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नंदीग्राम में चुनाव आयोग के 'इन तर्कों' से कटे नामों में 95 फ़ीसदी मतदाता मुसलमान- ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नंदीग्राम से
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
नंदीग्राम में 23 अप्रैल को मतदान है लेकिन मामोनी ख़ातून इस बार मतदान नहीं कर पाएंगी.
पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र के मोहम्मदपुर गाँव की मामोनी का नाम वोटर लिस्ट से इसलिए काट दिया गया क्योंकि उनकी और उनके माता-पिता की उम्र में फासला 15 साल से कम है.
मामोनी नहीं समझ पा रही हैं कि नाम काटने का ये कैसा आधार है. मोहम्मदपुर में मामोनी जैसी कई महिलाएं और पुरुष हाथ में चुनाव आयोग का नोटिस लिए अपने-अपने घरों से बाहर आ गए.
30 साल के जियारुल खां चुनाव आयोग का नोटिस दिखाते हुए कहते हैं, ''मेरे वालिद ने दो शादियां कीं और दोनों से उनके दस बच्चे हैं. अब चुनाव आयोग अपने नोटिस में कह रहा है कि हमारे पिता को छह से ज़्यादा लोगों ने पिता बताया है, इसलिए मैं जाँच के दायरे में आ गया. अब मेरे वालिद अज़ीज़ ख़ां के नौ और बच्चे हैं तो बाक़ी के बच्चे क्या दूसरे को अपना पिता बताएंगे?''
ज़ियारुल के बगल में खड़े 60 साल के मोती ख़ान कहते हैं, ''मेरे तो पाँच ही बच्चे हैं और नोटिस में देखिए चुनाव आयोग ने लिखा है कि छह बच्चे हैं और तीन के नाम काट दिए. हम सबूत देते-देते अब थक गए हैं. सरकार की ज़ुबान की कोई क़ीमत नहीं है.''
पूर्वी मेदिनीपुर के ज़िला निर्वाचन अधिकारी निरंजन कुमार से बीबीसी हिन्दी ने पूछा कि कई मतदाताओं के भाई-बहन छह से कम हैं, तब भी उनके नाम कट गए हैं. इसके अलावा जिन दूसरे आधारों पर लोगों को नोटिस मिले हैं, उसे लेकर बहुत निराशा है. इसके जवाब में निरंजन कुमार ने कहा, ''मामला सुप्रीम कोर्ट में है. हम इसमें अभी बहुत कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं. जांच चल रही है और जांच में दस्तावेज सही निकले तो नाम क्लियर हो जाएंगे.''
नंदीग्राम विधानसभा सीट से बीजेपी के सुवेंदू अधिकारी चुनाव लड़ रहे हैं. पिछले चुनाव में सुवेंदू को ममता बनर्जी चुनौती दे रही थीं और वह 1956 वोट से हार गईं थीं. नंदीग्राम में इस बार लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के तहत कुल 3,461 मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं.
एसआईआर के डेटा का विश्लेषण कर रहे कोलकाता के सबर इंस्टिस्ट्यूट ने बताया है कि इनमें से क़रीब 95 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं.
यानी नंदीग्राम में जिन 3,461 मतदाताओं के नाम काटे गए, उनमें से 3,270 मुस्लिम मतदाता हैं और 191 ग़ैर-मुस्लिम मतदाता. ऐसा तब है, जब (2011 की जनगणना के मुताबिक) नंदीग्राम में 70 फ़ीसदी से ज़्यादा आबादी ग़ैर-मुस्लिमों की है.
लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी यानी तार्किक विसंगति
नंदीग्राम में किसी मतदाता के नाम कटने का कारण माता-पिता से उम्र का फ़ासला कम होना है तो दूसरी तरफ़ किसी मतदाता के पिता को अन्य छह या उससे ज़्यादा लोगों ने पिता बताया है, तब भी मामला संदिग्ध बना दिया गया.
किसी के नाम की वर्तनी दो दस्तावेज़ों पर मेल नहीं खा रही है तो किसी के सरनेम में कोई अक्षर छूटा है, तब भी नाम काटे गए हैं. अगर किसी मतदाता की उम्र का गैप माता-पिता की उम्र से 50 साल या उससे ज़्यादा का है, तब भी उसे जांच के दायरे में डाल दिया गया है.
दरअसल चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के दूसरे चरण में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के तहत पश्चिम बंगाल के अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में हज़ारों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए हैं.
लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी को हिन्दी में तार्किक विसंगति कह सकते हैं. इन कथित विसंगतियों में वर्तनी, छह या उससे ज़्यादा बच्चे और उम्र के फासले शामिल हैं.
दरअसल चुनाव आयोग ने इसी साल जनवरी महीने में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दिया था. इस हलफ़नामे में आयोग ने लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के पक्ष में कुछ उदाहरण दिए थे.
चुनाव आयोग ने कहा था- दो मतदाताओं को 200 से ज़्यादा लोगों ने अपना पिता बताया था. सात मतदाताओं को 100 से ज़्यादा लोगों ने अपना पिता बताया और 10 मतदाताओं के नाम पर 50 से ज़्यादा बच्चे दर्ज थे. आयोग का कहना है कुछ मतदाताओं को असामान्य रूप से बड़ी संख्या में लोगों ने अपना पिता बताया है. ऐसे मामलों को वैज्ञानिक रूप से वैध मैपिंग मानना संभव नहीं है. ऐसे में चुनाव आयोग ने उन मतदाताओं को जांच के दायरे में डाल दिया, जिन्हें छह या उससे अधिक लोगों ने अपना पिता बताया है.
लेकिन चुनाव आयोग ने छह या उससे ज़्यादा बच्चे को आधार क्यों बनाया? चुनाव आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए वकील राकेश द्विवेदी और एकलव्य द्विवेदी ने इसके पक्ष में तर्क देते हुए कहा था, ''2019-2021 के दौरान, एनएफएचएस-5 सर्वे के अनुसार, भारत में औसत परिवार का आकार 4.4 है. इसका अर्थ है कि औसतन हर परिवार में दो-तीन बच्चे होते हैं. लेकिन, कुछ मामलों में एक ही अभिभावक से जुड़े मतदाताओं की संख्या 50 से अधिक पाई गई है."
माता-पिता और बच्चों के बीच 50 वर्ष के अंतर को भी लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के रूप में चिह्नित किया गया है. चुनाव आयोग ने तर्क दिया कि 45 वर्ष की आयु के बाद महिलाओं की प्रजनन दर न के बराबर हो जाती है.
सबर इंस्टिट्यूट के निदेशक साबिर अहमद चुनाव आयोग के इन तर्कों से सहमत नहीं हैं. उन्होंने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''जैसे चुनाव आयोग ने बताया कि एक ही व्यक्ति को 200 से ज़्यादा लोगों ने अपना पिता बताया है. इसके दो-तीन कारण हो सकते हैं. जो अनाथालय होते हैं, उनमें बच्चों का कोई पिता नहीं होता है. मिसाल के तौर पर रामकृष्ण मिशन के अनाथालय को ही ले लें. अनाथालय में कोई एक फादर फिगर होता है और उसी के नाम पर सारे बच्चे होते हैं. यहाँ किसी एक व्यक्ति को पिता मान लिया जाता है ताकि उसे मत देने का अधिकार मिल जाए. चुनाव आयोग भी इसे वैध मानता है.''
साबिर अहमद कहते हैं कि एक दूसरा कारण एआई भी है. वह कहते हैं, ''जैसे मेरा नाम साबिर अहमद है. बाक़ी सैकड़ों लोगों का नाम भी साबिरर अहमद है. ऐसे में एआई एक ही साबिर अहमद के नाम पर कई बच्चों को जोड़ दे रहा है. मैंने इसे चेक भी किया है. यह वोटर की ग़लती नहीं है. चुनाव ने सुप्रीम कोर्ट में बिल्कुल ग़लत मिसाल पेश की है.''
साबिर अहमद कहते हैं, ''चुनाव आयोग 2019-2021 के दौरान नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 का हवाला देकर फैमिली का साइज बता रहा है, जो बिल्कुल अतार्किक है. यह सर्वे तो कुछ साल पहले की बात है लेकिन मतदाता उस समय के हैं, जब दलितों और मुस्लिमों में छह या उससे ज़्यादा बच्चों का होना बहुत ही सामान्य बात थी. रवींद्रनाथ टैगोर के 10 भाई बहन थे. ऐसे में तो उनका नाम भी चला जाता. आप वोटर की उम्र देखिए. वे 25 से 30 साल के हैं और तब एक पिता के पाँच से ज़्यादा बच्चे होना कोई असामान्य बात नहीं थी.''
मतदाता और माता-पिता की उम्र में 15 साल से कम फासले को लेकर साबिर अहमद कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में बाल विवाह का स्तर बहुत ही ख़राब रहा है. अहमद कहते हैं, ''अमर्त्य सेन का नाम भी इसी कैटिगरी में डाला गया है क्योंकि उनकी और उनके माता-पिता की उम्र में गैप 15 साल से कम था. पश्चिम बंगाल में बाल विवाह आज भी थमा नहीं है."
95 फ़ीसदी मुसलमान क्यों?
लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी में नंदीग्राम में मुसलमानों का नाम ज़्यादा क्यों कटा? बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल में पार्टी यूनिट के अध्यक्ष रहे दिलीप घोष कहते हैं कि घुसपैठ बांग्लादेश से मुसलमानों की है, इसीलिए उनका नाम ज़्यादा कटा है.
दिलीप घोष ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से मुसलमानों की ही घुसपैठ है. ऐसे में वे सही दस्तावेज दे नहीं पाए और एसआईआर में पकड़े गए.''
सबर इंस्टिट्यूट के निदेशक साबिर अहमद इसकी दूसरी वजह बताते हैं. वह कहते हैं, ''चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट की स्क्रूटनी के लिए एआई का इस्तेमाल किया है. चुनाव आयोग ने यह भी नहीं बताया कि किसी एआई का इस्तेमाल कर रहा है. जैसे मेरे नाम को लीजिए. मेरा नाम साबिर अहमद है. अहमद में ए एच ए है, जो मेरे हेडमास्टर ने एच के बाद ए लगा दिया था. लेकिन एआई अहमद की स्पेलिंग ए एच एम ई डी ले रहा है. ऐसे में मेरा नाम भी जाँच के दायरे में आ गया था. कोलकाता छोड़कर पश्चिम बंगाल की पूरी वोटर लिस्ट बांग्ला में है. इसे एआई से अंग्रेज़ी में अनुवाद करेंगे तो कई तरह की गड़बड़ियां आएंगी.''
साबिर अहमद कहते हैं, ''एएसडीडी यानी एब्सेंट, शिफ्टेड, डेड और डुप्लिकेट के आधार पर एसआईआर हुआ तो नाम सभी धर्म के मतदाताओं की आबादी के अनुपात में ही कटा था. जैसे नंदीग्राम में मुसलमानों की आबादी 25 प्रतिशत है तो एएसडीडी में जितने लोगों के नाम कटे उनमें मुस्लिम 30 फ़ीसदी थे लेकिन लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी में ये 95 फ़ीसदी हो गए. ''
लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी में मुसलमानों के ज़्यादा नाम कटने की एक वजह बताते हुए साबिर अहमद कहते हैं, ''इलेक्शन कमीशन ने पारदर्शी तरीके से काम नहीं किया है. हमें किसी सर्कुलर का पता ही नहीं चलता है. इसके अलावा मुस्लिमों में हिंदुओं की तुलना में अशिक्षा और ग़रीबी ज़्यादा है. ऐसे में मुसलमानों में डॉक्युमेंटेशन बहुत ठीक नहीं है.''
चुनाव पर असर
पश्चिम बंगाल में एसआईआर में 90 लाख से ज़्यादा मतादाताओं के नाम कटे हैं. ममता बनर्जी ने अपनी कई चुनावी रैलियों में कहा कि एसआईआर में 60 लाख हिंदुओं और 30 लाख मुसलमानों के नाम कटे हैं.
सुवेंदू अधिकारी से मैंने पूछा कि लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी में नंदीग्राम में ज़्यादातर मुसलमानों के नाम क्यों कटे? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि जाकर उन्हीं से पूछिए. कोलकाता के मेयर और टीएमसी के सीनियर नेता फिरहाद हाकिम कहते हैं कि एएसडीडी में सब कुछ ठीक था लेकिन लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी में मुसलमान ज़्यादा टारगेट हुए हैं.
कोलकाता यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर हिमाद्रि चटर्जी को लगता है कि एसआईआर बीजेपी के हक़ में नहीं जाएगा. वह कहते हैं, ''ममता बनर्जी के इस कार्यकाल में कई तरह के विरोध प्रदर्शन हुए थे. ममता की नाकामियों को लेकर कई तरह के सवाल भी उठ रहे थे. बीजेपी उन मुद्दों को आक्रामक तरीके से उठा रही थी लेकिन एसआईआर जब हुआ तो पूरी बहस इसी पर होने लगी और बाक़ी मुद्दे पीछे छूट गए.''
नंदीग्राम में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी में जिन मुस्लिम मतदाताओं के नाम गए हैं, वे इस बात को लेकर भी डरे हुए हैं कि आगे चलकर कहीं उनकी नागरिकता पर सवाल न उठा दिया जाए.
जियारुल ख़ां कहते हैं, ''आज वोटर लिस्ट से नाम हटाया है. आने वाले समय में ये हमें बांग्लादेशी भी कह सकते हैं. एक तो हम बांग्ला बोलते हैं और दूसरे में मुसलमान हैं. ऐसे में उनके लिए हमें बांग्लादेश का बताना और आसान होगा.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.