You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ईरान जंग के कारण भारत में बढ़ सकती हैं कंडोम की क़ीमतें, जानकारों ने क्यों जताई चिंता
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
ईरान युद्ध ने कई इंडस्ट्रीज को हिलाकर रख दिया है. अब इसका असर एक ऐसी इंडस्ट्री पर भी दिखने लगा है, जो लाइफ़स्टाइल से जुड़ी हुई है. कंडोम बनाने वाली इंडस्ट्री में एक अजीब सी बेचैनी पैदा हो गई है.
कंडोम के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले पेट्रो-केमिकल प्रोडक्ट, अमोनिया और सिलिकॉन ऑयल की सप्लाई में आई रुकावट के कारण अब इनकी क़ीमतों में बढ़ोतरी को लेकर चर्चा शुरू हो गई है. इसका असर रीटेल सेल्स पर भी देखने को मिल सकता है.
इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों के मुताबिक़, भारत के 8000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की इस इंडस्ट्री के सप्लायर्स की ओर से ऐसे पर्याप्त संकेत मिल रहे हैं कि अमोनिया की कीमतों में 40-50 फ़ीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है, जिसकी वजह से सिलिकॉन ऑयल की कीमतें भी बढ़ सकती हैं.
इंडस्ट्री से जुड़े एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी हिन्दी से कहा, "किसी ने नहीं सोचा था कि इस इंडस्ट्री में कोई दिक्कत आएगी, क्योंकि कंडोम अब एक लाइफ़ स्टाइल प्रोडक्ट बन चुका है और इसके ट्रेड का लोगों पर असर पड़ता है."
लेटेक्स को स्टेबलाइज करने और अतिरिक्त प्रोटीन को हटाने के लिए अमोनिया का इस्तेमाल किया जाता है. सिलिकॉन तेल की कोटिंग कंडोम पर एक लुब्रिकेंट के तौर पर काम करती है.
लेकिन कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी और उसकी वजह से रीटेल सेल्स पर इसका असर ही इस कड़ी का एकमात्र चिंताजनक पहलू नहीं है.
इंडस्ट्री में आई इस दिक्कत का असर उन लोगों के लिए भी चिंता का विषय बन गया है जो जनसंख्या और हेल्थ स्टडीज (जैसे परिवार नियोजन कार्यक्रम और एड्स नियंत्रण कार्यक्रम) से जुड़े हैं.
पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुतरेजा ने बीबीसी हिन्दी को बताया, "बेहतर हेल्थ रिजल्ट हासिल करने के लिए गर्भनिरोधक तक पहुंच को मजबूत करना और गर्भनिरोध में पुरुषों की जिम्मेदारी को सामान्य बनाना बेहद ज़रूरी है. इसलिए, कंडोम की कमी या कीमतों में बढ़ोतरी से टीनएज प्रेग्नेंसी के मामलों में भी वृद्धि हो सकती है."
क़ीमतें क्यों बढ़ सकती हैं?
एचएलएल लाइफ़ केयर लिमिटेड के प्रवक्ता ने बीबीसी हिन्दी को बताया, "पीवीसी फ़ॉइल, एल्युमिनियम फ़ॉइल, पॉली केमिकल्स और पैकेजिंग मटेरियल जैसे मुख्य इनपुट की सप्लाई में रुकावट और कीमतों में उतार-चढ़ाव के साथ-साथ लॉजिस्टिक्स में बाधा के कारण प्रोडक्शन और ऑर्डर पूरा करने का काम प्रभावित हो सकता है."
एचएलएल का हेडक्वार्टर केरल के तिरुवनंतपुरम में है. यह एक 60 साल पुरानी पब्लिक सेक्टर की बड़ी कंपनी है. इसे केंद्र सरकार ने देश के परिवार नियोजन कार्यक्रम को सहयोग देने के उद्देश्य से स्थापित किया था.
केरल में प्रचुर रबर बागानों की वजह से ये यहां स्थापित की गई थी. बीते कुछ सालों में एचएलएल का विस्तार सात अलग-अलग जगहों तक हो गया है.
अब यह कंडोम, हॉस्पिटल में इस्तेमाल होने वाले प्रोडक्ट और दवाइयां बनाती है. इनका मुख्य उद्देश्य देश में महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है.
पब्लिक सेक्टर की यह कंपनी अब हर साल करीब दो अरब कंडोम बनाती है. यह देश में बनने वाले कुल कंडोम का लगभग 50 फ़ीसदी है.
2025-26 के दौरान, एचएलएल ने परिवार नियोजन कार्यक्रम और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के लिए 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा कीमत के मेल कंडोम मुफ़्त में उपलब्ध कराए.
ये अपने प्रोडक्ट्स को 87 देशों में निर्यात करती है.
इंडस्ट्री में तनाव की मुख्य वजह युद्ध के कारण पैदा हुई डिस्ट्रिब्यूशन और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी समस्याएं हैं.
एक अधिकारी ने कहा, "ग्लोबल शिपिंग कंटेनरों की कमी के कारण विदेश में ग्राहकों तक सामान भेजने में देरी हो रही है. समुद्री माल ढुलाई में लगने वाला समय बढ़ गया है, क्योंकि होर्मुज़ स्ट्रेट से बड़े जहाज़ों की आवाजाही रोक दी गई है.
'केप ऑफ़ गुड होप' के रास्ते से जहाज़ों को भेजने में 15-20 दिन ज़्यादा लग रहे हैं. मध्य-पूर्व में हवाई क्षेत्र पर लगी पाबंदियों के कारण हवाई माल ढुलाई की क्षमता कम हो गई है, जिसकी वजह से तैयार माल के कंसाइनमेंट का ढेर जमा हो रहा है."
इंडस्ट्री के सूत्रों का कहना है, "फ़िलहाल कच्चे माल की सप्लाई में आई कमी का ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना मुश्किल है. अनिश्चितता बनी हुई है. एक तो इनपुट मटीरियल की बात है. इनपुट की लागत, फिर प्रोडक्ट की लागत और उसके बाद डिस्ट्रिब्यूशन में आई रुकावट. ज़ाहिर है कि सप्लाई पर इसका असर पड़ेगा ही."
दरअसल, महाराष्ट्र के मालेगांव में स्थित क्यूपिड लिमिटेड को भी इसका ख़मियाजा भुगतना पड़ रहा है.
क्यूपिड लिमिटेड के सीनियर जनरल मैनेजर आर. बाबू ने बीबीसी हिन्दी को बताया, "सिलिकॉन ऑयल और एल्युमिनियम फॉइल की कीमतें काबू में नहीं हैं. आम तौर पर इस दौरान लेटेक्स की कीमतें भी बढ़ जाती हैं. इसलिए, इसका असर मैन्युफैक्चरिंग की लागत पर पड़ रहा है. दिक्कत यह है कि हम बढ़ी हुई कीमतें वेंडर्स पर नहीं डाल सकते, क्योंकि वे इसके लिए तैयार नहीं हैं. इसलिए यह एक बड़ी समस्या है."
आर. बाबू ने कहा, "हम अपने कुल प्रोडक्शन का 80 फ़ीसदी हिस्सा मुख्य रूप से रूस, दक्षिण अफ़्रीका, यूरोप और ब्राज़ील को एक्सपोर्ट करते हैं. इन जगहों तक सामान पहुंचाने के लिए शिपिंग वेसल्स मिलने में भी हमें दिक्कत हो रही है."
फार्मा सेक्टर में चिंता
कंडोम इंडस्ट्री में जो अनिश्चितता है, वह आम दवा बनाने वाले सेक्टर में भी दिखाई दे रही है. इस सेक्टर को दो तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईडीएमए) के प्रवक्ता विरंची शाह ने बीबीसी हिन्दी को बताया, "एक चुनौती एक्सपोर्ट के मोर्चे पर है. अफ़्रीका, मिडिल ईस्ट और यूरोप जैसे देशों में एक्सपोर्ट करने के लिए जहाज़ों की उपलब्धता को लेकर एक गंभीर समस्या है. चाहे वह समुद्री रास्ते से हो या हवाई रास्ते से. इसका मुख्य कारण यह है कि ट्रांसपोर्ट की उपलब्धता की फ्रीक्वेंसी कम हो गई है. चूंकि फ्रीक्वेंसी कम हो गई है, इसलिए लागत बढ़ गई है."
शाह का कहना है, "यह एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर नज़र रखी जा सकती है. इसका असर साफ़ तौर पर देखा जा सकता है. लेकिन जहां तक भारत में दवाइयों की उपलब्धता या दवाइयों के निर्यात की बात है, तो इसमें कोई चुनौती नहीं है."
लेकिन इस उद्योग के सामने चुनौती यह है कि कई ऐसी दवाइयां हैं जिनकी सामग्री पेट्रोकेमिकल्स पर आधारित होती है, जैसे कि सॉल्वेंट्स या सिंथेटिक दवाएं.
अहमदाबाद के शाह ने कहा, "अभी अटकलों की एक लहर चल रही है. अटकलों ने यह आशंका पैदा की है कि कमी हो सकती है. इसी वजह से कीमतें बढ़ गई हैं. फिलहाल इसका असल कमी से ज़्यादा अटकलों से लेना-देना है."
वो कहते हैं, "एक तरह से डर का माहौल है. असल में लोगों को इस बात का कोई यकीन नहीं है कि कल क्या होगा."
कंडोम इंडस्ट्री पर असर कितना गंभीर
परिवार नियोजन के क्षेत्र में कंडोम की कीमतों में बढ़ोतरी या उनके उत्पादन में कमी को लेकर एक चिंता है.
पूनम मुतरेजा ने कहा, "भारत को गर्भनिरोधक विकल्पों का विस्तार करने और उनकी पहुंच बढ़ाने की ज़रूरत है. साथ ही उसे कंडोम के इस्तेमाल और परिवार नियोजन में पुरुषों की भागीदारी बढ़ाने की भी ज़रूरत है. अगर कीमतें बढ़ती हैं या उपलब्धता में बाधा आती है, तो कंडोम का इस्तेमाल कम होने की आशंका है. खासकर युवाओं और कम आय वाले समूहों के बीच. इसकी वजह से अब तक हुई प्रगति को नुकसान पहुंच सकता है."
उन्होंने कहा, "इससे न केवल अनचाही प्रेग्नेंसी का जोख़िम बढ़ता है, बल्कि महिलाओं पर प्रेग्नेंसी का जो असमान बोझ है, वह भी बढ़ जाएगा, जिसे भारत ठीक करने की कोशिश कर रहा है."
भारत में कंडोम का इस्तेमाल 'काफ़ी कम' है. एक ज़्यादा संतुलित और न्यायसंगत परिवार नियोजन के तरीके के तौर पर इसे बढ़ाना ज़रूरी था.
पूनम मुतरेजा ने कहा, "नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस)-5" से पता चला कि अभी शादीशुदा जोड़ों में से करीब 9 फ़ीसदी ही कंडोम को अपने परिवार नियोजन का मुख्य तरीका मानते हैं. यह कंडोम के महत्व और इसके विस्तार की काफ़ी गुंजाइश को दिखाता है."
उन्होंने कहा, "बहुत से युवा भी कंडोम का इस्तेमाल करते हैं."
वो कहती हैं, "भारत जैसे देश में, जहां सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम बड़े पैमाने पर ख़रीद पर निर्भर करते हैं, वहां कंडोम की थोड़ी समय की कमी भी उन लोगों तक इसकी पहुंच पर असर डाल सकती है जो मुफ़्त या रियायती कंडोम पर निर्भर रहते हैं."
अंत में, सवाल यह है कि उपभोक्ताओं को कंडोम के लिए भी ज़्यादा कीमत कब से चुकानी पड़ेगी?
इंडस्ट्री के अधिकारी अब हताश लगते हैं. उनमें से एक ने कहा, "यह युद्ध जितनी जल्दी ख़त्म हो जाए, सभी के लिए उतना ही बेहतर होगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.