You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
फ़ुटबॉल के ज़रिए बाल विवाह को मात देती लड़कियाँ
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, अजमेर, राजस्थान से
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
गर्मियों की एक चिपचिपी दोपहर की बात है. उस वक़्त चौदह साल की निशा वैष्णव और उनकी 18 साल की बहन मुन्ना फ़ुटबॉल खेल रही थीं. तभी उनकी नज़र पाँच लोगों पर पड़ी. वे उनकी तस्वीरें ले रहे थे.
थोड़ी देर में निशा को पता चला कि वे सब एक ही परिवार के थे. वे अपने बेटे का रिश्ता उसके साथ करना चाहते थे. उन लोगों के साथ निशा की माँ भी थीं.
उन्होंने निशा को अपने साथ लिया और रिश्ते की बात करने के लिए सबके साथ अपने घर चली आईं.
निशा बताती हैं, "माँ ने कहा, सबके पैर छू पर मैंने मना कर दिया. कहा, ये कौन हैं मेरे. रिश्ता होगा तब देख लूँगी."
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
निशा इतनी कम उम्र में शादी नहीं करना चाहती थीं. यह बात साल 2024 की है.
भारत में लड़कियों की 18 साल और लड़कों की 21 साल की उम्र से पहले शादी करना क़ानूनन अपराध है. इसे बाल विवाह माना जाता है. हालाँकि, बाल विवाह अब भी हो रहे हैं.
अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार संगठन संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) के एक दस्तावेज़ के मुताबिक़, भारत में रह रही हर चार महिलाओं में से एक की शादी 18 साल से पहले हो गई थी.
ये आँकड़े नेशनल फ़ेमिली हेल्थ सर्वे (एनएफ़एचएस) 2019-21 के आधार पर हैं. हालाँकि, बाल विवाह की दर पिछले 30 सालों में तेज़ी से गिरी है.
एनएफ़एचएस: 1992-93 के मुताबिक़, उस दौर में भारत में क़रीब 66 प्रतिशत स्त्रियों की शादी 18 साल से पहले हो गई थी.
निशा राजस्थान के अजमेर के एक गाँव में रहती हैं. इस राज्य में बाल विवाह की दर देश की औसत दर से थोड़ा ज़्यादा है.
देश के ज़्यादातर हिस्से की तरह यहाँ भी लड़कियों के लिए माँ-बाप के लाए शादी के रिश्ते को मना करना बहुत मुश्किल है.
लेकिन निशा ये हौसला जुटा पाईं और इसका श्रेय वह फ़ुटबॉल को देती हैं.
हम निशा से उनके इलाक़े के फ़ुटबॉल के एक मैदान में मिले. निशा कहती हैं, "फ़ुटबॉल ने मानो मेरी ज़िंदगी ही बदल डाली."
'फ़ुटबॉल मेरा आशिक़...'
साल 2022 में निशा को उनकी बहन मुन्ना ने फ़ुटबॉल से जोड़ा. मुन्ना ने ख़ुद एक साल पहले यह खेल सीखा था. राजस्थान में काम कर रही एक संस्था 'महिला जन अधिकार समिति' ने 'फ़ुटबॉल फ़ॉर फ़्रीडम' प्रोजेक्ट के तहत लड़कियों को यह खेल सिखाना शुरू किया था.
मुन्ना ने अपने गाँव की लड़कियों को फ़ुटबॉल से जोड़ने में अहम् भूमिका निभाई. लड़कियों के माँ-बाप से खेलने की इजाज़त लेने की लड़ाई लड़नी हो या फिर मैदान पर शॉर्ट्स पहनने के लिए तैयार करना- मुन्ना ने सब किया.
मर्दों के सामने महिलाओं के घूँघट करने की प्रथा वाले इलाक़े में ये कुछ बड़े हासिल थे.
मुन्ना से हमारी मुलाक़ात उनके गाँव में घर पर हुई.
मुन्ना बीबीसी से कहती हैं, "पहले दो-तीन दिन गाँव की महिलाएँ हमारी तरफ इशारा करके कहतीं, 'देखो, ये लड़कियाँ कैसे मोटे-मोटे पैर दिखा रही हैं.' फिर हमने तय किया कि हम इन पर ध्यान नहीं देंगे और शॉर्ट्स पहनते रहे."
निशा फ़ुटबॉल में तेज़ी से आगे बढ़ीं और साल 2024 में राजस्थान की जूनियर फ़ुटबॉल टीम में जगह बनाकर नेशनल फ़ुटबॉल चैम्पियनशिप तक पहुँचीं.
इसी वक़्त निशा ने अपने बाल भी छोटे करवा लिए. गाँव में लड़कियों के लिए ऐसा करना भी एक बड़ा क़दम है. आमतौर पर छोटे बाल तो लड़कों की निशानी मानी जाती है.
जब उस साल गर्मी की शाम में वह परिवार निशा को देखने आया, तब तक वह लड़ने के लिए तैयार हो चुकी थीं.
निशा ने बताया कि इतनी कम उम्र में शादी से उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया. उसने कहा कि उसे छोटे बाल रखने और फ़ुटबॉल खेलने से कोई नहीं रोक सकता.
क़रीब एक महीने बाद उस परिवार ने रिश्ता वापस ले लिया.
निशा और मुन्ना के लिए और रिश्ते आते रहे. उनका एक भाई है. राजस्थान में आटा-साटा की प्रथा के तहत लड़कियों के लेन-देन की वजह से कई परिवार बहनों के बदले उनके भाई को अपनी बेटी देने का प्रस्ताव लाते रहे.
लेकिन निशा और मुन्ना बाल विवाह के ख़िलाफ़ लड़ाई में डटी रहीं. वे फ़ुटबॉल में करियर बनाने के लक्ष्य को ढाल की तरह इस्तेमाल कर रही हैं. वे अब खुलकर जवाब देने से भी डरती नहीं हैं.
निशा के पिता ने एक दिन उससे पूछा कि खेल के मैदान में क्या उसका आशिक़ इंतज़ार कर रहा है. निशा ने हमें बताया कि उन्होंने जवाब दिया, "आशिक़ नहीं है. फ़ुटबॉल है. वही मेरा आशिक़ है."
फ़ुटबॉल से कैसे रुका बाल विवाह?
स्वास्थ्य और जेंडर पर किए गए कई शोध बताते हैं कि लड़कियों की कम उम्र में शादी से यौन हिंसा, समय से पहले गर्भवती होने और कुपोषित होने जैसे कई ख़तरे पैदा हो जाते हैं.
उनकी पढ़ाई छूटने की आशंका बढ़ जाती है. इसकी वजह से वे बड़ी हो कर आर्थिक तौर पर सक्षम नहीं हो पातीं.
'फ़ुटबॉल फ़ॉर फ़्रीडम' प्रोजेक्ट चलाने वालीं पद्मा जोशी लड़कियों के परिवारों को इन सब ख़तरों की जानकारी देना चाहती हैं.
लेकिन वह बताती हैं कि शुरुआत में उन्होंने परिवारों से ये नहीं कहा कि वह लड़कियों को फ़ुटबॉल सिखा रही हैं ताकि बाल विवाह रोक सकें.
पद्मा बताती हैं, "हमने कहा कि हम फ़ुटबॉल लाए हैं ताकि खेल से सरकारी नौकरियों के अवसर खुलें. लेकिन जब लड़कियाँ हमसे जुड़ीं और बाल विवाह के ख़तरों के साथ-साथ अपने संवैधानिक अधिकारों के बारे में जाना तो वे अपने लिए ख़ुद आवाज़ उठाने लगीं".
उनके मुताबिक़, पिछले 10 सालों में 'फ़ुटबॉल फ़ॉर फ़्रीडम' प्रोजेक्ट ने राजस्थान के 13 गाँवों की 800 लड़कियों को फ़ुटबॉल से जोड़ा है.
लेकिन लड़कियों को बोझ समझने वाले पितृसत्तात्मक समाज में बाल विवाह को सही मानने वाली रूढ़िवादी सोच को बदलना आज भी एक बड़ी चुनौती है.
'मैं अपनी बेटियों के लिए डरती हूँ'
निशा और मुन्ना की माँ लाली का बाल विवाह हुआ था. उन्होंने अपनी तीसरी और सबसे बड़ी बेटी की शादी भी 16 साल की उम्र में कर दी थी. लाली से हम उनके गाँव में घर पर ही मिले.
अपने फ़ैसले को सही ठहराते हुए लाली बीबीसी से कहती हैं, "मैं अपनी बेटियों के लिए डरती हूँ. गाँववाले कहते हैं कि लड़कियाँ घर से निकलेंगी तो बिगड़ जाएँगी या लड़कों के साथ भाग जाएँगी. इसलिए उनकी शादी जल्दी कर देनी चाहिए."
मैं उनसे पूछती हूँ, क्या वह जानती हैं कि बाल विवाह ग़ैर-क़ानूनी है? लाली 'हाँ' में सिर हिलाती हैं और कहती हैं कि यहाँ कोई पकड़ा नहीं जाता.
वह बताती हैं, "हम छिप कर करते हैं. शादी का न्योता नहीं छपवाते. घर को बाहर से नहीं सजाते. टेंट भी नहीं लगवाते."
इस बारे में क़ानून साफ़ कहता है कि बाल विवाह करवाने में किसी भी तरह की मदद करना अपराध है. अपने बच्चे-बच्चियों का बाल विवाह करवाने के लिए माँ-बाप को और शादी में शामिल होने वाले किसी भी वयस्क को दो साल की सज़ा और एक लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है.
लेकिन अजमेर में बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) की अध्यक्ष अंजलि शर्मा के मुताबिक़, क़ानून तोड़ने वालों को सज़ा दिलवाना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि न कोई गवाह सामने आता है न सबूत मिलते हैं.
वह बताती हैं, "अगर परिवार को पता चल जाए कि हमें उनके बच्चे की होने वाली शादी की ख़बर मिल गई है तो वे उसकी तारीख़ एक-दो दिन आगे पीछे कर देते हैं. और इसे छिपाने में पूरा गाँव साथ देता है."
लड़का या लड़की के पुलिस में शिकायत करने पर शादी रद्द की जा सकती है लेकिन वे अपने माँ-बाप को जेल पहुँचाने के लिए क़दम उठाने से डरते हैं.
बाल विवाह होने के वक़्त अगर शिकायत न की जाए और लड़के-लड़की वयस्क होने पर भी शिकायत न करें तो उस शादी को क़ानूनी तौर पर रजिस्टर करवाया जा सकता है. इस सूरत में किसी को सज़ा नहीं होती.
'यूनिसेफ़' के मुताबिक़, भारत में हर साल 18 साल से कम उम्र की 15 लाख लड़कियाँ ब्याही जा रही हैं.
हालाँकि, अंजलि शर्मा बताती हैं कि बच्चे-बच्चियों के लिए बनाई गई सरकारी हेल्पलाइन (चाइल्डलाइन – 1098) पर अगर कभी शिकायत आती है तो वे समय पर कार्रवाई कर शादी रोक देती हैं.
क़ानून के अमल और जागरूकता बढ़ने की वजह से अब पुलिस में बाल विवाह के ख़िलाफ़ ज़्यादा मामले दर्ज हो रहे हैं.
महिला और बाल विकास मंत्रालय के मुताबिक़ राष्ट्रीय स्तर पर साल 2017 में 395 मामले दर्ज हुए थे. यह संख्या साल 2021 में बढ़ कर 1050 हो गई.
लेकिन ये संख्या बाल विवाह के आँकड़े का बहुत ही छोटा हिस्सा हैं.
इनके सपने
निशा 15 साल की हैं और अभी दसवीं क्लास में पढ़ रही हैं. उनका मक़सद भारत की फ़ुटबॉल टीम के लिए खेलना है.
अगर वह वहाँ तक नहीं पहुँच पाईं तो सरकारी नौकरी हासिल करना चाहती हैं ताकि आर्थिक तौर पर सक्षम हो जाएँ और आज़ादी से जी सकें.
इसके लिए उन्हें अपनी ग्रेजुएशन पूरी करने के साथ-साथ राज्य स्तर या उससे आगे खेलते रहना होगा.
जबकि मुन्ना अब 19 साल की हैं और वह फ़र्स्ट ईयर में पढ़ रही हैं. वह बाल विवाह से बच गईं लेकिन अब वे माँ-बाप की तय की हुई नहीं, अपनी मर्ज़ी से शादी करना चाहती हैं.
उनकी बड़ी बहन को कुछ महीने पहले ही बेटी पैदा हुई है. आटा-साटा की प्रथा के तहत उनके ससुराल वाले अब अपने छोटे बेटे के लिए मुन्ना का हाथ माँग रहे हैं.
मुन्ना बताती हैं, "वे मेरी भांजी की शादी एक दूसरे परिवार में करके उस परिवार से मेरे भाई के लिए लड़की ले कर और बदले में मुझे उनके बेटे से ब्याहना चाहते हैं."
मुन्ना ऐसी शादी नहीं चाहतीं. वह फ़ुटबॉल में निशा जितनी ऊँचाइयाँ तो नहीं छू पाईं लेकिन कोच की ट्रेनिंग ली है.
अब वे 'फ़ुटबॉल फ़ॉर फ़्रीडम' प्रोजेक्ट के तहत लड़कियों को फ़ुटबॉल सिखा रही हैं. साथ में अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर रही हैं.
उनकी चाहत है कि वह स्कूल में खेल की टीचर की नौकरी हासिल करें ताकि अपने पैरों पर खड़ी हो सकें और अपनी ज़िंदगी के फैसले ले सकें.
ऐसा ही बदलाव वह अपने गाँव की लड़कियों में लाना चाहती हैं.
मुन्ना कहती हैं, "मैं उनकी शादी रोक पाऊँ या नहीं, उन्हें अपनी ज़िंदगी में कुछ बनने में मदद करना चाहती हूँ ताकि वे अपने सपने तो पूरे कर पाएँ."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.