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पाकिस्तान चुनाव: पीटीआई की लोकप्रियता सोशल मीडिया का बुलबुला नहीं, ये साबित करने वाले इमरान ख़ान
- Author, कैरोलाइन डेविस
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लाहौर से
पाकिस्तान के चुनाव में जनादेश एक ओर तो स्पष्ट है तो दूसरी तरफ उलझा हुआ भी है.
निर्दलीय प्रत्याशियों ने सबसे अधिक सीटें जीती हैं, इनमें से कई पीटीआई (पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ) पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ते लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोका गया.
हालांकि चुनाव से पहले जीत की प्रबल दावेदार मानी जा रही नवाज़ शरीफ़ के नेतृत्व वाली पीएमएल-एन (पाकिस्तान मुस्लिम लीग- नवाज़) सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा कर सकती है.
ये तो साफ़ है कि इमरान ख़ान की पार्टी पीटीआई ने साबित कर दिया कि उसकी लोकप्रियता सोशल मीडिया का बुलबुला मात्र नहीं है, बल्कि उसके पास सच्चे और समर्पित समर्थक हैं.
इस चुनाव के लिए पीटीआई के संस्थापक को न केवल अयोग्य करार दिया गया था बल्कि उन्हें जेल में भी डाल दिया गया (वे भ्रष्टाचार के लिए पहले से ही तीन साल की सज़ा काट रहे हैं और हाल ही में उन्हें और अधिक समय की सज़ा सुनाई गई है) और तो और उनकी पार्टी के क्रिकेट बैट के चिह्न को भी चुनावी मतपत्र से हटा दिया गया- ये एक कम साक्षरता वाले एक देश में बड़े चुनावी झटके की तरह था.
विपरीत चुनावी परिस्थितियां
2022 में प्रधानमंत्री पद से हटाए गए इमरान ख़ान ने कहा था कि उन पर ये मामले राजनीति से प्रेरित होकर दर्ज किए गए हैं.
इस चुनाव में पीटीआई के प्रत्याशी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने के लिए विवश थे और बड़ी रैलियां करने में असमर्थ रहे, कुछ तो जेल में थे और कुछ छुपे रह कर मैदान में उतरे थे.
पीटीआई का कहना है कि जब उसके समर्थकों ने चुनावी अभियान चलाने की कोशिश की तो उन्हें पुलिस ने धमकाया और उठा ले गई. हालांकि इन आरोपों का अधिकारियों ने हमेशा ही खंडन किया है.
इन सब के बावजूद पीटीआई से जुड़े प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतरे और किसी भी अन्य दल से अधिक सीटें भी जीती हैं.
पीएमएल-एन, जिसे कई राजनीतिक समीक्षक देश की ताक़तवर सेना का समर्थन प्राप्त बताते हैं, वो अब तक के नतीजों में दूसरे पायदान पर चल रही है.
वहीं, पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी और पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के बेटे बिलावल भुट्टों के नेतृत्व वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) तीसरे स्थान पर है.
वो सवाल जिनके जवाब ढूंढ़ने होंगे...
अब आगे क्या होता है ये इस वक़्त का सबसे पेचीदा सवाल है.
चुनावी नतीजे आने वाले दिनों में बदल भी सकते हैं क्योंकि अलग अलग पार्टियों के प्रत्याशी इसे चुनौती भी दे रहे हैं. लेकिन यही वो चीज़ नहीं है जिस पर नज़र रखनी होगी.
पाकिस्तान के सभी निर्दलीय चुनाव विजेताओं को परिणामों के आधिकारिक रूप से एलान किए जाने के तीन दिनों के भीतर किसी एक राजनीतिक दल में शामिल होना होगा या फिर निर्दलीय ही रहना होगा.
इमरान ख़ान की पार्टी को जल्द ही इसका कोई हल निकालना होगा.
अन्य राजनीतिक पार्टियां भी इन प्रत्याशियों पर नज़र बनाए हैं और उम्मीद कर रही हैं कि वो उन्हें एक-एक कर अपने साथ लाने में कामयाब हो सकेंगी.
इस बीच, पीएमएल- एन को बहुमत पाने के लिए गठबंधन बनाने की कोशिश करनी होगी.
पीटीआई को भी यह तय करना होगा कि पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा, क्योंकि फिलहाल इमरान ख़ान की रिहाई के आसार नहीं दिख रहे.
पर्दे के पीछे
पाकिस्तान चुनाव के इन नतीजों से एक बड़ा राजनीतिक सवाल भी उभरा है.
राजनीतिक विश्लेषकों को विश्वास है कि तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके पीएमएल- एन के नेता नवाज़ शरीफ़ को सेना का समर्थन प्राप्त है जबकि वे पहले सेना के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलते रहे हैं. इसके बावजूद इमरान ख़ान के समर्थक वाले प्रत्याशियों की जीत हुई है.
आखिर ये पाकिस्तान की ताक़तवर सेना के साथ उनके संबंधों को लेकर क्या बतलाता है?
ये अक्सर कहा जाता है कि पाकिस्तान की जटिल राजनीति पर्दे के पीछे छिपी अप्रत्यक्ष चीज़ों; राजनीतिक समीकरणों और चालों; गठबंधन और पुरानी नाराज़गियों से प्रभावित रहती है.
कुल मिलाकर फिलहाल स्थिति ये है कि जैसा कई लोगों ने सोचा था कि पूर्वानुमानों की अपेक्षा ही चुनावी नतीजे आएंगे वैसा तो निश्चित रूप से नहीं हुआ है.
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