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नज़रिया: सख़्त बयानी से निकलेगा समाधान?
- Author, सत्येंद्र रंजन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
सेनाध्यक्ष या आमतौर पर आम भारतीय जन के भी असंतोष को समझा जा सकता है. जम्मू-कश्मीर में अशांति थमने का नाम नहीं ले रही है.
2016 में राज्य में आतंकवादियों के हाथों 82 सुरक्षाकर्मी मारे गए.
ये संख्या 2008 के बाद (जब 85 सुरक्षाकर्मियों की जान गई थी) सर्वाधिक है.
पिछले 29 सितंबर के "सर्जिकल स्ट्राइक" के बावजूद ना तो सीमा (या नियंत्रण रेखा) पार से घुसपैठ में कमी आई, ना मुठभेड़ें कम हुईं.
नोटबंदी के ऐलान के साथ भरोसा दिया गया था कि इससे आतंकवाद की कमर टूट गई है.
मगर इस महीने सुरक्षा बलों और दहशतग़र्दों के बीच मुठभेड़ की घटनाओं में फिर तेज़ी आती दिखी है. सिर्फ एक दिन में दो मुठभेड़ों में (14 फरवरी को) एक मेजर सहित चार सैनिकों की जान गई.
इन्हीं सैन्यकर्मियों को श्रद्धांजलि देते हुए सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने ऐसी टिप्पणी की जिसे नीतिगत वक्तव्य समझा गया है. जनरल रावत ने कहा, 'जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बल ज्यादा हताहत इसलिए हो रहे हैं क्योंकि स्थानीय लोग उनके अभियान में बाधा डालते हैं. कई बार आतंकवादियों के भागने में वे मदद करते हैं. हम स्थानीय लोगों से आग्रह करेंगे कि जिन लोगों ने हथियार उठाए हैं और वे स्थानीय लड़के हैं तथा वे आईएस और पाकिस्तान के झंडे लहराकर आतंकवादी कृत्य करना चाहते हैं, तो हम उनको राष्ट्र विरोधी तत्व मानेंगे. उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी.'
क्या ये समस्याग्रस्त प्रस्ताव है?
क्या इस बयान को इसका संकेत माना जाए कि अब सेना वास्तविक आतंकवादी कार्रवाई करने वालों तथा इस्लामिक स्टेट (आईएस) या पाकिस्तान के झंडे लहराने वालों के बीच फर्क नहीं करेगी?
स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन किया या पथराव में शामिल हुए तो उनसे दहशतगर्दों की तरह निपटा जाएगा?
अगर जनरल रावत के बयान का यही अर्थ है, तो इसे एक समस्याग्रस्त प्रस्ताव समझा जाएगा.
जनरल रावत को कुछ समय पहले दो सीनियर अधिकारियों पर तरजीह देकर सेनाध्यक्ष बनाया गया था. उन्हें आंतरिक विद्रोह से निपटने का विशेषज्ञ समझा जाता है. बेशक किसी आम नागरिक की तुलना में उन्हें कश्मीर के हालात की बेहतर जानकारी होगी.
इसके बावजूद यह प्रश्न अवश्य पूछा जाएगा कि किसी अशांत क्षेत्र में आम आबादी को राष्ट्र-विरोधी या दुश्मन की श्रेणी में रख देने से क्या वहां के बुनियादी मसलों का हल निकल सकता है?
सख़्त रूख़ का होगा फ़ायदा?
ऐसा नहीं है कि भारत ने जम्मू-कश्मीर में इसके पहले कभी 'आयरन हैंड' की नीति नहीं अपनाई.
पिछले साल ही हिज़्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुहरान वानी के मारे जाने के बाद भड़के विरोध के दौरान आम प्रदर्शनकारियों पर पैलेट्स (छर्रा) का खूब इस्तेमाल हुआ.
ख़बरों के मुताबिक़ उनसे तक़रीबन 100 लोगों के आंखों की रोशनी गई. इस रूप में प्रदर्शनकारियों से निपटने का यह पहला या अकेला मौका नहीं था. मगर क्या उन तरीकों से कश्मीर में नई शुरुआत होने की कोई राह निकली?
अगर तब ऐसा नहीं हुआ, तो सख्त रुख से आगे बेहतर नतीजे निकलेंगे, यह मानने का क्या आधार हो सकता है?
सेना को पूरी आज़ादी
केंद्र सरकार ने जनरल रावत के बयान का समर्थन किया है. रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने कहा कि आतंकवादियों के समर्थक स्थानीय लोगों से निपटने की सेना को पूरी आज़ादी है.
ऐसी बातें केंद्र में एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से सुनी जाती रही हैं. सेना को पूरी आज़ादी और "मर्दाना" नीतियों की ख़ूब चर्चा हुई है.
मगर सवाल फिर वही है कि आखिर इन सबसे अब तक क्या हासिल हुआ है? क्या पाकिस्तान डर गया है? या वहां पनाह लिए आतंकवादी ख़ौफज़दा हो गए हैं?
या कश्मीर के अंसतुष्ट जन-समूहों ने अपनी आंदोलनकारी गतिविधियों की निरर्थकता समझ ली है?
जनरल रावत को उपरोक्त बयान देने से पहले या पार्रिकर (अथवा अन्य सत्ताधारी नेताओं) को उनका समर्थन करने से पहले इन सवालों पर जरूर विचार करना चाहिए था.
कश्मीर या भारत के किसी भूभाग में पाकिस्तानी या आईएस के झंडे लहराए जाएं, यह किसी भारतीय के लिए अवांछित स्थिति है.
लेकिन असल मुद्दा यह है कि भारत के किसी व्यक्ति को तिरंगे से ज्यादा किसी देश का झंडा क्यों अधिक आकर्षक लगता है?
भारतीय संविधान में निहित नागरिक आज़ादियों की क़ीमत वह क्यों नहीं समझ पाता?
ये ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब असंतुष्ट समूहों से खुले और ईमानदार संवाद से ही मिल सकते हैं. ख़ासकर किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो संवाद का कोई और विकल्प ही नहीं है.
अफ़सोसनाक यह है कि सख़्ती या मर्दाना नीतियों का आवरण रचकर इस मूल बात पर परदा डालने की कोशिश की जाती है.
राजनेता ऐसे प्रयास करें, तो बात समझ में आती है. ख़ासकर उन दलों के लिए ऐसा करना स्वाभाविक है, जो भावनाओं की राजनीति करते हों.
उनकी प्राथमिकता समस्या का हल नहीं, बल्कि समस्या को लेकर बाकी देश में एक ख़ास तरह की भावना उभारना होती है, जिससे सियासी फायदे मिल सकें.
लेकिन सेनाध्यक्ष के सामने ऐसी कोई विवशता नहीं है. उनके मुंह से ऐसी बातें सुनने की अपेक्षा नहीं होती, जिसके विभिन्न प्रकार के राजनीतिक अर्थ निकाले जा सकें. जनरल रावत की ताज़ा टिप्पणी से शायद ही कोई लाभ होगा.
लेकिन कश्मीर में तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इससे ख़राब संदेश जाएगा, यह अनुमान ज़रूर लगाया जा सकता है.
जनरल रावत के बयान पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं. यह भी अफ़सोसनाक है. सेनाध्यक्ष वाद-विवाद के मौक़े दें, एक स्वस्थ लोकतंत्र में यह अपेक्षित नहीं होता.
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