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पश्चिम बंगाल: दंगों पर 'ख़ामोश' मीडिया ने अब क्यों खोली ज़ुबान
- Author, अमिताभ भट्टासाली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता
पश्चिम बंगाल का उत्तर चौबीस परगना ज़िला बीते पूरे हफ्ते हर दिन अख़बारों के पहले पन्ने पर छाया रहा. चाहे बात प्राइम टाइम बुलेटिंस की हो या फिर ऩन-प्राइम टाइम शोज़ की, कुछ ऐसा ही हाल न्यूज़ चैनल्स का भी है.
हाल के वक्त में इस ज़िले ने बहुत बड़ा सांप्रदायिक दंगा देखा है, उन्माद और तनाव की कहानियां और तस्वीरें लोगों की नज़रों से गुज़री हैं. मीडिया के हर हलके में अमन बनाए रखने की अपील भी सुनी-पढ़ी जा सकती है.
अगर ये सब कुछ किसी और राज्य में भी होता तो ख़बरों में इसको जगह मिलना कोई बड़ी बात नहीं थी. सांप्रदायिक तनाव जहां कहीं भी होता है, उसकी ख़बरें और सूचनाएं सामने आना कुदरती बात है.
लेकिन पश्चिम बंगाल के लिए ये एक नई ख़बर है, ऐसी ख़बर जो बहुत कम ही होती है. राज्य के सीनियर जर्नलिस्टों को ये याद करने में मुश्किल हो रही थी कि बीते सालों में पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा की ख़बर उन्होंने कब लिखी या पढ़ी थी.
सांप्रदायिक हिंसा
ऐसा इसलिए नहीं है कि इस राज्य में सांप्रदायिक तनाव की स्थिति कभी बनती ही नहीं बल्कि इसलिए कि उनकी ख़बरें कभी बाहर आती ही नहीं थी. कम से कम पिछले हफ्ते तक तो यही सूरत थी.
वरिष्ठ पत्रकार आशीष घोष पिछले चार दशकों से पश्चिम बंगाल को देखते समझते रहे हैं.
वे कहते हैं, "बंगाल में सांप्रदायिक तनाव की ख़बरों को छापने से मीडिया ने सोच-समझकर परहेज किया है. हमें लगा कि अगर हम सांप्रदायिक झड़पों की खबरें लिखेंगे तो ये बाकी जगहों पर फैलेगी. इसलिए हमने खुद को ऐसा करने से रोका. लेकिन इसके साथ ही पत्रकारों में इस मुद्दे पर बहस जारी रही कि ये ख़बरें छापी जाएं या नहीं."
आशीष घोष आगे बताते हैं, "एक मीडिया समूह का कहना था कि अगर सांप्रदायिक हिंसा की ख़बर छपेगी तो ये फैलेगी, लेकिन एक दूसरे समाचार समूह का मानना था कि किसी घटना की वास्तविक स्थिति रिपोर्ट करने से अफ़वाह फैलने पर रोक लग सकती है.
दंगों की रिपोर्टिंग
शुभाशीष मोइत्रा लंबे समय तक प्रिंट मीडिया, न्यूज़ चैनल्स और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स के लिए काम कर चुके हैं.
वे कहते हैं, "हाल में पत्रकारों और मीडिया कंपनियों ने इस मुद्दे को उठाना शुरू किया है कि सांप्रदायिक हिंसा की ख़बर रिपोर्ट न करके हम सही कर रहे हैं या गलत. पिछले हफ्ते हमने दंगों की रिपोर्टिंग करने से परहेज़ किया."
उत्तर चौबीस परगना के बादुरिया-बशीरहाट इलाके में जब हिंसा भड़की तो पहले दो दिनों तक मीडिया में इस बारे में कोई ख़बर नहीं छपी. लेकिन मंगलवार शाम अचानक टीवी पर सांप्रदायिक तनाव की ख़बरें दिखने लगीं. अगले दिन सुबह हर अख़बार के पहले पन्ने पर ये ख़बर छाई थी.
तो अचानक क्या बदल गया था? ऐसी ख़बरों को न छापने के लिए ख़ुद पर लगाई उस तथाकथित पाबंदी का क्या हुआ?
मोइत्रा कहते हैं, "मंगलवार को मुख्यमंत्री गवर्नर के साथ अपने मतभेदों पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रही थीं. संवाददाता सम्मेलन के दौरान बदुरिया-बशीरहाट के बारे में सवाल पूछे गए और ममता बनर्जी ने इसका जवाब दिया. जब मुख्यमंत्री खुद खुलकर इस मुद्दे पर जवाब दे रही थीं तो मीडिया ने बस उनका अनुकरण किया."
सोशल मीडिया
ईटीवी न्यूज़ बांग्ला के हेड और सीनियर टेलीविज़न जर्नलिस्ट बिस्व मजूमदार कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि मुख्यमंत्री की टिप्पणी इस अचानक आए बदलाव के पीछे एकमात्र वजह है."
उनका कहना है, "इस सिलसिले में पिछले कुछ अर्से से हम पर सोशल मीडिया का बहुत दबाव था. आम लोग ये तय नहीं कर पा रहे थे कि क्या सही है और क्या ग़लत. उनके सामने सोशल मीडिया के ज़रिए झूठी खबरें परोसी जा रही थीं और अफ़वाहों का बाज़ार गर्म था."
बीते सालों में सोशल मीडिया पर ऐसी बातें कही-सुनी जा रही हैं और ऐसी तस्वीरें शेयर की जा रही हैं जिनका मकसद साफ़ तौर पर सांप्रदायिक हिंसा फैलाना है. ताज़ा विवाद की वजह भी यही थी कि किसी ने फ़ेसबुक पर काबा की तस्वीर के साथ छेड़छाड़ कर उसे फ़ेसबुक पर पोस्ट कर दिया था.
कई अफ़वाहें, फ़ोटोशॉप की हुई तस्वीरें और यहां तक कि हिंसा के बारे में ग़लत जानकारियां सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही हैं.
बिस्व मजूमदार आगे कहते हैं, "जिस तरीके से सोशल मीडिया पर अफ़वाहें और फ़ोटोशॉप की हुई तस्वीरें फैली थीं, उससे ये लगा कि कहीं बहुत बड़ी बात हो गई है. सूचना के ज़िम्मेदार और भरोसेमंद स्रोत होने की हैसियत से मीडिया संस्थानों ने इस सांप्रदायिक हिंसा को कवर करने का फ़ैसला किया. इस मोड़ पर हमें कोई फ़ैसला लेना था."
ममता की टिप्पणी
मीडिया पर नज़र रखने वाली और स्तंभकार गार्गी चटर्जी बिस्व मजूमदार से इत्तेफ़ाक रखती हैं.
उनका कहना है, "ऐसी कई वेबसाइट्स हैं जिन्होंने ग़लत जानकारियां दीं. इनमें से ज़्यादातर को हिंदुत्व समर्थक चला रहे हैं और कुछ के पीछे मुसलमान लोग हैं. ये वक्त की मांग थी कि ज़िम्मेदार मीडिया संस्थान झूठी ख़बरों से मुकाबला करें. इसका एकमात्र तरीका ग्राउंड रिपोर्टिंग है. लोगों को ये बताना और दिखाना कि वास्तव में क्या हो रहा है."
सुभाषशीष मोइत्रा गार्गी चटर्जी की बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि जैसे ही मुख्यधारा की मीडिया ने सांप्रदायिक हिंसा की रिपोर्टिंग शुरू की, झूठी जानकारियां और अफ़वाहों का बाज़ार काफ़ी हद तक थम गया.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सांप्रदायिक हिंसा के मीडिया कवरेज में आए इस बदलाव की तारीफ़ भी की है हालांकि उन्होंने कहा कि कुछ नेशनल टेलीविज़न चैनल्स ने ठीक इसके उलट काम किया है.
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