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गुरमीत राम रहीम बाबा से बलात्कारी कैसे बने
- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह राम रहीम सोमवार को जब सीबीआई की विशेष कोर्ट के जज के सामने पेश हुए तो उन्होंने रहम की गुज़ारिश की.
गुरमीत सिंह ने अपने सामाजिक कार्यों का हवाला दिया, लेकिन जज जगदीप सिंह ने उन्हें 20 साल की सज़ा सुनाई.
गुरमीत सिंह को सज़ा होने के बाद डेरा के कई अनुयायियों के उनसे किनारा करने की बात सामने आई, लेकिन कई अब भी उनके 'भक्त' बने हुए हैं.
ऐसे में कई सवाल सामने आते हैं.
1- सार्वजनिक तौर पर समाजसेवा करते दिखने वाला कोई संत अकेले में अपराध की तरफ क्यों और कैसे मुड़ जाता है? क्या इसकी वजह दोहरा व्यक्तित्व है?
यूनेस्को में समाज विज्ञान क्षेत्र के पूर्व प्रमुख निदेशक और भारतीय समाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के पूर्व निदेशक डॉ. योगेश अटल इस बर्ताव को भीड़ के मनोविज्ञान से जोड़कर देखते हैं.
वो कहते हैं, "हम भीड़ में होते हैं तो अलग तरीके से सोचते हैं और अकेले में अलग तरीके से."
डॉ. अटल ये भी कहते हैं कि ऐसे लोग जानते हैं कि वो दूसरों की कमज़ोरियों का फ़ायदा उठा सकते हैं. इसीलिए मुखौटा लगाए रहते हैं.
वो कहते हैं, "ऐसे लोग एक कलाकार की तरह व्यवहार करते हैं. तरह-तरह का अभिनय कर लोगों को मोहित करते हैं. ये अपनी कमज़ोरी छुपाते हैं और दूसरों को बाध्य कर देते हैं कि वो उन्हें भगवान समझें."
दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. एससी मलिक दोहरा व्यक्तित्व होने के तर्क को दमदार नहीं मानते.
डॉ. मलिक का कहना है कि ऐसे लोग काफ़ी चतुर होते हैं और लोगों की दिक्कतों का फ़ायदा उठाते हैं.
वो कहते हैं, "परोपकारी चेहरा तो सिर्फ़ आम लोगों के लिए है. परोपकारी काम सिर्फ़ धन जुटाने और नाम के लिए किया जाता है. अंदर से तो वो उन लोगों को जो बेवकूफ़ बन सकते हैं, उन्हें अपनी हवस का शिकार बनाते हैं. वो शुरुआत में लोगों से वादे करते हैं और जब लोग साथ रहने लगते हैं तो उन्हें इस्तेमाल करते हैं."
2- मुखौटे का फ़ायदा क्या है? क्या इन्हें सच्चाई सामने आने का डर नहीं होता?
डॉ. योगेश अटल की राय में मुखौटा एक दीवार का भी काम करता है. ऐसे लोग एक तरफ़ कई अन्य लोगों का काला धन छुपाते हैं. वहीं समाज के अवांछित तत्वों को भी प्रश्रय देते हैं.
वो कहते हैं कि भारत में अधिकांश लोग भाव-भक्ति और अंधविश्वास में घिरे हुए हैं और जब तक कोई ग़लत बात सामने नहीं आती है तब तक वो एक व्यक्ति का सकारात्मक पक्ष ही देखते हैं.
डॉ. अटल कहते हैं, "अगर गुरमीत सिंह की बात करें तो वो एक मुखौटा हैं जिनके पीछे कई लोग अपना लाभ कमाते रहे हैं. ये दलाली का काम कर रहे थे और उसके ऊपर मुखौटा धर्म का लगा दिया. पकड़े जाने के पहले इतने दिन आनंद कर लिया. उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था तो डर भी नहीं था."
वहीं डॉ. मलिक कहते हैं कि ऐसे लोगों का लगता है कि वो अपनी छवि के सहारे बचे रहेंगे, लेकिन गुरमीत सिंह के साथ ऐसा नहीं हो सका.
3- क्या क़ानून का डर नहीं होता?
डॉ. अटल की राय में हर अपराधी जानता है कि उसे सज़ा मिलेगी, लेकिन वो चाहता है कि लुका-छुपी का खेल चलता रहे.
वो कहते हैं, "जो लोग ऐसा करते हैं वो ख़तरे को भी झेलने को तैयार रहते हैं. वो ऐसी व्यवस्था तैयार करने की कोशिश में रहते हैं कि वो बचे रहें. रेप करने के बाद भी जो व्यक्ति 15 या 17 बरस तक ऐसी मस्ती में रहते हैं और लोगों को आकर्षित भी कर रहे हैं तो कैसे कर रहे हैं."
वो ये दावा भी करते हैं कि ऐसे लोगों को बदनामी की भी चिंता नहीं होती.
डॉ. अटल गुरमीत सिंह का उदाहरण देते हुए कहते है, "वो जेल गए ,लेकिन कई राज्यों में कामकाज को तीन दिन तक ठप करा दिया. परमशक्ति का प्रदर्शन किया. ऐसे कामों से उन्हें आनंद मिलता है. कल तक उन्हें एक लाख लोग जानते थे तो अब 10 लाख जानते हैं. अब उस पर किस्से बनेंगे. कहानियां बनेंगी. फ़िल्म बनेगी."
4- आम लोग ऐसे लोगों के पीछे क्यों जुटते हैं?
डॉ. मलिक की राय है कि मौजूदा वक्त में हर व्यक्ति किसी न किसी तरह की समस्या से घिरा है. वो ऐसे लोगों में सामाधान का रास्ता देखता है.
वो कहते हैं, "लोगों की जरूरतें हैं. हर किसी को निजी समस्या होती हैं. उन्हें आसान समाधान की ज़रूरत होती है. लोग ऐसे समूह में शामिल होना चाहते हैं जहां उनकी पूछ हो."
हालांकि, वो कहते हैं कि समस्याओं के समाधान के लिए लोगों को काउंसलिंग का रास्ता अपनाना चाहिए.
वहीं डॉ. योगेश अटल कहते हैं कि ऐसे तत्व सिर्फ़ भारतीय समाज में नहीं बल्कि हर समाज में मौजूद हैं.
वो कहते हैं, "ये हर समाज का सत्य है. हर आदमी या तो अपने वर्तमान से भागना चाहता या फिर उसे और उज्जवल बनाना चाहता है. वो शांति की तलाश में ऐसे लोगों के पास पहुंचता है."
5- जब मुखौटा उतरता है तो क्या लोग सबक लेते हैं?
डॉ. अटल कहते हैं कि समाज की कौन-सी रीत कौन-सा मोड़ लेगी ये समाजशास्त्री भविष्यवक्ता की तरह नहीं बता सकता.
वो कहते हैं कि मौजूदा दौर में कावंड़ियों के पीछे भी गैंग साइकलॉजी काम करती है. कई लोग रास्ते में चोरियां करते हैं.
जब ये क्रम शुरू हुआ था तो ऐसी स्थिति नहीं थी.
तब ये था कि गंगा तक जाना है. रेल और बस नहीं है. समूह में निकलते थे. रास्ते में लोग खाना खिलाते थे. आज सब व्यवसाय हो गया है.
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