You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
जम्मू के सीमावर्ती इलाक़ों में चरमपंथी हमलों का नया पैटर्न: ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, जम्मू से लौटकर
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
रियासी, कठुआ, राजौरी, डोडा... ये जम्मू के वो इलाक़े हैं जहाँ हाल के दिनों में चरमपंथी हमले हुए हैं.
हमलों में बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब सितंबर महीने के अंत में केंद्रीय निर्वाचन आयोग जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव कराने की तैयारियाँ कर रहा है.
जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने हाल में मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में उम्मीद जताई है कि इस समस्या पर जल्द ही नियंत्रण पा लिया जाएगा.
कठुआ के अपवाद को छोड़कर, इन हमलों के लिए ज़िम्मेदार चरमपंथियों को न तो पकड़ा गया है और न ही वे मुठभेड़ में मारे गए हैं.
जम्मू में पिछले कुछ सालों में हुई चरमपंथी वारदातों को ध्यान से देखें तो हमलावरों का न पकड़ा जाना एक नए पैटर्न के तौर पर उभरता दिखता है.
इस पैटर्न की शुरुआत अक्टूबर 2021 में हुई जब जम्मू के पुँछ और मेंढर इलाक़ों में चरमपंथियों के साथ मुठभेड़ में कुल नौ सैनिकों की मौत हुई.
इन दोनों मुठभेड़ों के बाद भारतीय सेना ने जंगलों को खंगालना शुरू किया और एक महीने से ज़्यादा तक खबरें आती रहीं कि सेना और चरमपंथियों के बीच घने जंगलों में एनकाउंटर जारी है.
इसे अब तक का सबसे लंबा चलने वाला एनकाउंटर माना गया लेकिन कई हफ़्ते बीत जाने के बाद भी चरमपंथियों का कोई सुराग नहीं मिला.
रणनीति में बदलाव?
जम्मू-कश्मीर पुलिस के पूर्व डीजीपी एसपी वैद का मानना है कि चरमपंथियों की रणनीति में बदलाव आया है.
वैद कहते हैं, "एक तो इनको (चरमपंथियों को) जंगल वॉरफ़ेयर, माउंटेन वॉरफ़ेयर में ट्रेन किया हुआ है, आधुनिक हथियार दिए हुए हैं जिसकी पावर बहुत ज़्यादा है और ये तक़रीबन स्नाइपर की तरह काम दे रहे हैं. इन हथियारों में नाइट विज़न है तो इन्हें रात के वक़्त इस्तेमाल किया जा सकता है."
"दूसरा इनको इसमें बताया गया कि सर्विलांस रखें आर्मी पर, उनकी मूवमेंट नोट करें, उन पर हमला करें और अपने भागने का रास्ता देखें."
सरहद से सटे राजौरी और पुँछ जैसे इलाक़ों में घुसपैठ और हमले एक आम बात रहे हैं. बदलाव ये है कि हमलावर बिना किसी सुराग के ग़ायब हो रहे हैं और ये सुरक् बलों के लिए एक बहुत बड़ा सरदर्द बनता जा रहा है.
इससे आम लोगों में भी डर और चिंता का माहौल है.
डॉ ज़मरूद मुग़ल भारत और पाकिस्तान की सीमा से सटे पुँछ में रहते हैं.
वो कहते हैं, "वो (हमलावर) आते हैं, वारदात करते हैं और फिर ग़ायब हो जाते हैं. ग़ायब कहाँ हो जाते हैं? मतलब मिनटों या सेकंडों में बॉर्डर क्रॉस तो कर नहीं सकते. तो इसका मतलब है कि वो यहीं कहीं हैं. यहां आपने देखा होगा कितने घने जंगल और बड़े-बड़े पहाड़ हैं. इतना मुश्किल इलाक़ा है ये."
"ये जो कार्रवाइयां यहाँ हो रही हैं और जो रुख़ जम्मू का किया है, वो इसलिए भी है कि इस इलाक़े में दहशतगर्दों को ढूंढना कश्मीर के मुक़ाबले मुश्किल है."
पुँछ में ही रहने वाले मोहम्मद ज़मान पेशे से वकील हैं और पीर पंजाल ह्यूमन राइट्स संगठन चलाते हैं.
वो कहते हैं, "हम तो ये समझते हैं कि पूरी स्ट्रेटेजी चेंज हो गई है. एक तरह से जो गोरिल्ला वॉर होती थी, हम सुना करते थे उसी तरह से ये आकर ये हमले करते हैं, गाड़ियों पर करते हैं, सिक्योरिटी फ़ोर्सेस पर करते हैं. उसके बाद उनका ट्रेस न होना और उनका जंगलों में छुप जाना, ये एक चिंताजनक बात है."
ख़ौफ़ के साये में ज़िन्दगी
जम्मू में हुए हाल के हमलों में सिर्फ़ एक ही ऐसा था जिसमें दोनों चरमपंथी मारे गए. ये हमला 11 जून को कठुआ के सुहाल गाँव में तब हुआ जब दो चरमपंथियों ने वहां गोलीबारी की.
इस हमले में शामिल एक हमलावर ख़ुद का ही ग्रेनेड फटने से मारा गया और दूसरा सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में.
उस दिन सुहाल में जो हुआ, वो गाँव के कुछ चश्मदीदों ने हमें बताया.
गाँव के युवा ने कहा, "उसने हमें आवाज़ लगाई. उसने बोला पानी पिलाओ. मैंने उसको बोला कि पानी पिलाते हैं...तू है कौन? तो फिर उसने दोबारा बोला कि भाई पहले पानी पिला फिर बताता हूँ कि मैं कौन हूँ. तो मैंने उसको बोला कि एक काम कर, तू अपना नाम बता दे, और कहाँ से आया है ये बता, पानी ले आता हूँ मैं. तो उसने कहा, आ बैठके बात करते हैं. वो डोगरी पंजाबी मिक्स ही बोल रहा था. जैसे ही मैंने कदम आगे बढ़ाए तो उसने अपना हथियार जो पीठ पर टांगा हुआ था उसे हाथों में पकड़ लिया. मैं पीछे की तरफ भागा, फिर एक मिनट बाद उसने फ़ायरिंग शुरू कर दी."
सुहाल गाँव के एक वृद्ध दुकानदार ने कहा कि दोनों हमलावरों ने उनके पास आकर पीने के लिए पानी माँगा.
उन्होंने कहा, "पानी पीने के बाद उन्होंने खुले में चार-पांच फ़ायर किए. उसके बाद मैंने दुकान का शटर बंद कर लिया और सुबह तक अंदर ही लेटा रहा."
इसी गाँव के एक घर की दीवारों पर हमें गोलियों के निशान मिले.
ओंकार नाथ के हाथ में उस वक़्त गोली लग गई जब हमलावरों ने उनके घर पर फायरिंग कर दी.
उनकी 90 वर्षीय माँ ज्ञानो देवी ने कहा, "बता रहे थे कि उग्रवादी आ गए हैं. उन्होंने ग्रेनेड फेंका. ओंकार बाहर गया देखने के लिए. तो वहां तक जैसे ही पहुंचा तो उन्होंने इस पर गोली चला दी."
"चार गोलियां चलाईं. हम डरे हुए हैं. शाम को छह बजते ही गाँव सुनसान हो जाता है. लोगों को डर है कि वो लोग कहीं फिर से न आ जाएं."
सुहाल गाँव में गोलीबारी करने वाले दोनों हमलावर मारे तो गए लेकिन इस गाँव के लोगों की चिंताएं बरक़रार हैं.
इस गांव में रहने वाले रिंकू शर्मा कहते हैं, "लोगों में अभी भी डर का माहौल है क्योंकि अब भी लोगों को लगता है कि वो आसपास ही हैं. अभी जो अटैक हो रहे हैं. दाएँ-बाएँ तो ये सारा जंगल एरिया है और जंगल का एरिया होने के कारण लोगों में ज़्यादा दहशत का माहौल है."
सुहाल गांव की तरह जम्मू के बहुत से इलाक़े घने जंगलों से घिरे हुए हैं. भारत और पाकिस्तान के बीच की अंतरराष्ट्रीय सीमा इन इलाक़ों से क़रीब 20 किलोमीटर दूर है. सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि इन्हीं घने जंगलों में छुप-छुपाकर चरमपंथी सीमा पार से भारत में दाख़िल होते हैं.
11 जून को सुहाल गाँव में हुई हिंसक घटना के बाद यहां के लोगों के बीच सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. इन इलाक़ों के लोग अब लगातार ख़ौफ़ के साये में जी रहे हैं.
पुराने ज़ख्म अब भी हरे
जहां जम्मू इलाक़े में हुई हाल की घटनाओं को लेकर लोगों में डर का माहौल है, वहीं पिछले दो सालों में हुई हिंसा के ज़ख्म अब भी हरे हैं.
राजौरी के ढांगरी गाँव के एक घर पर अब हर वक़्त अर्धसैनिक बलों का पहरा रहता है.
ये वही जगह है जहाँ 31 दिसंबर 2022 की रात दो चरमपथियों ने गोलियां चलाई थीं. अगले ही दिन इस घर के पास एक बम धमाका हुआ.
इन दोनों घटनाओं में कुल सात लोगों की मौत हुई. मरने वालों में दो बच्चे भी शामिल थे.
सरोज बाला के दो जवान बेटे इसी हमले में मारे गए और हमलावर भागने में कामयाब हुए. वो आज भी इंसाफ़ का इंतज़ार कर रही हैं.
सरोज बाला कहती हैं, "कोई भुला सकता है अपने बच्चों को, नहीं कोई भुला सकता. लोगों की गाड़ियां आती हैं तो मुझे लगता है कि मेरे बच्चे आ रहे हैं. मुझे अभी भी लगता है कि मेरे बच्चे जिंदा है. मेरे घर में सिर्फ़ ईंट और पत्थर ही बचे हैं. ऊपर से मेरे बच्चों को गए अठारह महीने हो गए हैं. इतनी बड़ी-बड़ी इंटेलिजेंस एजेंसियां लगाई हुई हैं इन्होंने, लेकिन अभी तक हमें तो कुछ उनसे मिला नहीं. हम भी उन्हीं की आस लगाकर बैठे हुए हैं. भगवान हमें बच्चों का इंसाफ़ देगा एक दिन."
सरोज बाला इस सवाल का जवाब तलाश रही हैं कि उनके बेटों की हत्या करने वाले कौन थे और पकड़े क्यों नहीं गए.
वो कहती हैं, "इतने आदमी अगर बोलें कि पाकिस्तान से आए हुए हैं तो हमारी एजेंसियां क्या कर रहीं हैं. उनकी क्या ड्यूटी है? देखो, अगर सब बॉर्डर बंद किए हुए हैं तो कोई रास्ता तो होगा न उनका आने का. कोई न कोई रास्ता होगा उस रास्ते को तो बंद कर सकते हैं."
साथ ही, वो मानती हैं कि इस तरह के हमले स्थानीय मदद के बिना नहीं हो सकते.
वो कहती हैं, "अगर लोकल लोगों का सपोर्ट उनको नहीं मिलेगा तो वो कहाँ पर रहेंगे, खाना कहाँ से खाएंगे, अपना जो सामान साथ लाते हैं, हथियार वगैरह जो उनके पास होते हैं वह कहां पर रखेंगे. उनको सामान रखने के लिए भी तो जगह चाहिए, खुद रहने के लिए भी जगह चाहिए, खाने पीने के लिए भी कुछ चाहिए. पहनने के लिए कपड़ा चाहिए, हर चीज़ चाहिए उनको. तो, वो तो फिर इधर से सपोर्ट हो रही हैं उनको. इधर से ही तो देते हैं."
कुछ इसी तरह की बात हमें राजौरी से क़रीब 90 किलोमीटर दूर पुँछ में सुनने को मिली.
पुँछ के अजोट गाँव में रहने वाले मोहम्मद रशीद के बेटे हवलदार अब्दुल मजीद नवम्बर 2022 में राजौरी के जंगलों में एक तलाशी अभियान के दौरान चरमपंथियों की गोलीबारी का निशाना बन गए थे. उन्हें हाल ही में मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया है.
मोहम्मद रशीद कहते हैं, "जो हमारा नुक़सान हो रहा है ना, ये मिलीभगत के बग़ैर नहीं हो रहा है. अगर एक अजनबी मेरे घर आता है, उसे तो नहीं पता होगा न कि घर में कौन कहाँ बैठता है, कौन कहाँ सोता है. हमारी तरफ से ही कोई न कोई ये बताता है तब जाकर वो हमला करता है. मैं यही सोचता हूँ कि ऐसे आदमी बीच मैं हैं जो फ़ौज को मरवा रहे हैं. जवान मर रहे हैं, सिविलियन मर रहे हैं, छोटे-छोटे बच्चे मर रहे हैं."
जम्मू पर निशाना क्यों?
हाल के घटनाक्रम के बाद अहम सवाल एक ही है: जम्मू के इलाक़ों को निशाना क्यों बनाया जा रहा है? क्या कश्मीर घाटी की बजाय जम्मू को निशाना बनाना चरमपंथियों की एक नई रणनीति है?
जम्मू-कश्मीर पुलिस के पूर्व डीजीपी एसपी वैद कहते हैं, "जम्मू रीजन में पिछले 15 साल से अगर आप देखें तो क़रीब 2007-08 के बाद यहां टेररिज़्म ख़त्म हो गया था. सुरक्षा बलों की तैनाती ज़रूरत के मुताबिक़ होती है. जब लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर टकराव हुआ तो जो सेना और राष्ट्रीय राइफ़ल्स की टुकड़ियां थी उनको जम्मू से वहां भेजा गया."
"इसी तरह केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती को भी जम्मू में कम करके उन्हें कश्मीर भेजा गया. जम्मू-कश्मीर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप भी ढीले पड़ गए और विलेज डिफे़न्स कमेटियां निष्क्रिय हो गईं. मुझे लगता है पाकिस्तान ने इन हालात का फ़ायदा उठाया और जम्मू के इलाक़ों को निशाना बनाना शुरू कर दिया."
जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट-गवर्नर मनोज सिन्हा कहते हैं कि हालात दुर्भाग्यपूर्ण हैं लेकिन वो बहुत चिंताजनक नहीं हैं.
हाल में अंग्रेज़ी अख़बार 'इंडियन एक्सप्रेस' से बातचीत में सिन्हा ने कहा, "मुझे विश्वास है कि हम इससे प्रभावी ढंग से निपट लेंगे. यह पाकिस्तान की साज़िश भी है. सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय भर्ती है. भर्ती कुल मिलाकर शून्य है. यह एक बड़ी उपलब्धि है. सेना घुसपैठ का ध्यान रखेगी. सेना और पुलिस इससे निपट लेंगे. हमारे पास इनपुट है कि कुछ घुसपैठ हुई है. बलों ने पोज़िशन लेना शुरू कर दिया है. रणनीति तैयार है और मुझे पूरा विश्वास है कि जल्द ही एक आतंकवाद-रोधी ग्रिड स्थापित की जाएगी. जम्मू के लोगों ने उग्रवाद का मुक़ाबला किया है. वीडीसी सदस्यों को स्वचालित हथियार देने का निर्णय लिया गया है. गृह मंत्री इस पर बारीक़ी से नज़र रख रहे हैं."
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव करवाने के लिए 30 सितम्बर तक ही मोहलत दी है.
चुनाव आयोग भी इसी डेडलाइन के मुताबिक़ चुनाव करवाने की तैयारियां कर रहा है.
इन सब के बीच दबी आवाज़ में एक ही आशंका जताई जा रही है: क्या जम्मू को निशाना बनाते इन हमलों का मक़सद आगामी चुनावों को रोकना तो नहीं?
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)