चेन्नई से लेकर केपटाउन तक, कई शहरों में क्यों हो रही पानी की किल्लत

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चेन्नई, तेहरान, साओ पाउलो, मेक्सिको सिटी और केप टाउन जैसे दुनिया के कई बड़े शहरों के घरों में पानी के नल सूख रहे हैं. कई क्षेत्रों में पानी की तीव्र किल्लत पैदा हो रही है.
बैंकों की भाषा में कहा जाए तो हमारी नदियों और तालाबों से आने वाला पानी हमारा करंट अकाउंट होगा.
और ज़मीन के नीचे गहराई में पानी के भंडार हमारे सेविंग्स अकाउंट कहे जा सकते हैं. आम तौर पर यह लंबे समय तक बरकरार रहते हैं मगर अब ये भी तेज़ी से सूखते जा रहे हैं.
दुनिया के कई क्षेत्रों में भूमिगत पानी के भंडारों का जलस्तर दोबारा बढ़ाना असंभव हो गया है.
यह स्थिति इतनी विकट कैसे हो गई?
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जलवायु परिवर्तन निश्चित ही इसका एक कारण है मगर मनुष्यों का व्यवहार और गतिविधियां भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं.
इसलिए इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि हमारे पानी के नल क्यों सूख रहे हैं?
शहरों का विस्तार

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पर्यावरणविद जयश्री वेंकटेसन भारत स्थित पर्यावरण संबंधी संस्था केयर अर्थ की सह संस्थापक हैं. पहले उनका घर चेन्नई में एक नदी के तट के नज़दीक था. वह कहती हैं इसके बावजूद उनके घर में पानी का साफ़ पानी नहीं आता था. इसी किल्लत को देख कर उन्होंने इसके समाधान के लिए काम करने का फ़ैसला किया जो अब उनका करियर है.
पानी की समस्या इतनी बिगड़ गई कि जून 2019 में सरकार ने आधिकारिक तौर पर डे ज़ीरो यानी पानी की पूरी सप्लाई बाधित होने के घोषणा की. शहर के चारों बड़े जलाशय सूख चुके थे.
जयश्री वेंकटेसन को याद है कि पानी के लिए उन्हें और उनके आस-पास के लोगों को बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी थी.
उन्होंने कहा, "कुछ धनी और संभ्रांत परिवारों को छोड़ कर लगभग सभी लोग पानी की किल्लत से प्रभावित थे. हमें दूर जाकर सार्वजनिक नलों से घड़ों और बाल्टियों में पानी ढो कर लाना पड़ता था. नलकों पर लंबी कतार और भीड़ होती थी. पानी को लेकर पड़ोसी और दोस्तों में झगड़े शुरू हो गए थे. सोचने वाली बात यह है कि एक तटीय शहर, जहां सालाना 1200 मिली मीटर से अधिक बारिश होती है वहां पानी की किल्लत कैसे हो सकती है?"
चेन्नई में पहले पानी की किल्लत नहीं थी. लेकिन ब्रिटिश राज के दौरान शहर फैलने लगा. आज़ादी के बाद भी यह विस्तार जारी रहा.
जयश्री वेंकटेसन का मानना है कि नब्बे के दशक में चेन्नई में भारी स्तर पर भवन निर्माण और कंस्ट्रक्शन शुरू हुए जिसका शहर पर बहुत बुरा असर पड़ा. इसमें मकान ही नहीं, अस्पताल, स्टेडियम, यातायात के इन्फ्रास्ट्रक्चर से लेकर कई तरह के कंस्ट्रक्शन शामिल हैं. यह सभी कंस्ट्रक्शन वेटलैंड यानी उस ज़मीन पर हुआ जिसके नीचे जल भंडार थे. नतीजा यह हुआ कि इन इमारतों के बनने के बाद बारिश का पानी ज़मीन के नीचे के जलभंडारों में रिसना बंद हो गया.

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जयश्री वेंकटेसन का कहना है कि ज़मीन में रिसने वाला पानी बहुत समय तक वहां रहता है. इसलिए गीली ज़मीन किसी प्राकृतिक आपदा के समय काफ़ी काम आती है. बाढ़ और चक्रवात के समय वह पानी सोख लेती है.
यानी वेटलैंड एक तरह का स्पोंज है जो अतिरिक्त पानी को सोख लेता है. लेकिन जब बारिश कंक्रीट की ज़मीन पर पड़ती है तो पानी ज़मीन में रिसने के बजाय पूरे शहर में फैलता है. शहर की नालियां भर जाती है.
अब सवाल उठता है कि पिछले दशकों में चेन्नई ने कितना वेटलैंड खोया है? जयश्री वेंकटेसन की संस्था ने जब इसका जवाब खोजने के लिए शोध किया और पाया कि चेन्नई ने 65 प्रतिशत वेटलैंड गंवा दिया है.
दरअसल, वेटलैंड सिर्फ़ चेन्नई या भारत में ही नहीं घटे हैं. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व ने पूरे यूरोपीय संघ की ज़मीन के बराबर वेटलैंड गंवा दिया है.
जयश्री वेंकटेसन चेन्नई की इस समस्या के बारे चेताना चाहती थीं ताकि वहां पानी की किल्लत की समस्या को नियंत्रण में लाया जा सके. मगर उस समय किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया. फिर 2015 में चेन्नई में आई बाढ़ में पांच सौ से अधिक लोग मारे गए और हज़ारों विस्थापित हो गए क्योंकि कंक्रीट की चादर पर बसा शहर बारिश का पानी नहीं सोख पाया.
उसके बाद प्रशासन का इस ओर ध्यान गया और शहर के वेटलैंड को बचाने के लिए कदम उठाया गया.
जयश्री वेंकटेसन ने कहा कि अब चेन्नई में वेटलैंड पूरी तरह से आरक्षित हैं उन पर किसी प्रकार का कंस्ट्रक्शन नहीं किया जा सकता.
मगर पानी की किल्लत के लिए शहरों का विस्तार ही ज़िम्मेदार नहीं बल्कि और भी कई कारण हैं.
खाद्य उत्पादन

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ऑगस्टो गेटिराना ब्राज़ील के रहने वाले हैं और नासा की हाइड्रोलॉजिकल लेबोरेट्री में रिसर्च साइंटिस्ट हैं. वह कहते हैं कि समुद्र तक पहुंचने वाले ताज़ा पानी का 20 प्रतिशत हिस्सा केवल उनके अपने देश ब्राज़ील में है. वह सैटेलाइट की मदद से भूमिगत जलभंडारों का अध्ययन करते हैं.
उन्होंने बताया कि नासा के पास पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में आने वाले बदलाव को परखने की टेक्नोलॉजी है. कई बार यह परिवर्तन ज़मीन के नीचे पानी की गतिविधि से संबंधित होते हैं. वह कहते हैं, इससे पता चला की ब्राज़ील के दक्षिण पूर्वी क्षेत्र में तीन सौ क्यूबिक किलोमीटर पानी घट गया है.
इस भारी गिरावट का क्या कारण है? ऑगस्टो गेटिराना के अनुसार जलवायु परिवर्तन से सूखे और बाढ़ जैसी आपदाएं काफ़ी बढ़ गई हैं और पहले से अधिक तीव्र हो गई हैं. लेकिन पानी की समस्या का एक कारण कृषि उद्योग भी है क्योंकि खेती में विश्व का 70 प्रतिशत पानी इस्तेमाल हो जाता है. ब्राज़ील को विश्व का ब्रेड बास्केट भी कहा जाता है यानी वह खाद्यान्नों का एक बड़ा उत्पादक देश है.
गेटिराना कहते हैं कि ब्राज़ील विश्व का सबसे बड़ा कॉफी, सोयाबीन, गोमांस और गन्ना उत्पादक है. अगर ब्राज़ील में सूखा पड़ता है तो यह पूरे विश्व की समस्या बन जाती है क्योंकि इससे पूरे विश्व के सामने खाद्यान्नों की किल्लत की समस्या खड़ी हो जाती है.

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ब्राज़ील में सालों से खेती के लिए ज़मीन तैयार करने के लिए वर्षावनों को काटा जाता रहा है. हालांकि वर्तमान सरकार ने इस पर काफ़ी अंकुश लगाया है. मगर कई सालों से ज़मीन के नीचे पानी का स्तर गिरता गया है.
ऑगस्टो गेटिराना का कहना है कि पेड़ों की वजह से ज़मीन पानी सोखती है लेकिन पेड़ों के कटने से बारिश का पानी तेज़ी से ज़मीन पर गिरता है और नदियों में बह जाता है.
वहीं मांस उत्पादन के लिए मवेशी पालन के चलते यह समस्या और विकट हो गई है. दूसरी तरफ़ वर्षावनों की कटाई से खेतों और हज़ारों किलोमीटर दूर तक के क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा प्रभावित होती है जिससे सूखा पड़ने लगता है.
ब्राज़ील के दक्षिण पूर्वी क्षेत्र में देश के अधिकांश खेत हैं और साओ पाउलो जैसे बड़े शहर भी हैं. ब्राज़ील की सबसे बड़ी आबादी वाले साओ पाउलो शहर में पानी की किल्लत का संकट खड़ा हो गया है.
ऑगस्टो गेटिराना ने यह भी कहा कि किसान पंप के ज़रिए पानी निकाल कर फ़सल तो सींच रहे हैं मगर नदी के इसी पानी पर निर्भर निचले क्षेत्र के शहरों में पानी की कमी पैदा हो रही है. 2021 में ब्राज़ील के कई शहरों में पानी की किल्लत हो गयी थी.
गेटिराना कहते हैं कि गन्ने की फ़सल को अधिक पानी की ज़रूरत होती है. इसलिए हमें सिंचाई के किफ़ायती तरीकों को अपनाना चाहिए. लेकिन कृषि के साथ साथ एक नए उभरते उद्योग से भी जल आपूर्ति की चुनौतियां बढ़ रही हैं.
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का भी असर?

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अमेरिका की टेक्सस यूनिवर्सिटी के ब्यूरो ऑफ़ इकॉनॉमिक जियोलॉजी में रिसर्च प्रोफ़ेसर और जल स्रोतों की विशेषज्ञ ब्रिजेट स्कैनलन बताती हैं कि एआई या आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के विकास के साथ बड़े पैमाने पर विशाल डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं.
कुछ डेटा सेंटर तो एक हज़ार एकड़ ज़मीन पर फैले हुए हैं. इनमें इस्तेमाल होने वाले आधुनिक कंप्यूटरों और मशीनों को चलाने के लिए बड़ी मात्रा में बिजली की ज़रूरत तो पड़ती है मगर पानी की ज़रूरत भी पड़ती है.
ब्रिजेट स्कैनलन कहती हैं कि एक तो बिजली उत्पादन के लिए पानी की ज़रूरत होती है. हमारा लैपटॉप भी कुछ देर काम करने के बाद गर्म हो जाता है. डेटा सेंटर में तो बड़ी संख्या में विशाल कंप्यूटर होते हैं जिन्हें ठंडा रखने के लिए भी पानी की ज़रूरत होती है.
ब्रिजेट स्कैनलन ने पाया कि अमेरिका के दक्षिण पश्चिमी क्षेत्रों में पानी के भंडार घट रहे हैं. उनका कहना है कि डेटा सेंटर और कंप्यूटर चिप बनाने वाली कंपनियों में पानी की बड़ी खपत हो रही है.
विश्व में उद्योग क्षेत्र कुल पानी का लगभग बीस प्रतिशत हिस्सा इस्तेमाल करता है. अब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से जुड़े नए उद्योगों की वजह से यह मांग बढ़ रही है.
अनुमान है कि अगले साल तक एआई उद्योग को 6 अरब क्यूबिक मीटर पानी की ज़रूरत पड़ेगी. इतना पानी पुर्तगाल जैसा देश साल भर में इस्तेमाल करता है.

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ब्रिजेट स्कैनलन ने कहा कि, "दस पंद्रह मध्यम साइज़ की चैट जीपीटी एनक्वायरियां आधा लीटर पानी की इस्तेमाल करती है. अब चैट जीपीटी का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होने लगा है. वहीं हमारे कंप्यूटर के कई कामों को अंजाम देने में पानी का इस्तेमाल होता है जो भविष्य में बढ़ने वाला है."
ब्रिजेट स्कैनलन कहती हैं कि फ़िलहाल टेक्सस में 360 डेटा सेंटर हैं और 100 नए डेटा सेंटर बनाने की योजना है.
समस्या यह है कि कई आधुनिक टेक्नोलॉजी उद्योग ऐसे क्षेत्रों में बनाए जा रहे हैं जो पहले से पानी की किल्लत झेल रहे हैं. ब्रिजेट स्कैनलन का कहना है कि इन उद्योगों को लगाने वाले ऐसी बड़ी और सस्ती जगह चाहते हैं जहां कि बिजली की आपूर्ति अच्छी हो.
अभी तक इस उद्योग के पानी के इस्तेमाल से पैदा होने वाली समस्याओं पर ध्यान नहीं गया है. दरअसल इसका ख़ामियाजा आम लोगों को उठाना पड़ रहा है और उनके घरेलू बजट पर इसका असर पड़ रहा है.
ब्रिजेट स्कैनलन ने आगे कहा कि कुछ रिपोर्टों के अनुसार डेटा सेंटरों के बिजली और पानी के बड़े इस्तेमाल से पानी और बिजली की किल्लत हो रही हैं जिसके चलते आम लोगों के लिए पानी और बिजली महंगी हो गई है.
मगर कुछ ऐसे देश भी हैं जो उद्योगों के विकास और पर्यावरण के संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने में सफल होते दिख रहे हैं.
फ़ोर टैप्स

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सिंगापुर दक्षिण पूर्वी एशिया का द्वीप देश है जिसकी आबादी लगभग 60 लाख है. उसकी गिनती विश्व के कुछ सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय वाले देशों में होती है. मगर ताज़ा पानी के उसके अपने कोई प्राकृतिक स्रोत नहीं हैं. घनी आबादी होने के बावजूद जल प्रबंधन के मामले में सिंगापुर दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया है.
सिंगापुर नैशनल यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फ़ॉर एनवायरनमेंट और सस्टेनेबिनलिटी के निदेशक डॉक्टर जिये शेन तान सू ने बताया कि, सिंगापुर लंबे समय से ताज़ा पानी की सप्लाई के लिए मलेशिया पर निर्भर रहा है.
देश में हमेशा ही पानी की किल्लत रही है. इससे निपटने के लिए सरकार ने देश को इस मामले में आत्मनिर्भर बनाने का फ़ैसला किया.
1990 के दशक में सिंगापुर की सरकार ने भविष्य में देश की जल आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए एक मास्टर प्लान अपनाया जिसे फ़ोर टैप्स पॉलिसी कहा जाता है.
इन चार टैप्स या नलों में से एक थी मलेशिया से सिंगापुर आने वाली पानी की पाइप लाइन. दूसरी टैप थी बारिश के पानी को जलाशयों में संचयित करने की व्यवस्था.
डॉक्टर जिये शेन तान सू के अनुसार तीसरी टैप है नया पानी. यानी पानी को रीसाइकल करने की व्यवस्था. इसके तहत नालों में बहने वाले गंदे पानी को वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में ले जाकर साफ़ किया जाता है ताकि उसका इस्तेमाल उद्योगों में ही नहीं बल्कि घरों में भी किया जा सके.
चौथी टैप है डीसलायनेशन यानी समुद्र के खारे पानी को साफ़ कर के उसका इस्तेमाल करना.

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सिंगापुर के चारों तरफ़ समुद्र है.
डॉक्टर जिये शेन तान सू कहते हैं कि सिंगापुर की सरकार ने पानी की बचत के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए कई अभियान चलाए हैं साथ ही पानी के इस्तेमाल पर टैक्स भी लगाए हैं जो पिछले दस सालों में कई बार बढ़ाए गए हैं.
लेकिन साथ ही सरकार लोगों को पानी का किफ़ायती इस्तेमाल करने वाले घरेलू सामान जैसे वाशिंग मशीन इत्यादि ख़रीदने के लिए वाउचर भी देती है.
यह इसलिए भी संभव हो पाया है क्योंकि सिंगापुर में पिछले साठ सालों से केवल एक पार्टी की सरकार सत्ता में रही है. इसलिए कुछ लोग सिंगापुर को तानाशाही ढांचे वाला लोकतंत्र भी कहते हैं.
इस पर डॉक्टर जिये शेन तान सू ने कहा कि, "एक स्थिर पार्टी और स्थिर सरकार के सत्ता में रहने से भी इस अभियान में मदद मिली है क्योंकि इन योजनाओं के लिए भारी निवेश की आवश्यकता होती है और दीर्घकालिक योजनाओं को लागू करना पड़ता है. एक ही पार्टी की सरकार रहने से इन योजनाओं को जारी रखने में मदद मिलती है."
दूसरे देश भी सिंगापुर के प्रयासों से सबक सीख कर उन्हें अपने देश में लागू कर सकते हैं. डॉक्टर जिये शेन तान सू कहते हैं कि सभी को इस विषय में अभी से सोचना चाहिए क्योंकि पानी ख़त्म हो जाने तक इंतज़ार किया गया तो बहुत देर हो जाएगी और बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा.
यानी एक बात तो साफ़ है कि हमें अपने जल प्रबंधन के बारे में गंभीरता से सोचना पड़ेगा.
यही सलाह संयुक्त राष्ट्र की भी है कि सभी देशों को इस समस्या से निपटने के लिए समय रहते कदम उठाना चाहिए.
क्योंकि अगर जल संकट गहरा गया तो उससे सामाजिक असंतोष और संघर्ष भी पैदा होगा जिससे विश्व के सामने और भी कई बड़ी समस्याएं खड़ी हो जाएंगी.
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