यूपी की आईपीएस अधिकारी की बॉडी शेमिंग का मामला क्या है? ऐसे मामलों में क्या कहता है क़ानून?

    • Author, सैय्यद मौज़िज़ इमाम
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर ज़िले की एसपी अपर्णा रजत कौशिक एक प्रेस ब्रीफिंग कर रही हैं.

इस वीडियो में एसपी किस मामले पर ब्रीफिंग कर रही हैं, इस पर चर्चा होने की बजाय लोग इस बात पर कमेंट कर रहे हैं कि वह कैसी दिख रही हैं.

दरअसल, एक गिरफ़्तारी से जुड़ी जानकारी देने के लिए मिर्ज़ापुर पुलिस ने एसपी अपर्णा कौशिक की प्रेस ब्रीफिंग का वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया था.

पांच दिन पहले अपलोड हुए इस वीडियो को 47 लाख बार देखा गया है और लगभग 65 हज़ार लोगों ने इस पर कमेंट किए हैं. लेकिन ज़्यादातर सोशल मीडिया यूज़र्स ने पुलिस के कामकाज पर टिप्पणी करने के बजाय एसपी की क़द-काठी को लेकर भद्दे कमेंट किए.

बॉडी शेमिंग का मामला सामने आने के बाद पुलिस ने इस पोस्ट में कमेंट सेक्शन को बंद कर दिया.

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बीबीसी ने इस मामले पर अपर्णा रजत कौशिक से बात करने की कोशिश की लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया है. पुलिस की तरफ से ये जानकारी दी गई कि वे आधिकारिक काम में दफ़्तर व्यस्त हैं.

इस मामले के सामने आने के बाद एक बार फिर बॉडी शेमिंग पर बहस शुरू हो गई है.

कितना 'कुसंस्कृत' हो गया समाज

अमेठी में कांग्रेस के पूर्व एमएलसी दीपक सिंह ने सोशल मीडिया पर की जा रही टिप्पणियों की आलोचना की और कहा कि ऐसा व्यवहार किसी के साथ नहीं होना चाहिए.

उन्होंने कहा, "अपर्णा जी के अमेठी में रहते हुए हमारी कई बार मुलाक़ात हुई है. वह बहुत ही व्यवहारिक महिला हैं, किसी अधिकारी के बारे में टिप्पणी उसके कामकाज को लेकर होना चाहिए, न कि किसी अन्य कारण से. जो टिप्पणियां की गई हैं, वे सही नहीं हैं.''

लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति और सोशल एक्टिविस्ट रूप रेखा वर्मा ने इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि 'समाज कितना कुसंस्कृत' हो चुका है.

उन्होंने कहा, "जो महिला एक ज़िम्मेदार पद पर है, और जिसके ऊपर पब्लिक के हज़ारों लोगों की समस्याओं का हल निकालने का दायित्व है, अगर उसके साथ यह बदतमीज़ी हो सकती है, गलत भाषा इस्तेमाल की जाती है और गरिमा को ठेस पहुंचाई जाती है, तो इससे पता चलता है कि हमारा समाज पिछले कुछ समय में कितना गिर चुका है, कितना वहशी हो चुका है."

रूप रेखा वर्मा कहती हैं, "यह इंसान के देखने के नजरिए पर निर्भर करता है कि वह किसी व्यक्ति को किस तरह देखता है."

यह मामला सिर्फ़ आईपीएस अधिकारी अपर्णा रजत कौशिक तक सीमित नहीं है. और ऐसा नहीं है कि केवल महिलाओं को ही इसका निशाना बनाया जाता है.

सोशल मीडिया या आम ज़िंदगी में हम सभी ने अपनी कद- काठी, रंग या बनावट पर कुछ न कुछ सुना ही होगा .

रोज़मर्रा के समाज का हिस्सा

फोर्टिस हेल्थकेयर के मेंटल हेल्थ और बिहेवियरल साइंसेज़ विभाग के 2019 में किए गए एक सर्वे में सामने आया कि बॉडी शेमिंग एक गंभीर समस्या है.

यह समस्या केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि स्कूलों और कार्यस्थलों पर भी बड़े पैमाने पर देखने को मिलती है.

सर्वे के मुताबिक़, चिंताजनक बात यह है कि अक्सर ये नकारात्मक टिप्पणियां अजनबियों से नहीं, बल्कि दोस्तों और परिचितों से भी आती हैं.

सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, 47.5 फ़ीसदी महिलाओं ने बताया कि उन्होंने स्कूल या कार्यस्थल पर बॉडी शेमिंग का सामना किया है.

यह दर्शाता है कि वे स्थान, जो सुरक्षित और सहयोग वाले होने चाहिए, कई बार असहज और मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण बन जाते हैं.

वहीं, सर्वे में एक तथ्य यह भी है कि 32.5 फ़ीसदी मामलों में नकारात्मक टिप्पणियां किसी अजनबी ने नहीं, बल्कि क़रीबी दोस्तों ने की थीं.

सर्वे से पता चलता है कि बॉडी शेमिंग केवल बाहरी सामाजिक व्यवहार नहीं, बल्कि हमारे रोज़मर्रा के रिश्तों और बातचीत का भी हिस्सा बन चुकी है.

मेंटल हेल्थ के जानकार बताते हैं कि वज़न, शरीर की बनावट, त्वचा का रंग और बालों की गुणवत्ता जैसे पहलुओं पर की गई टिप्पणियां व्यक्ति के आत्मविश्वास पर काफ़ी गहरा असर डालती हैं.

लखनऊ के यूनिटी पीजी कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर शम्सी अकबर कहती हैं, "बॉडी शेमिंग सिर्फ एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक समस्या है, जिसके लिए जागरूकता, संवेदनशीलता और ज़िम्मेदार व्यवहार की सख़्त ज़रूरत है."

शम्सी अकबर के मुताबिक़, "बार-बार शरीर को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां सुनने से व्यक्ति का आत्मसम्मान धीरे-धीरे टूटने लगता है. वह ख़ुद को दूसरों से कमतर समझने लगता है और उसके भीतर हीन भावना घर कर जाती है."

क़ानून क्या कहता है.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ बेंच में वकील सायमा ख़ान कहती हैं कि अगर अपर्णा रजत कौशिक जैसी अधिकारी पर इस तरह की टिप्पणियां की जा सकती हैं, तो समझा जा सकता है कि आम महिलाओं के लिए ऑनलाइन स्पेस कितना असुरक्षित है.

उन्होंने कहा, "किसी महिला की शारीरिक बनावट पर अशोभनीय, अपमानजनक अथवा अश्लील टिप्पणियां करना उसकी गरिमा और सम्मान के मूल अधिकार का उल्लंघन है. बीएनएस की धारा 79 (महिला की मर्यादा का अपमान), धारा 294 (अश्लील कृत्य/शब्द) और धारा 356 (मानहानि) के तहत यह अपराध की श्रेणी में आ सकता है. साथ ही इसमें आईटी एक्ट 2000 की धारा 66ई (गोपनीयता का उल्लंघन) और 67 (अश्लील सामग्री का प्रकाशन/प्रसारण) भी लागू हो सकती हैं."

सायमा ख़ान के मुताबिक़, "इस प्रकार की ट्रोलिंग और बॉडी शेमिंग के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई ज़रूरी है, ताकि न केवल एक वरिष्ठ महिला पुलिस अधिकारी, बल्कि समाज की प्रत्येक महिला की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके."

मनोविज्ञान के जानकार मानते हैं कि बॉडी शेमिंग का व्यक्ति पर दीर्घकालिक असर भी पड़ सकता है.

प्रोफ़ेसर शम्सी अकबर कहती हैं, "बॉडी शेमिंग झेलने वाले लोगों में एंग्ज़ायटी डिसऑर्डर, डिप्रेशन और लो सेल्फ़-एस्टीम जैसी समस्याएं विकसित हो सकती हैं. कई मामलों में यह स्थिति बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर का रूप भी ले लेती है, जिसमें व्यक्ति अपने शरीर को लेकर अत्यधिक नकारात्मक सोच विकसित कर लेता है. इसकी वजह से वह बार-बार ख़ुद को आईने में देखता है, दूसरों से तुलना करता है और कभी संतुष्ट नहीं हो पाता."

उन्होंने कहा, "इतना ही नहीं, यह समस्या आगे चलकर ईटिंग डिसऑर्डर जैसे ख़तरनाक व्यवहारों को भी जन्म दे सकती है, जहां व्यक्ति अपने शरीर को बदलने के लिए ऐसे तरीके अपनाने लगता है, जो सेहत के लिए ठीक नहीं हैं."

कौन हैं अपर्णा रजत कौशिक

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रामपुर की रहने वाली अपर्णा रजत कौशिक, साल 2015 बैच की आईपीएस अधिकारी हैं.

उन्हें उत्तर प्रदेश में अपराधियों के खिलाफ़ उनके सख़्त रुख़ के लिए जाना जाता है.

आईपीएस बनने से पहले वह गुरुग्राम में एक निजी कंपनी में काम करती थीं. आईपीएस बनने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में काम किया है.

वह अमेठी में पुलिस अधीक्षक रहीं. वह कासगंज और औरैया जैसे जिलों की ज़िम्मेदारी भी संभाल चुकी हैं. लखनऊ में भी वह डीसीपी के पद पर काम कर चुकी हैं.

उन्होंने एनआईटी प्रयागराज से बी.टेक किया है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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