कितने भी बेहतर संबंध रहे हों, बांग्लादेश की नई सरकार के साथ आपसी संबंध मजबूत बनाने में यह मुद्दा कोई बाधा नहीं बनेगा.
वो बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "कूटनीति में न तो कोई स्थाई दोस्त होता है और न ही स्थाई दुश्मन. हमें अवामी लीग के साथ बेहतर संबंधों का फ़ायदा मिला है. अब बीएनपी वहां सत्ता में है. हमने बांग्लादेश में काफ़ी निवेश किया है. उस पर पानी नहीं फेरा जा सकता. इसलिए नई सरकार से भी दोस्ताना संबंध बनाना हमारे हित में होगा."
दिल्ली में कई विश्लेषकों का कहना है कि अंदरूनी दबाव की वजह से प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी सरकार भले भारत से शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण की मांग करती रहे, वो इस मुद्दे पर ज़्यादा जोर नहीं देगी. भारत भी इस मुद्दे पर ज़्यादा विवाद से बचना चाहेगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित