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वियतनाम की वो 'नेपाम गर्ल', ग़ज़ा के बच्चे और ईरान की स्कूली छात्राएं...मोहम्मद हनीफ़ का ब्लॉग
- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, सीनियर पत्रकार और लेखक
- पढ़ने का समय: 4 मिनट
(इस लेख के कुछ हिस्से आपको विचलित कर सकते हैं)
आज से लगभग 50 साल पहले वियतनाम में जंग हुई थी. उस समय न तो इंटरनेट था और न ही मोबाइल फ़ोन और हफ्तों या महीनों बाद जंग की खबरें हम तक पहुंचती थीं.
अमेरिका वियतनाम पर नेपाम बम गिराता था, जो आग लगा देते थे. फसलों को, जानवरों को, लोगों को जलाकर राख कर देते थे.
उस समय एक फ़ोटो छपी, जिसमें एक 9 साल की बच्ची, जो नेपाम बम से जल रही थी, सड़क पर दौड़ रही थी. अख़बारों में फोटो छपी और जनता को पता चला कि वियतनाम में अमेरिकी सेना क्या कर रही है.
उस लड़की का नाम 'किम' था, लेकिन वह नेपाम गर्ल के नाम से मशहूर हो गई. लोग चिल्लाए, जुलूस निकाले, लेकिन जंग अगले तीन साल तक चलती रही.
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किम की फ़ोटो ने हालांकि जंग तो नहीं रुकवाई, पर जनता ने यह शोर ज़रूर डाल दिया कि हमारे नाम पर और हमारे टैक्स के पैसे से इतना ज़ुल्म न करें.
ग़ज़ा में बच्चे मारे जाते रहे
जब ढाई साल पहले ग़ज़ा पर हमले शुरू हुए, तो एक अमेरिकी समझदार आदमी ने टीवी पर बैठकर कहा कि अगर ग़ज़ा में बच्चे मारे जाते हैं और उनकी तस्वीरें मीडिया में आती हैं तो दुनिया को इसराइल को रोकना होगा.
अगले ढाई साल में ग़ज़ा में इतने बच्चे मारे गए कि दुनिया खुद चिल्ला उठी कि ग़ज़ा बच्चों का कब्रिस्तान बनता जा रहा है. वे बच्चे मारे गए जिनकी आयु सिर्फ़ एक दिन थी, दो दिन थी, दो महीने थी.
ऐसे बच्चे थे जो 4 महीने के थे, बम से जलकर मरे, अपने घरों के मलबे में दब गए, पूरे परिवार ख़त्म हो गए और हम अपने फ़ोन पर उनकी लाइव फ़ीड देखते रहे.
एक ऐसे ज़माने में जब किसी ग़रीब के बच्चे को बुखार भी हो जाए तो वह गोद में उठाकर शहर के बड़े हॉस्पिटल की ओर चल पड़ता है और विकसित देशों में जब कोई स्कूल जाने वाला बच्चा लापता हो जाता है तो रेड अलर्ट जारी किए जाते हैं और हेलिकॉप्टर उड़ते हैं.
इस दौरान बच्चों को मारने वाले मारते रहे. उनका हाथ किसी ने भी नहीं रोका. हम भी अपने बच्चों से छिप-छिप कर इन मरे हुए बच्चों की फ़ीड देखते रहे.
अब ईरान में
जनता शायद हर तरह के ज़ुल्म की आदी हो जाती है, लेकिन यह कभी भी नहीं सोचा था कि हर घंटे एक बच्चा मारा जाएगा और बाकी दुनिया का काम-धंधा ऐसे ही चलता रहेगा.
अब ईरान पर हमले शुरू हो गए हैं और पहले ही हमले में लड़कियों के एक स्कूल पर बमबारी हुई है.
150 से ज़्यादा लड़कियां मारी गई हैं. सदर/प्रेसिडेंट ट्रंप का कहना है कि ईरानियों ने खुद ही मारा होगा. एक और अमेरिकी समझदार आदमी ने कहा है कि इन लड़कियों ने बड़े होकर बुर्का ही पहनना था, इससे तो मौत ही बेहतर है.
कई साल पहले, पाकिस्तान टीवी पर एक सुसाइड बॉम्बर का इंटरव्यू देखा था.
उसने एक मस्जिद में जाकर फटना था, पर वह नहीं फटा और पकड़ा गया.
इंटरव्यू लेने वाले ने पूछा कि 'आपकी जो भी राय हो, लेकिन मस्जिद के अंदर मासूम बच्चे भी थे, वे भी मारे जाने थे.'
सुसाइड बॉम्बर ने आगे से जवाब दिया कि 'आपको किसने कहा है कि बच्चे मासूम होते हैं.'
अब बंदा सोच रहा है कि उस सुसाइड बॉम्बर और डेवलप्ड देशों के नेताओं की सोच में कितना सा अंतर है.
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