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नज़रियाः 'तो बलात्कार के क़ानून को ख़त्म कर देना चाहिए?'
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अदालत में चल रहे 'वैवाहिक बलात्कार' यानी 'मैरिटल रेप' के मामले में कहा है कि इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए.
भारतीय क़ानून के अनुसार, मैरिटल रेप अपराध नहीं है. यानी अगर पति अपनी पत्नी की मर्ज़ी के बिना उससे ज़बरन शारीरिक संबंध स्थापित करता है तो ये अपराध नहीं है.
दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार ने दलील दी है कि इसके 'अपराध मानने से विवाह संस्था अस्थिर' हो जाएगी और 'पतियों को परेशान करने का ये एक नया हथियार' बन जाएगा.
इस मामले पर बीबीसी हिंदी के रेडियो एडिटर राजेश जोशी ने वीएचपी के अखिल भारतीय नेता सत्येंद्र जैन और महिला कार्यकर्ता कविता कृष्णन से बात की.
आइए जानते हैं, दोनों ही लोगों का इस बारे में क्या नज़रिया है.
सत्येंद्र जैन
अगर ये मामला अपराध के रूप में घोषित हो जाता है तो इसे परिभाषित करना, यानी किस रूप में और कब ऐसा कहा गया, बहुत मुश्किल हो जाएगा.
ऐसे में ये लगता है कि इसका दुरुपयोग ज़्यादा होगा. जैसे दहेज प्रथा के ख़िलाफ़ क़ानून बना है, लेकिन कई अदालती फैसलों में ये बात कही जा चुकी है कि आधे से ज़्यादा मामले बनावटी होते हैं.
छोटी-सी अनबन हुई और दहेज उत्पीड़न का मामला दायर कर दिया गया.
सिर्फ यही नहीं, यौन शोषण का मामला भी कुछ ऐसा ही है.
ऐसे बहुत से मामले सामने आते हैं जिनमें सालों तक महिला पुरुष 'लिव इन रिलेशन' में रहते हैं और आपस में अनबन होने के बाद महिला यौन शोषण का आरोप लगा देती है.
हालांकि दुरुपयोग के आधार पर किसी के ख़िलाफ़ ज़्यादती की अनुमति नहीं दी जा सकती.
इसी ज़्यादती को रोकने के लिए विवाह संस्थाएं बनाई गई हैं.
आम तौर पर ऐसा नहीं होता कि पति ज़्यादती करे. कुछ अपवाद ज़रूर होते हैं.
लेकिन अपवाद के आधार पर नियम बनाना कहां तक सही है.
इन छोटी-छोटी बातों को क़ानून के दायरे में लाने से न केवल विवाह संस्था टूटेगी बल्कि समाज में एक प्रकार की अव्यवस्था भी पैदा होगी.
पारिवारिक मामले में इस तरह का क़ानून बनने से परिवार के अंदर टूटन आएगी, अविश्वास बढ़ेगा और परिवार संस्था बिखर जाएगी.
कविता कृष्णन
बलात्कार की एक ही परिभाषा है और वो है, 'किसी महिला के साथ उसकी मर्ज़ी के बिना यौन संबंध बनाना.'
बलात्कार और वैवाहिक बलात्कार में कोई अंतर नहीं है.
इसकी मुख़ालफ़त करने वालों का तर्क है कि विवाह के अंदर अगर पतियों को बलात्कार का अधिकार नहीं दिया गया तो विवाह की संस्था नहीं बचेगी.
विवाह संस्था के बारे में ये बहुत हैरान कर देने वाला तर्क है.
केंद्र की दलील से तो ऐसा लगता है कि उसकी नज़र में विवाह एक ऐसी संस्था है जिसमें पत्नी, पति की संपत्ति है और पति पूरे अधिकार से पत्नी के साथ ज़बरदस्ती यौन संबंध की मांग कर सकता है और पत्नी को ना बोलने का कोई हक़ नहीं है.
केंद्र सरकार का तर्क बहुत ही अफ़सोसनाक है.
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पति द्वारा पत्नी को पीटे जाने की घरेलू हिंसा भारत में बहुत आम है.
कुछ लोग कहते हैं कि अगर पति के ख़िलाफ़ पत्नी इस तरह के आरोप के साथ अदालत का दरवाज़ा खटखटाने लगे तो परिवार बचेगा कैसे.
तब ये सवाल उठता है कि शादी ज़्यादा बचाना ज़रूरी है कि या उस महिला के अधिकारों और उसकी सुरक्षा को प्राथमिकता देना ज़रूरी है.
विडंबना की बात है कि जब बलात्कार हो जाता है तो सभी नेता अपराधी को फांसी देने तक की मांग कर बैठते हैं और दूसरी तरफ़ यही बलात्कार पति अपनी पत्नी के साथ कर रहा है तो वो कहते हैं कि विवाह संस्था को बचाना ज़्यादा ज़रूरी है.
दहेज विरोधी क़ानून की तरह इसके दुरुपयोग का जहां तक सवाल है तो ये साबित नहीं हुआ है कि महिलाएं इसका दुरुपयोग ही करती हैं. अधिकांश अध्ययन बताते हैं कि इसका इस्तेमाल ही बहुत कम हुआ है.
लेकिन ये तर्क कहां तक सही है कि फलां क़ानून का दुरुपयोग हो रहा तो दूसरा क़ानून नहीं बनाना चाहिए.
इस तरह से बलात्कार के ख़िलाफ़ बने क़ानून को भी ख़त्म कर दिया जाना चाहिए.
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