ग़्यासुद्दीन बलबन: एक ग़ुलाम के दिल्ली का सुल्तान बनने की कहानी - विवेचना

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

इल्तुतमिश के सबसे छोटे बेटे नासिरुद्दीन महमूद के दिल्ली की गद्दी संभालते ही दिल्ली सल्तनत में राजनीतिक स्थिरता बहाल होनी शुरू हो गई थी, लेकिन इसमें सुल्तान महमूद की कोई ख़ास भूमिका नहीं थी.

यह काम किया था उसके सबसे ख़ास मंत्री ग़्यासुद्दीन बलबन ने जिसको महमूद के शासनकाल में सबसे अधिक ताक़त मिली हुई थी.

बलबन ने 1246 से लेकर 1287 तक चालीस सालों तक इस ताक़त का भरपूर इस्तेमाल किया, पहले दो दशक सुल्तान के प्रतिनिधि के तौर पर और अगले दो दशक दिल्ली के सुल्तान के तौर पर.

इस बीच सत्ता हासिल करने के उसके सफ़र में दो साल का व्यवधान पड़ा, जब वह अपने राजनीतिक विरोधियों की चालों के कारण क़रीब दो वर्षों तक सत्ता से बाहर रहा.

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बलबन के दौर के गवाह रहे इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बर्नी अपनी किताब 'तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही' में लिखते हैं, "नासिरुद्दीन महमूद ने जब गद्दी संभाली तो उसकी उम्र सिर्फ़ 17 साल की थी. उसमें न तो शासन करने का कोई गुण था और न ही दिलचस्पी. उसने शासन की पूरी ज़िम्मेदारी बलबन के ऊपर छोड़ दी थी."

"महमूद एक सौम्य, उदार और धार्मिक व्यक्ति था और उसका अधिकतर समय क़ुरान की प्रतियां बनाने में बीतता था. उस समय के उथल-पुथल वाले माहौल में ये गुण भले ही अच्छे समझे जाते हों, लेकिन सुल्तान के तौर पर इन गुणों को अनुपयुक्त माना जाता था. बलबन ने प्रतिद्वंद्वी दरबारियों की जलन और साज़िशों के बावजूद हालात पर नियंत्रण कर लिया."

ग़ुलाम बनाकर बग़दाद में बेचा गया था

नासिरुद्दीन महमूद के बीस सालों के पूरे शासनकाल के दौरान दरअसल हुकूमत बलबन ही चला रहा था.

बर्नी लिखते हैं, "इस दौरान बलबन ने महमूद को एक कठपुतली की तरह इस्तेमाल किया. पूरा राज-काज चलाया और सुल्तान न होते हुए भी सभी राजचिन्हों जैसे 'छत्र' का इस्तेमाल किया. महमूद का पूरा शासनकाल एक तरह से बलबन का शासनकाल था."

सन 1216 में जन्मा ग़्यासुद्दीन बलबन एक इल्बारी तुर्क था. उसका शुरुआती नाम बहाउद्दीन था. उसे मंगोलों ने बंदी बनाकर बग़दाद में एक ग़ुलाम के तौर पर बेच दिया था. उसका मालिक ख़्वाजा जमालउद्दीन उसे दिल्ली ले आया था जहां 1233 में इल्तुतमिश ने उसे ख़रीद कर उसे अपना ख़ासदार बना दिया था.

इल्तुतमिश के बाद उसकी बेटी रज़िया ने उसे अमीर-ए-शिकार के पद पर नियुक्त किया था. सन 1249 में उसने सुल्तान नासिरुद्दीन की बेटी से विवाह कर लिया. नासिरुद्दीन महमूद ने उसे नायब-ए-मुमलिकत का पद दे दिया. ये पद पाते ही बलबन ने महत्वपूर्ण स्थानों पर अपनी पसंद के लोग बैठाने शुरू कर दिए. उसने अपने छोटे भाई किश्ली ख़ाँ को राजमहल के प्रशासनिक कार्यों का प्रमुख बना दिया.

उस दौर में मोरक्को से भारत आए मशहूर यात्री इब्न बतूता के अनुसार, "बलबन एक नाटे क़द का शख़्स था जो देखने में आकर्षक नहीं था लेकिन उसका ऊँचा मानसिक स्तर और प्रतिभा उसकी इस कमी की भरपाई कर देती थी."

मिनहाज-ए-सिराज अपनी किताब 'तबाकत-ए-नासिरी' में लिखते हैं, "इल्तुतमिश बलबन को बहुत प्रतिभाशाली व्यक्ति मानता था इसलिए उसने उसे ऊँचा पद दिया और एक तरह से अपने हाथ पर भाग्य का बाज़ बैठा लिया. बलबन का ओहदा दिनों-दिन बढ़ता गया और कुछ दिनों में वह सुल्तान को सलाह देने वाले चालीस विशिष्ट लोगों के समूह 'तुर्कान-ए-चिहलगानी' का सदस्य बन गया."

बलबन के रसूख़ का इस तरह तेज़ी से बढ़ना उसके प्रतिद्वंद्वियों को पसंद नहीं आया और उन्होंने उसे उसके पद से हटाने के लिए साज़िश रचनी शुरू कर दी.

बलबन की बर्ख़ास्तगी और बहाली

सतीश चंद्र अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ़ मिडइवल इंडिया' में लिखते हैं, "नासिरुद्दीन महमूद के दरबारियों ने उसके कान भरकर बलबन को उसके पद से हटवा दिया. बलबन की जगह ली इमादुद्दीन रेहान ने. हालांकि तुर्क सरदार सारी ताक़त अपने हाथ में चाहते थे लेकिन वह इस बात पर राज़ी नहीं हो पाए कि उनमें से कौन बलबन के बाद यह पद संभालेगा इसलिए वह रेहान की नियुक्ति पर राज़ी हो गए."

"बलबन ने ख़ुद को पद से हटाए जाने का विरोध नहीं किया लेकिन डेढ़ साल के भीतर वह अपने कुछ विरोधियों का विश्वास जीतने में कामयाब हो गया. सुल्तान महमूद ने बलबन के साथियों की अधिक ताक़त के कारण रेहान को उसके पद से हटा दिया. कुछ समय बाद रेहान की हत्या कर दी गई. बलबन ने इसी तरह अपने कई विरोधियों का मुंह बंद किया."

बलबन इस पद पर फ़रवरी,1266 में महमूद की मृत्यु तक रहा.

महमूद ने अपनी मृत्यु से पहले बलबन को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. इसके पीछे वजह ये थी कि इल्तुतमिश का कोई बेटा जीवित नहीं था और बलबन के स्तर का व्यक्ति ही राज्य में व्याप्त अराजकता को संभाल सकता था.

इसके अलावा, बलबन ने ख़ुद को तुर्क नायक अफ़रासियाब का वंशज बताकर सिंहासन पर अपना दावा मज़बूत कर लिया था. सुल्तान के तौर पर बलबन ने बहुत ज़िम्मेदारी और मेहनत से काम किया.

सुल्तान बनते ही उसने उन सभी आमोद-प्रमोद की वस्तुओं का परित्याग कर दिया जिनका वह आदी हो चुका था.

ज़ियाउद्दीन बर्नी लिखते हैं, "दरबारी के तौर पर बलबन शराब पीने और कई तरह के मनोरंजन का शौकीन था. हफ़्ते में तीन बार वह दावतें देता था और अपने मेहमानों के साथ जुआ खेलता था लेकिन गद्दी संभालते ही उसने अपने-आपको इन नशों से दूर कर लिया. उसका सिर्फ़ एक शौक बरकरार रहा, वह था शिकार खेलना. उसका भी उसने राजनीतिक इस्तेमाल किया और शिकार के बहाने अपने सैनिकों को तैयार किया."

तड़क-भड़क और शाही शान में विश्वास

इल्तुतमिश को छोड़कर बलबन से पहले तक दिल्ली के सुल्तानों का दर्जा क़रीब-क़रीब बराबरी वाले दरबारियों में प्रथम का था. बलबन का मानना था कि इससे प्रशासन में ढिलाई आती थी और साम्राज्य में अव्यवस्था फैलती थी.

दरबारियों और प्रांतीय गवर्नरों की सुल्तान से हमेशा ठनी रहती थी जिससे उसकी ताक़त कमज़ोर होती थी.

मंत्री के तौर पर अपने पुराने अनुभव और प्राचीन ईरानी दरबार से प्रेरणा पाकर बलबन ने महसूस किया कि मुकुट को दरबारियों के स्तर से कहीं ऊंचा उठना होगा. यह सोचकर ही उसने सुल्तान को ईश्वर के प्रतिनिधि को तौर पर पेश करना शुरू कर दिया.

बर्नी ने लिखा, "बलबन की बादशाहत की अवधारणा में इस बात पर ज़ोर दिया जाने लगा कि जब दरबारी सुल्तान के सामने आएं तो वह दंडवत होकर सिंहासन या सुल्तान के पैर का चुंबन लें. दरबार में या सार्वजनिक रूप से बलबन हमेशा शाही अंगरक्षकों के घेरे में रहता था जिनके हाथों में नंगी तलवारें रहती थीं. इस वजह से सुल्तान और दूसरे लोगों के बीच एक शारीरिक और मनोवैज्ञानिक दीवार खड़ी हो जाती थी."

"दिल्ली में इससे पहले किसी भी शासक ने इतनी शान-शौक़त और तड़क-भड़क नहीं दिखाई थी. उसके सेवकों ने मुझे बताया कि वह उस समय भी औपचारिक पोशाक पहनता था जब उसे कोई देख नहीं रहा होता था."

सभ्रांत परिवारों का पक्षधर

पूरे कार्यकाल के दौरान उसे न किसी ऐसे शख़्स से बात करते देखा गया जो उससे स्तर या पेशे में नीचा हो, और न ही उसे अजनबियों से मेल-जोल बढ़ाते देखा गया.

सतीश चंद्र लिखते हैं, "बलबन ने सभी भारतीय मुसलमानों को सत्ता के महत्वपूर्ण पदों से बेदख़ल कर दिया. उसने सरकारी पदों पर उन लोगों को बैठाना बंद कर दिया जो संभ्रांत परिवार से नहीं आते थे. कई बार तो उसने हास्यास्पद ढंग से महत्वपूर्ण व्यापारियों से मिलने से इनकार कर दिया क्योंकि वे ऊँचे परिवार में पैदा नहीं हुए थे."

बर्नी ने बलबन को कहते बताया, "जब भी मैं किसी अकुलीन व्यक्ति को देखता हूँ तो मेरी आँखे जलने लगती हैं और मेरे हाथ अपनी तलवार की तरफ़ बढ़ जाते हैं."

"बलबन ने लोगों से मज़ाक करना छोड़ दिया. न ही किसी की हिम्मत थी कि वह उसकी उपस्थिति में आपस में मज़ाक करें. अपने दरबार में वह न तो कभी ज़ोर से हँसा और न ही उसने किसी को हँसने की अनुमति दी."

"बलबन ने अपने साम्राज्य में सभी संवेदनशील स्थानों पर सावधानीपूर्वक चुने गए जासूसों का एक तरह से जाल बिछा दिया ताकि उसके पास संभावित विद्रोहियों की ख़ुफ़िया ख़बरें पहुंचती रहें."

सैनिक अभियानों का विरोधी

आम राजाओं की तरह बलबन में युद्ध में जीत हासिल करके नाम कमाने की भूख नहीं थी.

अब्राहम इराली लिखते हैं, "इसका कारण यह नहीं था कि वह सैनिक अभियानों का विरोधी था. उसका मानना था कि नए विजय अभियानों में समय बर्बाद करना नासमझी है, ख़ास तौर से उस समय जब उसके अधिकार वाले क्षेत्र को पूरी तरह से मज़बूती न मिल पाई हो और जिस पर रह-रहकर मंगोल हमला करते रहे हों.

बर्नी लिखते हैं, "एक बार जब बलबन के दरबारियों ने उससे अनुरोध किया कि वह सैनिक जीत दर्ज करके अपना नाम इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज करा ले, तो बलबन ने इस प्रस्ताव को सिरे से ख़ारिज कर दिया."

उसने कहा, "मैंने अपने साम्राज्य के पूरे राजस्व को अपनी सेना को मज़बूत बनाने में ख़र्च किया है. मेरी सेनाएं मंगोल हमले का सामना करने के लिए हमेशा तैयार रहती हैं. मैं अपना राज्य कभी नहीं छोडूंगा, और न ही मैं कभी इससे दूर जाऊंगा."

हलाकू से किया संपर्क

दिल्ली सल्तनत के मंत्री के तौर पर बलबन ने मंगोलों की चुनौती का सामना चतुर कूटनीति, सतर्कता और सैनिक ताक़त के प्रदर्शन के समन्वय से किया. इसका नतीजा यह हुआ कि मंगोल उसके साम्राज्य को गंभीर नुक़सान नहीं पहुंचा पाए.

अब्राहम इराली लिखते हैं, "बलबन ने ईरान में मंगोलों के प्रतिनिधि और चंगेज़ ख़ाँ के पोते हलाकू से हमेशा अच्छा संबंध बनाए रखा. हलाकू ने उसे आश्वासन दिया कि मंगोल सतलज नदी के आगे नहीं बढ़ेंगे. हलाकू ने सन 1259 में एक सद्भावना मिशन दिल्ली भेजा जिसका बलबन ने ज़बरदस्त स्वागत किया लेकिन उन्होंने मंगोलों को यह आभास भी दे दिया कि वह सैनिक रूप से कमज़ोर नहीं हैं."

मेवाती लुटेरों के ख़िलाफ़ अभियान

बलबन के समय में मेवात के मेव लोगों ने दिल्ली के आस-पास के इलाके में आतंक मचा रखा था.

बर्नी लिखते हैं, "मेवाती लोग दिल्ली के पड़ोस के ग्रामीण इलाकों में लूट-खसोट करते. वे घने जंगलों में छिपे रहते जहाँ से कई सड़कें गुज़रती थीं. वे मुसाफ़िरों पर घात लगाकर हमला बोलते और उनका सारा सामान लूट लेते. उनके डर की वजह से दिल्ली के पश्चिमी दरवाज़े दोपहर की नमाज़ के बाद बंद कर दिए जाते. बलबन को उन लुटेरों का दुस्साहस पसंद नहीं था."

"उनसे निपटने के लिए उसने खुद एक अभियान का नेतृत्व किया. लगातार बीस दिनों तक उसके सैनिक मेव लोगों के ठिकानों पर हमला करते रहे. बलबन ने अपने सैनिकों के बीच ऐलान करवाया कि हर मेव के कटे सिर पर एक टंका और उसे ज़िंदा पकड़ने पर दो टंका का ईनाम दिया जाएगा. नतीजा ये हुआ कि कई मेवाती लुटेरों को पकड़ कर दिल्ली लाया गया. कुछ लोगों को हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया गया, कुछ के शरीर के टुकड़े कर दिए गए."

बलबन ने उनके ऊपर नियंत्रण रखने के लिए दिल्ली के आस-पास के सारे जंगल कटवा दिए और वहाँ सैनिक चौकियाँ स्थापित कर दीं.

बंगाल के विद्रोह को कुचला

बलबन के सामने लुटेरों से ज़्यादा चुनौती पेश की उसके प्रांतीय गवर्नरों ने. बंगाल एक महत्वपूर्ण रियासत थी इसलिए बलबन ने अपने सबसे अधिक विश्वासपात्र तुग़रिल ख़ाँ को वहाँ का गवर्नर नियुक्त किया. तुगरिल बहुत सक्रिय और निडर व्यक्ति था लेकिन बंगाल पहुंचने के कुछ समय बाद ही उसने बलबन के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया.

बर्नी लिखते हैं, "बलबन ने तब अवध के गवर्नर अमीन ख़ाँ को तुग़रिल को कुचलने भेजा लेकिन तुग़रिल ने उसे आसानी से हरा दिया. तब बलबन ने ख़ुद बंगाल जाकर विद्रोह को कुचलने का बीड़ा उठाया. जब बलबन अपने सैनिकों के साथ वहाँ पहुंचा तो तुग़रिल वहाँ से इस उम्मीद में त्रिपुरा की ओर भाग गया कि बलबन उसका पीछा नहीं करेगा, लेकिन बलबन ने उसका वहाँ तक पीछा किया. शाही सैनिकों ने पकड़ कर उसे मार डाला."

"बलबन तुग़रिल के पकड़े गए सैनिकों के साथ लखनौती लौटा. वहाँ उसने संभावित विद्रोहियों को चेतावनी देने के तौर पर मुख्य बाज़ार के दोनों ओर फाँसी के तख़्ते बनवा दिए, उसने तुग़रिल के सभी बेटों और दामादों को फाँसी देने का हुक्म दिया."

बेटे बुग़रा ख़ाँ को बनाया बंगाल का गवर्नर

बलबन को दिल्ली सल्तनत का प्रशासन सुधारने का श्रेय दिया जाता है. उसने प्रशासन की गरिमा बहाल की. उसके सख़्त क़ानून और उनको लागू करने के दृढ़ निश्चय ने सभी लोगों को, चाहे वो उच्च वर्ग से आते हों या निम्न वर्ग से, उसकी सत्ता मानने के लिए विवश कर दिया.

उसने गरिमा, सम्मान और ताकत के साथ अपना राज़ चलाया. सन 1285 में बलबन का सबसे बड़ा पुत्र और उत्तराधिकारी मोहम्मद मुल्तान में मंगोलों के साथ हुई लड़ाई में मारा गया. इस त्रासदी ने बलबन को हिलाकर रख दिया.

बर्नी लिखते हैं, "उसने इस वियोग के प्रभाव से बच निकलने की भरसक कोशिश की लेकिन वह कामयाब नहीं हो सका. दिन में वह अपना दरबार लगाता जैसे सब कुछ सामान्य हो लेकिन रात में वह दुख में चिल्लाता, अपने कपड़े फाड़ डालता और अपने सिर पर मिट्टी मल लेता. धीरे-धीरे बलबन का शासन अपने अंत की तरफ़ बढ़ने लगा था."

71 वर्ष की आयु में मृत्यु

मोहम्मद की मृत्यु के दो साल बाद सन 1287 में बलबन ने भी इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

उसने अपने दूसरे बेटे बुगरा ख़ाँ को अपना उत्तराधिकारी बनाया. उसने उसे बुलाकर कहा, "तुम्हारे भाई की मृत्यु ने मुझे मृत्युशैया पर बिठा दिया है. मेरा जीवन कभी भी समाप्त हो सकता है. ये तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी का समय नहीं है क्योंकि मेरी जगह लेने के लिए मेरा कोई दूसरा बेटा नहीं है. तुम्हें मेरे पास ही रहना होगा. लखनौती जाने की इच्छा त्याग दो."

लेकिन बुग़रा ख़ाँ ने अपने पिता की सलाह नहीं मानी.

बर्नी ने टिप्पणी की, "वह एक लापरवाह शहज़ादा था. उसको दिल्ली की गद्दी का कोई मोह नहीं था. दिल्ली में रहने के दो माह बाद जब लगा कि बलबन का स्वास्थ्य सुधर रहा है, वह अपने पिता को बिना बताए लखनौती लौट गया."

बलबन ने अपने दरबारियों को बुलाकर कहा कि वह उसके पोते खुसरो को राजगद्दी के लिए तैयार करें.

बलबन ने कहा, "मैं जानता हूँ कि वो युवा है और शासन करने योग्य नहीं है, लेकिन मैं कर भी क्या सकता हूँ?"

इसके तीन दिन बाद सुल्तान बलबन ने आँखें हमेशा के लिए मूंद लीं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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