जावेद आबिदी: वो शख़्स जिसने विकलांगों के हक को आवाज़ दी थी

जावेद आबिदी

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पढ़ने का समय: 2 मिनट

भारत में विकलांगों के अधिकारों के लिए काम करने वाले जावेद आबिदी का 53 साल की उम्र में निधन हो गया.

साल 1995 में उन्होंने विकलांगों के अधिकारों के लिए एक बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया था और इसी साल सरकार ने उनके लिए ऐतिहासिक क़ानून बनाया.

वे जन्म से 'स्पाइन बिफिडा' नाम के रोग से ग्रस्त थे जिसमें व्यक्ति की रीढ़ और मेरूदंड पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाते हैं. उनका सालों तक इलाज भी चला.

उनके परिवार ने बताया कि जावेद की तबियत पिछले कुछ दिनों से ख़राब थी और रविवार दोपहर उनकी मौत हो गई.

विकलांगों के लिए सुविधाएं, उनके प्रति लोगों के रवैये और सरकारी नीतियों के मामले में भारत की छवि दुनिया भर में बहुत अच्छी नहीं रही है.

जावेद आबिदी

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विकलांग लोगों के लिए...

जावेद का संघर्ष विकलांगों को दफ्तरों, स्कूलों, यातायात के सार्वजनिक साधनों और मतदान केंद्रों तक पहुंच दिलाने के लिए था.

वो जावेद ही थे जिनकी वजह से भारत के कई बड़े शहरों की प्रमुख इमारतों में विकलांग लोगों के लिए रैंप बनवाए गए.

विकलांगों के लिए 1995 में बनाए गए क़ानून के रास्ते ही भारत में सरकारी नौकरियों में उनके लिए एक फ़ीसदी आरक्षण का प्रावधान किया जा सका.

जावेद ने भारत में नेशनल सेंटर फ़ॉर प्रमोशन ऑफ़ इम्प्लॉयमेंट फ़ॉर डिसेबल्ड पीपल्स की स्थापना की थी और वे डिसेबल्ड पीपल इंटरनेशनल के ग्लोबल चेयरमैन भी थे.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में विकलांगों की आबादी दो करोड़ 60 लाख है.

लोगों ने जावेद के लिए ट्विटर पर अपनी श्रद्धांजलि दी हैं.

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