इसराइल के पूर्व प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान को लेकर किस 'ख़तरे' का दिया संकेत?

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इमेज कैप्शन, इसराइल के पूर्व प्रधानमंत्री नेफ़्टाली बेनेट
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इसराइल के पूर्व प्रधानमंत्री नेफ़्टाली बेनेट ने यरूशलम में कॉन्फ़्रेंस ऑफ़ प्रेजिडेंट्स ऑफ मेजर अमेरिकन जूईश ऑर्गेनाइज़ेशन को संबोधित करते हुए कहा कि इस इलाक़े में एक नई धुरी बन रही है, जिसमें तुर्की, क़तर, मुस्लिम ब्रदरहुड और परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान शामिल हैं.

नेफ़्टाली ने कहा कि यह गठजोड़ इसराइल के ख़िलाफ़ शत्रुता को हवा दे रहा है और सऊदी अरब को भी प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है.

बेनेट ने इस कॉन्फ़्रेंस में चेतावनी दी कि तुर्की इसराइल के लिए एक नया ख़तरा बनता जा रहा है और इसे लेकर सरकार अनजान है.

इसराइल के पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा, ''तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन एक ख़तरनाक प्रतिद्वंद्वी हैं जो इसराइल को घेरने की कोशिश कर रहे हैं. हमें फिर से अपनी आँखें बंद नहीं करनी चाहिए."

बेनेट ने कहा, "वर्तमान सरकार एक बार फिर सो रही है. हमारी सीमाओं पर बढ़ते कट्टरपंथी ख़तरे के चिंताजनक संकेत हैं. एक शत्रुतापूर्ण मुस्लिम ब्रदरहुड धुरी, जिसके पीछे पाकिस्तानी परमाणु हथियारों का समर्थन है और इसका नेतृत्व एक महत्वाकांक्षी और शत्रुतापूर्ण तुर्की कर रहा है."

बेनेट ने कहा, "हमें अलग-अलग तरीक़ों से लेकिन एक साथ ईरान से आने वाले ख़तरे और तुर्की से आने वाली शत्रुता के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए. तुर्की नया ईरान है."

दरअसल, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने पिछले साल सितंबर में एक डिफेंस पैक्ट पर हस्ताक्षर किए थे.

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इमेज कैप्शन, 2021 में दो नवंबर को संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में इसराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री के नेफ़्टाली बेनेट के साथ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

पाकिस्तान की सऊदी और तुर्की से बढ़ती क़रीबी

यह डिफेंस पैक्ट कहता है कि सऊदी और पाकिस्तान में से किसी एक के ख़िलाफ़ "किसी भी तरह की आक्रामकता" को दोनों के ख़िलाफ़ हमला माना जाएगा.

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यह नेटो के अनुच्छेद-5 जैसा है. सऊदी अरब और पाकिस्तान के 'डिफेंस पैक्ट' में तुर्की के भी शामिल होने की बात कही जा रही है. पाकिस्तान एकमात्र इस्लामिक देश है, जो परमाणु शक्ति संपन्न है. कहा जाता है कि इस वजह से भी पाकिस्तान की प्रासंगिकता इस्लामिक वर्ल्ड में बढ़ जाती है.

इसराइल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने लिए ख़तरा मानता है. इसराइल ने पिछले साल ईरान के यूरेनियम संवर्धन वाले ठिकानों पर हमला भी किया था. लेकिन इसराइल में एक भावना यह भी है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार भी उसके लिए ख़तरा हैं.

सऊदी, पाकिस्तान और तुर्की की क़रीबी को एक मज़बूत गठजोड़ के रूप में देखा जाता है.

अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग से अंकारा स्थित थिंक टैंक टीईपीएवी के रणनीतिकार निहात अली ओज़कान ने कहा था, ''सऊदी अरब के पास वित्तीय ताक़त है. पाकिस्तान के पास परमाणु क्षमता, बैलिस्टिक मिसाइलें और मानव संसाधन हैं जबकि तुर्की के पास सैन्य अनुभव है और उसने एक रक्षा उद्योग विकसित किया है.''

ओज़कान ने कहा था, "जैसे-जैसे अमेरिका क्षेत्र में अपने और इसराइल के हितों को प्राथमिकता दे रहा है, बदलती परिस्थितियाँ और क्षेत्रीय संघर्षों के परिणाम देशों को मित्र और शत्रु की पहचान के लिए नए तंत्र विकसित करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं."

जून 2016 में इसराइली अख़बार यरूशलम पोस्ट में पत्रकार अहमार मुस्तिखान ने लिखा था कि इसराइल और विश्व यहूदी समुदाय के हित में यह समझना ज़रूरी है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार उतने ही ख़तरनाक हैं, जितने ईरान के संभावित हथियार हो सकते हैं.''

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इमेज कैप्शन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजश्कियान के साथ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़

पाकिस्तान-सऊदी की सोहबत किसके ख़िलाफ़?

थिंक टैंक इंस्टिट्यूट फोर नेशनल सिक्यॉरिटी स्टडीज में गल्फ़ प्रोग्राम के प्रमुख और सीनियर रिसर्चर योएल गुज़ांस्की ने यरूशलम पोस्ट के एक लेख में सऊदी अरब और पाकिस्तान की बढ़ती क़रीबी को इसराइल के ख़िलाफ़ नहीं बताया था.

योएल गुज़ांस्की ने पिछले साल 22 सितंबर को लिखा था, ''सऊदी और पाकिस्तान के डिफेंस पैक्ट में परमाणु हथियार के मुद्दे पर चीज़ें साफ़ नहीं हैं. संभवतः ऐसा जानबूझकर किया गया है. सऊदी अरब के लिए पाकिस्तानी "न्यूक्लियर अंब्रेला" की अफ़वाहें सालों से चलती रही हैं. इन अफ़वाहों को रियाद की इस्लामाबाद को दी गई वित्तीय मदद, विशेष रूप से उसके यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम के कारण बल मिलता रहा है.''

योएल गुज़ांस्की ने लिखा है, ''इसके बावजूद प्रकाशित समझौते में परमाणु हथियारों का कोई ज़िक्र नहीं है. पाकिस्तान अपनी आधिकारिक स्थिति पर कायम है कि उसका परमाणु हथियार केवल भारत के लिए है न कि क्षेत्रीय सुरक्षा अंब्रेला के रूप में. सऊदी अरब पाकिस्तान को संभावित परमाणु विकल्प के रूप में देख सकता है लेकिन क्या पाकिस्तान भी इसे उसी दृष्टि से देखता है? विडंबना यह है कि गठबंधन को अधिक सार्वजनिक बनाकर, रियाद और इस्लामाबाद ने अटकलों को और बढ़ा दिया है. जो सवाल पहले बंद कमरों में फुसफुसाए जाते थे वे अब खुले तौर पर चर्चा का विषय हैं.''

योएल गुज़ांस्की के मुताबिक़, ''इसराइल को इस समझौते को अपने ख़िलाफ़ सीधे दुश्मनी के रूप में नहीं समझना चाहिए. इसके बजाय, पाकिस्तान के साथ संबंधों को औपचारिक रूप देने का सऊदी का फ़ैसला अमेरिका की विश्वसनीयता को लेकर सऊदी की बढ़ती चिंताओं, ईरानी आक्रामकता और क्षेत्रीय अस्थिरता को दर्शाता है.''

लेकिन इसराइल के मीडिया में पाकिस्तान के ख़तरों को लेकर बात होती रहती है. जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट सर्जियो रेस्तेली ने द टाइम्स ऑफ़ इसराइल में पिछले साल 29 नवंबर को लिखा था कि सऊदी, पाकिस्तान और तुर्की की क़रीबी तब बढ़ रही है, जब इसराइल और भारत अपनी साझेदारी को सैन्य, तकनीकी के साथ कूटनीतिक स्तर पर गहरा कर रहे हैं.

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इमेज कैप्शन, एक सितंबर 2005 को इस्तांबुल में पकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री ख़ुर्शीद कसूरी ने इसराइल के तत्कालीन विदेश मंत्री सिलवान शालोम से मुलाक़ात की थी

पाकिस्तान और इसराइल के संबंध

पाकिस्तान ने अभी तक इसराइल को एक देश के रूप में मान्यता नहीं दी है.

ऐसे में दोनों देशों में राजनयिक संबंध नहीं हैं. इसराइल को लेकर पाकिस्तान के भीतर आए दिन हिंसक विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं. पाकिस्तान का इसराइल से कोई विवाद या संघर्ष नहीं रहा है, तब भी उसने इसराइल को एक राष्ट्र के रूप में स्वीकार नहीं किया है. पाकिस्तान ऐसा अरब देशों के साथ इस्लामिक एकता दिखाने के लिए करता है.

लेकिन जब अरब के देश ही इसराइल के क़रीब जाने लगे, तो पाकिस्तान को इसराइल के साथ संबंध क़ायम करने में क्या दिक़्क़त है?

इसका जवाब 2020 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने दिया था.

इमरान ख़ान ने कहा था, ''बाक़ी देश चाहे जो भी करें, हमारा रुख़ स्पष्ट है. मोहम्मद अली जिन्ना ने 1948 में कहा था- जब तक फ़लस्तीनियों को उनका अधिकार नहीं मिल जाता, तब तक इसराइल को हम स्वीकार नहीं कर सकते.''

कई लोग इस बात की वकालत करते हैं कि अगर पाकिस्तान इसराइल को मान्यता देता है, तो अमेरिका से उसके संबंध अच्छे हो सकते हैं. लेकिन पाकिस्तान के आम लोगों की इसराइल विरोधी भावना आए दिनों सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन के रूप में दिखती है.

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने कहा था कि अगर इसराइल और फ़लस्तीन किसी शांति समझौते पर पहुँच जाते हैं, तो इसराइल के साथ राजनयिक संबंध क़ायम करने में कोई दिक़्क़त नहीं है.

2005 में पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री ख़ुर्शीद कसूरी और इसराइल के तत्कालीन विदेश मंत्री सिलवान शालोम की इस्तांबुल में मुलाक़ात हुई थी.

कहा जाता है कि यह मुलाक़ात अर्दोआन ने करवाई थी. पाकिस्तान में इस मुलाक़ात को लेकर काफ़ी हंगामा हुआ था.

सिलवान शालोम ने ख़ुर्शीद कसूरी से मुलाक़ात के बाद कहा था, ''हमारी बातचीत काफ़ी अहम है. यह बातचीत न केवल पाकिस्तान से हमारे संबंधों के लिए मायने रखती है बल्कि पूरी मुस्लिम दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है. अरब के सभी मुस्लिम देशों के साथ हम पाकिस्तान से भी राजनयिक संबंध चाहते हैं.''

पाकिस्तान में इसराइल को दुश्मन के रूप में भले देखा जाता है लेकिन इसराइल में पाकिस्तान को लेकर सड़कों पर इस तरह का ग़ुस्सा देखने को नहीं मिलता है. 2018 में इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू भारत के दौरे पर आए थे.

इस दौरे में नेतन्याहू ने कहा था, ''इसराइल पाकिस्तान का दुश्मन नहीं है और पाकिस्तान को भी हमारा दुश्मन नहीं होना चाहिए.''

इसके बाद पाकिस्तान में दबे स्वर में इसराइल को लेकर फिर से विचार करने की बात कही गई लेकिन पाकिस्तानी सीनेट के तत्कालीन चेयरमैन रज़ा रब्बानी ने मुस्लिम वर्ल्ड को चेतावनी देते हुए कहा था, 'भारत, इसराइल और अमेरिका के बीच उभरता गठजोड़ मुस्लिम दुनिया के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है.'

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.